चतुर्थी कूष्माण्डा

Kushmanda · नवदुर्गा-4 · अष्टभुजा · सूर्य-मंडल-वासिनी

नवदुर्गा-मंडल की सबसे विराट कल्पना — वह देवी जिसने सृष्टि रची, पर तप से नहीं, संग्राम से नहीं: एक मंद मुस्कान से। जब चारों ओर केवल अंधकार था, तब जिनकी "ईषत् हास्य" से ब्रह्मांड-अण्ड प्रकट हुआ; और जो स्वयं सूर्य-मंडल के भीतर वास करती हैं — तेज जिनका घर है।

क्रम: नवदुर्गा-चतुर्थी सृष्टि-हेतु: ईषत् हास्य (मंद स्मित) भुजाएँ: अष्ट · वाहन: सिंह वास: सूर्य-मंडल (तेज-लोक)
प्रमुख कथा पढ़ें
आदि-सृष्टि-कर्त्रीजिसकी स्मित से अण्ड-ब्रह्मांड जन्मा
सूर्य-मंडल-वासिनीतेज के केंद्र में जिसका आसन
स्मित-शक्तिहास्य जो सृजन का बल है
आयु-यश-दायिनीआरोग्य-समृद्धि की फल-परंपरा

परिचय एवं दिव्य स्वरूप

Introduction

नवदुर्गा-क्रम की चौथी देवी कूष्माण्डा हैं — "कूष्माण्डेति चतुर्थकम्" (देवी कवच)। नाम का प्रचलित निरुक्त उन्हें सीधा सृष्टि-कर्त्री घोषित करता है — कु (ईषत् — थोड़ा-सा) + ऊष्मा (उष्णता/हास्य की ऊर्जा) + अण्ड (ब्रह्मांड-अण्ड): जिसने हल्की-सी ऊष्मा — मंद-स्मित — से ब्रह्मांड-अण्ड रच दिया। नवदुर्गा-परंपरा कहती है कि जब सृष्टि नहीं थी, दिशाएँ नहीं थीं, प्रकाश का नाम नहीं था — तब इसी देवी की "ईषत् हास्य" से वह अण्ड प्रकट हुआ जिससे सब लोक फूटे; इसीलिए वे आदि-स्वरूपा हैं, आदि-शक्ति हैं।

उनका दूसरा विलक्षण पद उनका निवास है — परंपरा कहती है कि कूष्माण्डा सूर्य-मंडल के भीतर वास करती हैं: वह तेज जिसे कोई देवता सीधे नहीं सह सकता, उनका घर है; सूर्य (D043) को दिशा-ऊर्जा देने वाली शक्ति के रूप में उनका ध्यान किया जाता है — नवदुर्गा-मंडल का यह सबसे "खगोलीय" रूप है। स्वरूप में अष्टभुजा हैं — कमंडलु, धनुष, बाण, कमल, अमृत-कलश, चक्र, गदा और सिद्धि-निधि-दायिनी जपमाला (सूची पाठ-भेद सह); वाहन सिंह; और ध्यान-श्लोक के हाथों में मधु-कलश की वह छवि भी है जो जीवन-रस के आधिपत्य का चिह्न है। लोक-योग परंपरा (ग्रेड C) इन्हें अनाहत (हृदय-चक्र) से जोड़ती है — चौथी रात हृदय के खिलने की रात: सृष्टि जिसने मुस्कान से की, उसकी साधना प्रसन्नता से ही होगी।

परिवार एवं संबंध

Family
  • तत्त्व-पदआदि-शक्ति — सृष्टि-पूर्व स्वरूप; पार्वती-मंडल (D006) का विराट-पद
  • सृष्टि-सम्बन्धत्रिमूर्ति (D001-D003) — अण्ड-सृष्टि के उत्तर-अधिकारी; देवी-भागवत दर्शन में शक्ति प्रथम
  • तेज-सम्बन्धसूर्य (D043) — मंडल-वासिनी; तेज-दायिनी धारा
  • पूर्व-क्रमचन्द्रघण्टा (D063); अग्र-क्रम: स्कन्दमाता (D065)
  • नैवेद्य-स्मृतिकूष्माण्ड (कुम्हड़ा/पेठा) — नाम-सम्बद्ध बलि-नैवेद्य लोक-परंपरा

