तृतीया चन्द्रघण्टा

Chandraghanta · नवदुर्गा-3 · दशभुजा · सिंह-वाहिनी

तीसरी रात की देवी के माथे पर अर्ध-चंद्र है — पर घंटे के आकार का: चन्द्र-घण्टा। तप की देवी (D062) के ठीक बाद शस्त्र-सज्जित रूप — दस भुजाएँ, खड्ग-धनुष-त्रिशूल-गदा, सिंह की सवारी; और सबसे बड़ा आयुध वह जो लोहे का नहीं — नाद है: जिस घंटा-ध्वनि से असुर-दल काँपते हैं और भक्त-हृदय निर्भय होते हैं।

क्रम: नवदुर्गा-तृतीया चिह्न: घंटाकार अर्ध-चंद्र भुजाएँ: दस · वाहन: सिंह वर्ण: स्वर्ण-काया · स्वभाव: सौम्य-वीर
प्रमुख कथा पढ़ें
नाद-आयुधाघंटा-ध्वनि जिसका प्रथम शस्त्र है
चन्द्र-घण्टामाथे का चाँद जो घंटा बनकर बजे
वीरता-दायिनीनिर्भयता — उपासक को पहला वरदान
सौम्य-वीर द्वैधभक्त के लिए माँ, अधर्म के लिए रण

परिचय एवं दिव्य स्वरूप

Introduction

नवदुर्गा-क्रम की तीसरी देवी चन्द्रघण्टा हैं — "तृतीयं चन्द्रघण्टेति" (देवी कवच)। नाम उनके ललाट से जन्मा है — मस्तक पर विराजित अर्ध-चंद्र घंटे के आकार का है: चन्द्र + घण्टा। यह रूप नवदुर्गा-यात्रा का पहला शस्त्र-सज्जित रूप है — स्वर्ण-आभ काया, दस भुजाएँ (त्रिशूल, गदा, खड्ग, धनुष-बाण, कमल, कमंडलु, जपमाला, अभय-वर मुद्राएँ — सूची पाठ-भेद सह), सिंह-वाहन, युद्ध-मुद्रा में उद्यत। शैलपुत्री (D061) जन्म थीं, ब्रह्मचारिणी (D062) तप — चन्द्रघण्टा उस तप से जन्मी शक्ति हैं: क्रम स्वयं उपदेश है, जिसका पाठ नीचे कथा में।

पर इस योद्धा-रूप का स्वभाव-सूत्र ध्यान से पढ़ना चाहिए — परंपरा उन्हें "सौम्यता और वीरता का युग्म" कहती है: भक्त के लिए उनका दर्शन परम शांत-कल्याणकारी है; उनकी उग्रता केवल अधर्म-सम्मुख जागती है। उनका प्रधान आयुध भी यही कहता है — दस हाथों के शस्त्रों से पहले वह घंटा-नाद चलता है जिसकी ध्वनि-मात्र से असुर-सेनाएँ विचलित हो जाती हैं (देवी-माहात्म्य के रण-वर्णनों में देवी का घंटा-निनाद दैत्य-सैन्य के लिए त्रास है — D009-फ्रेम); मंदिरों के द्वार-घंटे से आरती की घंटी तक भारतीय पूजा-विधान का समूचा नाद-शास्त्र इसी देवी-तत्त्व की प्रतिध्वनि है।

परिवार एवं संबंध

Family
  • तत्त्व-अभिन्नतापार्वती (D006) — शिव-मिलन-उत्तर शक्ति-पद (धारा-वाचन)
  • चिह्न-सम्बन्धशिव (D003) — चंद्रशेखर-चिह्न का देवी-रूप; चंद्र (D044) ललाट-वासी
  • रण-फ्रेमदुर्गा (D009) — देवी-माहात्म्य घंटा-नाद रण-सूत्र
  • पूर्व-क्रमब्रह्मचारिणी (D062); अग्र-क्रम: कूष्माण्डा (D064)
  • वाहनसिंह — दुर्गा-कुल की रण-सवारी