प्रमुख कथा

Major Story — न्यूनतम 1,000 शब्दों में
प्रमुख कथा / तत्त्व-कथा

जिसकी मुस्कान से ब्रह्मांड — अंधकार के विरुद्ध स्मित का दर्शन

जब कुछ नहीं था — और हँसी हुई

हर परंपरा का अपना सृष्टि-आरम्भ है — और भारतीय वाङ्मय में उसके कई स्तर हैं: नासदीय-सूक्त का महाप्रश्न ("तब न सत् था, न असत्..."), ब्रह्मा (D001) की कमल-कथा, विष्णु (D002) का योग-निद्रा जल, और शाक्त-परंपरा का वह वाचन जो देवी-भागवत से लेकर सप्तशती के "या देवी सर्वभूतेषु" तक गूँजता है — सबसे पहले शक्ति थी। नवदुर्गा-परंपरा इस शाक्त-दर्शन को चौथी रात एक चित्र में बाँध देती है, और वह चित्र विश्व की सृष्टि-कथाओं में अनोखा है। कल्पना कीजिए वह "समय" जब समय नहीं था — न प्रकाश, न अंधकार का साक्षी, न दिशा, न शब्द; केवल निराकार महाशून्य। और उस शून्य में — परंपरा कहती है — आदि-शक्ति ने मंद-सा मुस्कुरा दिया: "ईषत् हास्य"। न संकल्प का घोष, न तप की ज्वाला, न युद्ध का नाद — एक हल्की-सी स्मित; और उस स्मित की ऊष्मा (कु-ऊष्मा) से एक अण्ड प्रकट हुआ — ब्रह्मांड-अण्ड: वह आदि-गोलक जिसके भीतर सारे लोक, सारे तेज, सारे बीज संचित थे। उसी अण्ड से आगे की सृष्टि-प्रक्रियाएँ चलीं — त्रिमूर्ति के अधिकार बँटे, लोक फूटे, प्रकाश जन्मा। ध्यान रहे स्तर-चिह्न का — यह "ईषत्-हास्य सृष्टि" वाचन नवदुर्गा-परंपरा का लोक-पौराणिक पाठ है (ग्रेड B; किसी एक संहिता का उद्धृत-अध्याय नहीं), पर उसका दर्शन-आधार शास्त्र-गंभीर है: ब्रह्मांड-अण्ड (हिरण्यगर्भ) की कल्पना ऋग्वेद (10.121) से पुराणों तक की केंद्र-धुरी है, और "शक्ति सृष्टि से पूर्व है" देवी-भागवत का घोषित सिद्धांत। नवदुर्गा-वाचन ने इन दोनों शास्त्र-सूत्रों को जोड़कर जो चित्र दिया, वह स्त्री-मुख की एक स्मित को विश्व का प्रथम-कारण कहता है — सृजन का मूल स्वर आनंद है, श्रम नहीं

सूर्य-मंडल का घर — तेज में वास

कूष्माण्डा-परंपरा का दूसरा विलक्षण दावा उनका निवास है — वे सूर्य-मंडल के भीतर रहती हैं: एकमात्र देवी-रूप जिसका "पता" एक तारा है। पुराण-लोक कहता है कि सूर्य-लोक का वह तेज, जिसे देव-दानव कोई सीधे सह नहीं सकता, कूष्माण्डा का निज-गृह है — क्योंकि जो तेज की जननी है, तेज उसे क्या जलाएगा; उलटे उनकी देह-कांति ही सूर्य को दीप्ति देती है, और दसों दिशाएँ उनके प्रकाश से आलोकित हैं। इस चित्र को सूर्य-पृष्ठ (D043) की उस कथा के साथ रखिए जहाँ संज्ञा सूर्य-तेज न सह सकीं — देवी-दर्शन का व्यंग्य-मधुर उत्तर यहाँ है: जो तेज पत्नी के लिए असह्य था, वह माता के लिए आसन है — शक्ति-दृष्टि में हर पुरुष-तेज किसी मातृ-शक्ति की गोद में जलता है। दर्शन-भाषा में यह वाचन गूढ़ है — सूर्य समस्त दृश्य-ऊर्जा का स्रोत है; उसके "भीतर" बैठी देवी वह अदृश्य-शक्ति है जो ऊर्जा को ऊर्जा बनाती है: भौतिकी जिस प्राण-बिंदु तक नहीं पहुँचती, पुराण उसे स्त्री-रूप देकर कहता है — तेज भी किसी का पुत्र है। और यही कारण है कि परंपरा कूष्माण्डा-उपासना का फल आरोग्य-आयु-यश गिनाती है — जो सूर्य-शक्ति की स्वामिनी है, वही जीवनी-शक्ति (immunity, तेजस्विता) की दात्री है; चौथी रात का व्रत-विधान वस्तुतः जीवन-ऊर्जा का आवाहन है। नाम-सम्बन्ध की वह मधुर लोक-कड़ी भी यहीं जुड़ती है — "कूष्माण्ड" संस्कृत में कुम्हड़ा (पेठा) भी है: सूर्य-रस से पका, बीजों से भरा वह विशाल फल जो एक बेल से सैकड़ों जन्मा देता है — देवी को कूष्माण्ड-बलि/नैवेद्य की परंपरा (विशेषतः पूर्वी-दक्षिणी अंचलों में) इसी नाम-सूत्र की स्मृति है; कुछ निरुक्त-धाराएँ तो देवी-नाम को ही इस फल-प्रतीक से जोड़ती हैं — जिसके गर्भ में बीज-ही-बीज हैं, वह कूष्माण्डा (दोनों निरुक्त चिह्नित रूप में परंपरा-मान्य)।

चौथी रात का क्रम-स्थान — शक्ति के बाद सृजन

नवदुर्गा-क्रम में कूष्माण्डा का स्थान भी उतना ही अर्थ-गर्भित है जितना उनका नाम। यात्रा देखिए — जन्म (D061), तप (D062), शक्ति (D063)... और चौथा पद सृजन। यह क्रम मनुष्य-जीवन का ही मानचित्र है: पहले अस्तित्व सम्हालो, फिर स्वयं को साधो, फिर बल पाओ — और बल पाकर क्या करना है? परंपरा का उत्तर चौथी रात है: रचो। शक्ति की परिणति संहार नहीं, सृष्टि है — यह क्रम-संदेश इसलिए महत्वपूर्ण है कि चन्द्रघण्टा (D063) के शस्त्रों के ठीक बाद यह स्मित-मुखी सृजन-देवी खड़ी हैं: शस्त्र रक्षा के लिए थे, लक्ष्य सदा निर्माण था। और सृजन की विधि भी ध्यान से — देवी ने ब्रह्मांड "बनाया" नहीं, मुस्कुरा दिया: भारतीय दर्शन की गहन ध्वनि यहाँ लीला-सिद्धांत की है — सृष्टि परमात्मा का परिश्रम नहीं, क्रीड़ा है; आनंद (आनंदमय-कोष) ही मूल-तत्त्व है, और जो कर्म आनंद से उठता है, वही सृजन कहलाने योग्य है। आधुनिक जीवन के लिए इससे सीधा पाठ क्या होगा — जिस काम में तुम्हारी स्मित नहीं, वह तुम्हारा सृजन नहीं; थके हुए संकल्पों से संसार नहीं रचे जाते। चौथी रात की साधना इसीलिए भीतर की प्रसन्नता की साधना है — अनाहत (हृदय) की वह लोक-योग योजना (ग्रेड C — चिह्नित) व्यावहारिक सत्य पर खड़ी है: हृदय खुला हो, तो हाथ जो भी रचें, उसमें प्राण होता है।

आध्यात्मिक अर्थ — अंधकार का उत्तर

कूष्माण्डा-तत्त्व का शिखर-पाठ उस पहले दृश्य में लौटता है — महाशून्य के विरुद्ध स्मित। सोचिए, परंपरा के पास सृष्टि-आरम्भ के लिए कोई भी चित्र हो सकता था — गर्जना, विस्फोट, तप, आदेश; उसने चुनी एक मुस्कान। यह चयन ही उपदेश है: अंधकार का उत्तर अंधकार की शिकायत नहीं — भीतर से उठा हुआ प्रकाश-भाव है। हर मनुष्य के जीवन में वह "सृष्टि-पूर्व क्षण" आता है — जब कुछ नहीं बचा हो: योजनाएँ शून्य, मार्ग अदृश्य, दिशाहीन तम; कूष्माण्डा उस क्षण की देवी हैं — वे कहती हैं कि नव-सृष्टि का बीज विलाप में नहीं, उस ईषत्-हास्य में है जो टूटे हुए मनुष्य के भीतर भी बचा रह जाता है: मुस्कुरा देना शक्ति का न्यूनतम और महत्तम रूप एक साथ है। दूसरा पाठ — छोटे से विराट: "ईषत्" (थोड़ा-सा) से "अण्ड-ब्रह्मांड" — आरम्भ सदा छोटा होता है; बीज से वट, स्मित से सृष्टि, एक दीये से नवरात्र। तीसरा — तेज का मातृत्व: जो ऊर्जा को जन्म देता है, वह ऊर्जा से नहीं डरता; अपने भीतर की शक्ति से भयभीत मत रहो — उसकी माँ बनो, स्वामी बनो। चौथी रात का दीप जलाते हुए उपासक वस्तुतः यही अभ्यास करता है — अंधकार के आगे एक छोटी-सी लौ, और लौ के पीछे एक मुस्कान: कूष्माण्डा-पूजा इतनी ही है, और इतनी ही में पूरा सृष्टि-दर्शन है। ॥ कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ॥