प्रमुख कथा

Major Story — न्यूनतम 1,000 शब्दों में
प्रमुख कथा / तत्त्व-कथा

घंटे में बसा सिंहनाद — तप के बाद शस्त्र क्यों

क्रम का रहस्य — जन्म, तप, तब शक्ति

चन्द्रघण्टा की "कथा" समझने की कुंजी यह स्वीकारना है कि नवदुर्गा-शृंखला केवल नौ कथाओं की माला नहीं — एक क्रम-शास्त्र है; और तीसरा स्थान उस क्रम की पहली बड़ी छलाँग है। देखिए यात्रा — पहली रात शैलपुत्री (D061): जन्म, जड़ें, संकल्प; दूसरी रात ब्रह्मचारिणी (D062): तप, संयम, प्रतीक्षा; और तीसरी रात अचानक — दस भुजाएँ, खड्ग-धनुष, सिंह-गर्जना। यह उछाल नहीं, परिणाम है: परंपरा का स्पष्ट संकेत है कि शक्ति तप की संतान है — शस्त्र उसी हाथ में शोभते हैं जिसने पहले माला फेरी हो। लोक-पौराणिक धाराएँ (ग्रेड B/C — चिह्नित) इस रूप को शिव-विवाह के उत्तर-काल से जोड़ती हैं: विवाह-पश्चात पार्वती ने शिव-गृह की सह-स्वामिनी होकर जो पद पाया, उसमें महादेव के ललाट-चंद्र का प्रतिरूप उनके ललाट पर भी विराजा — पर देवी का चंद्र घंटाकार हुआ: शिव का चंद्र शांत कला है, शक्ति का चंद्र बजता हुआ नाद — एक ही चिह्न, दो स्वभाव; अर्धनारीश्वर-दर्शन (D027) की यह सूक्ष्म प्रतिध्वनि नवदुर्गा-मंडल में यहीं है। एक अन्य लोक-धारा घंटा-चिह्न को उस महाघंटे से जोड़ती है जो देवी को इन्द्र-ऐरावत (D039) के घंटे से रण-काल में मिला (देवी-माहात्म्य के देव-उपहार प्रकरण की छाया — D009) — धाराएँ जो भी हों, चिह्न का अर्थ स्थिर है: यह देवी घोषणा करके लड़ती है — छल से नहीं, नाद से; आक्रमण से पहले चेतावनी — धर्म-युद्ध की पहली शर्त।

नाद-आयुध — ध्वनि जो शस्त्र से पहले चलती है

देवी-माहात्म्य के रण-वर्णन (अध्याय 2-3 — महिषासुर-प्रकरण, जिसकी पूर्ण युद्ध-गाथा दुर्गा-पृष्ठ D009 की है) में एक ब्यौरा बार-बार लौटता है — देवी का घंटा-निनाद: सिंह-गर्जना, धनुष-टंकार और घंटा-ध्वनि मिलकर वह त्रि-नाद रचते हैं जिससे असुर-सेनाओं के हृदय युद्ध से पहले ही टूट जाते हैं; पाठ कहता है कि वह घंटा दैत्यों के तेज को पीती हुई बजती थी। चन्द्रघण्टा-रूप इसी नाद-आयुध का मूर्त-पद है, और यहाँ भारतीय ध्वनि-दर्शन का एक गहरा अध्याय खुलता है। घंटा भारतीय पूजा-विधान का अनिवार्य उपकरण क्यों है? आगम-परंपरा उत्तर देती है — घंटा-ध्वनि "नाद-ब्रह्म" का स्थूल रूप है: वह ॐ-कार की धातु-प्रतिध्वनि है (घंटे के डोल में गूँजता स्वर ओंकार-सम माना गया); उसकी तरंग वातावरण के आलस्य-तमस् को काटती है, मन के विक्षेप को एक बिंदु पर बुलाती है, और देवता के आवाहन की घोषणा करती है — इसीलिए मंदिर-प्रवेश पर घंटा बजाने की विधि है: मैं आ गया हूँ, और अब भीतर का शोर बाहर छोड़ आया हूँ। आरती की घंटी, शंख-नाद, नगाड़े — नवरात्र-पंडालों से लेकर हिमालयी मंदिरों की घंटा-मालाओं तक, यह समूचा नाद-जाल चन्द्रघण्टा-तत्त्व का विस्तार है। और दैत्य-पक्ष पर उसका प्रभाव भी मनोविज्ञान-सिद्ध है — अधर्म की पहली दुर्बलता उसका अपराध-बोध है: स्पष्ट, निर्भय घोषणा-ध्वनि सुनते ही वह काँपता है; धर्म को छिपकर नहीं लड़ना पड़ता — उसका आगमन ही बजता हुआ आता है। युद्ध-परंपरा में भी यह नाद-नीति जीवित रही — शंख-भेरी-दुंदुभि के उद्घोष से युद्ध का आरम्भ (गीता का पहला अध्याय स्वयं शंख-नाद-सूची से खुलता है — पाञ्चजन्य, देवदत्त...); बिना घोषणा का आक्रमण भारतीय युद्ध-धर्म में कापुरुष-कर्म गिना गया। चन्द्रघण्टा उसी घोषणा-धर्म की देवी हैं। इसी से इस देवी का प्रथम वरदान परंपरा में निर्भयता कहा गया — चन्द्रघण्टा-उपासक को भय-मुक्ति: क्योंकि जो स्वयं घोषणा करके जीने लगता है — जिसके जीवन में छिपाने योग्य कुछ नहीं — उसका भय स्वतः मर जाता है।

सौम्य-वीर द्वैध — माँ जो योद्धा है

चन्द्रघण्टा-ध्यान का प्रचलित श्लोक — "पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥" — दो विपरीत चित्र एक साथ रखता है: देवी "चण्ड-कोप" अस्त्रों से युक्त हैं (प्रचंड क्रोध के शस्त्र), और वही देवी "प्रसाद" (कृपा-प्रसन्नता) फैलाती हैं। यह विरोधाभास नहीं — नवदुर्गा-दर्शन की धुरी है: शक्ति का पूर्ण रूप वही है जो दोनों कर सके। जो केवल सौम्य है, वह अन्याय के सम्मुख असहाय है; जो केवल उग्र है, वह स्वयं अन्याय बन जाता है — चन्द्रघण्टा वह संतुलन-बिंदु हैं जहाँ करुणा के पास दाँत हैं और शक्ति के पास विवेक। भारतीय मातृ-दर्शन ने यह द्वैध हर स्तर पर गाया है — गाय जो सींग भी रखती है, माँ जो रक्षा में सिंहिनी हो जाती है; और स्त्री-शक्ति के लिए तो यह रूप घोषणा-पत्र ही है: तीसरी नवदुर्गा कहती है कि कोमलता दुर्बलता नहीं है, और वीरता कठोरता नहीं — स्त्री का पूर्ण रूप वह है जिसमें दोनों जागते हों। सिंह-वाहन इसी पाठ की सवारी है — सिंह पशु-बल है: क्रोध, आवेग, आक्रामकता; देवी उस पर आसीन हैं — बल का दमन नहीं, नियंत्रण; आवेग मारना नहीं है, उस पर बैठना है। लोक-योग परंपरा (ग्रेड C) इस रूप को मणिपुर-चक्र से जोड़ती है — नाभि का अग्नि-केंद्र: तेज, साहस, आत्म-बल का स्थान; तीसरी रात की साधना भीतर की अग्नि जगाने की साधना है — पर घंटे के अनुशासन में बँधी अग्नि, जंगल की आग नहीं।

आध्यात्मिक अर्थ — घोषित जीवन

चन्द्रघण्टा-तत्त्व के पाठ आज की भाषा में असाधारण सामयिक हैं। पहला — तप-पश्चात शक्ति: क्रम-शास्त्र का यह नियम हर क्षेत्र का नियम है; बिना अभ्यास-तप के आई शक्ति (पद, धन, प्रसिद्धि) चन्द्रघण्टा नहीं — केवल चण्ड है: उसके पास कोप के अस्त्र हैं, प्रसाद की क्षमता नहीं। दूसरा — नाद-धर्म: घोषणा करके जियो; जो सम्बन्ध, जो व्यवसाय, जो संकल्प छिपाकर चलाना पड़े, वह देवी-पथ नहीं है — चन्द्रघण्टा का उपासक वह है जिसके इरादे घंटे की तरह साफ़ बजते हैं। तीसरा — भय का अर्थशास्त्र: परंपरा कहती है इस देवी के घंटा-नाद से भक्त के भय और पाप दोनों भागते हैं — संगति देखिए: भय प्रायः वहीं रहता है जहाँ कुछ छिपा हो; पारदर्शिता स्वयं अभय-कवच है। और चौथा — संतुलन-साधना: हर उपासक के भीतर एक ब्रह्मचारिणी है (संयम) और एक सिंह (आवेग) — तीसरी रात दोनों का विवाह है: संयमित आवेग, सौम्य वीरता। नवरात्रि की तीसरी संध्या जब पंडालों में आरती-घंटे एक साथ बजते हैं, तब वह केवल विधि नहीं होती — चन्द्रघण्टा का जीवित दर्शन होता है: सहस्र घंटियों का एक नाद, और उस नाद में डूबा हुआ निर्भय समुदाय — भय अकेले में पलता है, नाद सबको एक कर देता है। ॥ तृतीयं चन्द्रघण्टेति ॥

स्रोत टिप्पणी: नाम-क्रम — देवी कवच "तृतीयं चन्द्रघण्टेति" (ग्रेड A/B); घंटा-निनाद रण-सूत्र — देवी-माहात्म्य अध्याय 2-3 (ग्रेड A — मुख्य महिषासुर-कथा D009 पर; "तेज पीती घंटा" भावानुवाद); ध्यान-श्लोक "पिण्डजप्रवरारूढा..." — प्रचलित नवदुर्गा पूजा-पाठ (ग्रेड B — सप्तशती-मूल में नहीं; "पिण्डज-प्रवर" पद की वाहन-व्याख्या भेद-सह); शिव-विवाह-उत्तर रूप एवं ऐरावत-घंटा धाराएँ — लोक-पौराणिक (ग्रेड B/C — स्पष्ट चिह्नित); घंटा नाद-ब्रह्म विधान — आगम-पूजा परंपरा (ग्रेड B); मणिपुर-योजना — लोक-योग (ग्रेड C — चिह्नित); दस-आयुध सूची पाठ-भेद चिह्नित। अर्थ-अनुच्छेद व्याख्या-स्तर (संपादकीय)।

नाम एवं अर्थ

Names
चन्द्रघण्टा
घंटाकार चंद्र (ललाट-चिह्न) वाली — नाम-मूल।
चण्डघण्टा
प्रचंड घंटा-नाद वाली — पाठ-पर्याय (धारा-भेद)।
दशभुजा
दस भुजाओं वाली — पूर्ण-सज्ज शक्ति-रूप।
वीरता-दायिनी
उपासक को निर्भयता देने वाली — फल-पद।
विश्रुता
ध्यान-श्लोक का पद — (चन्द्रघण्टा नाम से) विख्यात।

मंत्र एवं पाठ

Mantras

नाम मंत्र

ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः ॥

ध्यान-श्लोक (नवदुर्गा पूजा-परंपरा — ग्रेड B)

पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता ।
प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता ॥

अर्थ: श्रेष्ठ वाहन पर आरूढ़, प्रचंड कोप के अस्त्रों से युक्त, "चन्द्रघण्टा" नाम से विख्यात देवी मुझ पर कृपा-प्रसाद विस्तारित करें।

तृतीया-अर्चन विधि-मंत्र एवं सप्तशती-पाठ क्रम शब्दशः सत्यापन के साथ भावी मंत्र-सूचकांक विस्तार में — यहाँ नियम-अनुसार असत्यापित पूर्ण-पाठ नहीं छापे गए।

पर्व एवं व्रत

Festivals
नवरात्रि तृतीया
तीसरी रात्रि — चन्द्रघण्टा-पूजन; घंटा-नाद आरती की विशेष संध्या।
तृतीया-नैवेद्य
दुग्ध/खीर अर्पण की लोक-विधि — शांति-वीरता युग्म-कामना (लोक-स्तर)।
घंटा-अर्पण परंपरा
मनौती-पूर्ति पर मंदिरों में घंटा चढ़ाने की जीवित विधि — नाद-देवी का लोक-सम्बन्ध।

मंदिर एवं तीर्थ

Temples
चन्द्रघण्टा मंदिर, वाराणसी
चौक (चित्रघंटा गली) — काशी नवदुर्गा-यात्रा का तृतीय-दिवस मंदिर।
हिमालयी घंटा-मंदिर परंपरा
चितई-गोलू (अल्मोड़ा) आदि घंटा-सहस्र मंदिर — नाद-अर्पण संस्कृति के जीवित क्षेत्र।
नवदुर्गा-मंडप सर्वत्र
तृतीया-संध्या के आरती-नाद — पंडाल-परंपरा का घंटा-दर्शन।

बच्चों के लिए ज्ञान

For Children

सरल परिचय: नवरात्रि के तीसरे दिन की देवी हैं चन्द्रघण्टा! उनके माथे पर आधा चाँद है — पर घंटे के आकार का, इसीलिए यह नाम पड़ा। उनके दस हाथ हैं, वे शेर पर सवार होती हैं, और उनका सबसे बड़ा हथियार है — घंटे की आवाज़! उसे सुनते ही बुरी ताक़तें काँपने लगती हैं, पर भक्तों को वही आवाज़ हिम्मत देती है।

रोचक तथ्य:

  • मंदिर में घुसते ही घंटा क्यों बजाते हैं? — मन का शोर बाहर छोड़ने के लिए!
  • पहले दिन जन्म, दूसरे दिन तपस्या — और तीसरे दिन शक्ति: यही नवदुर्गा का क्रम है।
  • देवी की सवारी शेर है — यानी ग़ुस्से को दबाना नहीं, उसके ऊपर "बैठना" सीखो!
  • चन्द्रघण्टा की पूजा से डर भाग जाता है — वे हिम्मत की देवी हैं।

सीख: सच्चा बहादुर वही है जो नरम भी रह सके — देवी भक्तों के लिए माँ हैं और अन्याय के लिए योद्धा। और अपने इरादे घंटे की तरह साफ़ रखो — जो छिपाकर नहीं जीता, वह कभी नहीं डरता।

मिनी क्विज़:

  1. चन्द्रघण्टा किस दिन पूजी जाती हैं?
  2. उनके नाम का मतलब क्या है?
  3. उनकी कितनी भुजाएँ हैं?
  4. उनका सबसे बड़ा "हथियार" क्या है?