स्रोत टिप्पणी: नाम-क्रम — देवी कवच "कूष्माण्डेति चतुर्थकम्" (ग्रेड A/B); ईषत्-हास्य सृष्टि एवं सूर्य-मंडल-वास — नवदुर्गा लोक-पौराणिक परंपरा (ग्रेड B — प्रचलित व्रत-साहित्य; एक-संहिता-उद्धरण नहीं, स्पष्ट चिह्नित); दर्शन-आधार: हिरण्यगर्भ/अण्ड-सृष्टि — ऋग् 10.121 एवं पुराण-सामान्य (ग्रेड A); शक्ति-प्राथम्य — देवी-भागवत/सप्तशती दर्शन (ग्रेड A); कु-ऊष्मा-अण्ड निरुक्त एवं कूष्माण्ड-फल निरुक्त — परंपरा-निरुक्त द्वि-धारा (ग्रेड B — दोनों चिह्नित); कूष्माण्ड-नैवेद्य — लोक-विधि (ग्रेड C); ध्यान-श्लोक "सुरासम्पूर्णकलशं..." — प्रचलित पूजा-पाठ (ग्रेड B — सप्तशती-मूल में नहीं); अष्ट-आयुध सूची पाठ-भेद चिह्नित; अनाहत-योजना — लोक-योग (ग्रेड C)। लीला-सिद्धांत सन्दर्भ वेदांत-सामान्य (ग्रेड B)। अर्थ-अनुच्छेद व्याख्या-स्तर।

नाम एवं अर्थ

Names
कूष्माण्डा
कु (ईषत्) + ऊष्मा + अण्ड — स्मित-ऊष्मा से ब्रह्मांड-अण्ड रचने वाली।
आदि-स्वरूपा
सृष्टि-पूर्व सत्ता — आदि-शक्ति पद।
सूर्य-मंडल-वासिनी
सूर्य-लोक के भीतर निवास करने वाली — तेज-गृहा।
अष्टभुजा
आठ भुजाओं वाली — सिद्धि-निधि दायिनी रूप।
कूष्माण्ड-प्रिया
कुम्हड़ा-नैवेद्य की लोक-स्मृति — फल-निरुक्त धारा।

मंत्र एवं पाठ

Mantras

नाम मंत्र

ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः ॥

ध्यान-श्लोक (नवदुर्गा पूजा-परंपरा — ग्रेड B)

सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च ।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे ॥

अर्थ: जो अपने कर-कमलों में सुरा-पूर्ण कलश एवं रुधिर-प्लुत (रक्त-रस) पात्र धारण करती हैं, वे कूष्माण्डा मुझे शुभ (कल्याण) दें। (कलश-प्रतीक जीवन-रस/ऊर्जा-रस के आधिपत्य के तंत्र-चिह्न हैं — प्रतीक-स्तर नोट।)

चतुर्थी-अर्चन विधि-मंत्र शब्दशः सत्यापन के साथ भावी मंत्र-सूचकांक विस्तार में — यहाँ नियम-अनुसार असत्यापित पूर्ण-पाठ नहीं छापे गए।

पर्व एवं व्रत

Festivals
नवरात्रि चतुर्थी
चौथी रात्रि — कूष्माण्डा-पूजन; तेज-आरोग्य कामना का दिवस।
चतुर्थी-नैवेद्य
मालपुआ-अर्पण की लोक-विधि; कूष्माण्ड (पेठा) नैवेद्य-परंपरा अंचल-भेद से।
सूर्य-षष्ठी सूत्र
सूर्य-मंडल-वासिनी का छठ-सूर्य पर्व-जाल से दर्शन-सूत्र (D043)।

मंदिर एवं तीर्थ

Temples
कूष्माण्डा (कुष्मांडा) देवी, घाटमपुर
कानपुर-क्षेत्र (उ.प्र.) का प्रसिद्ध कुष्मांडा-धाम — जल-रिसती विग्रह-मान्यता।
कूष्माण्डा मंदिर, वाराणसी
दुर्गाकुंड (दुर्गा-मंदिर परिसर-परंपरा) — काशी नवदुर्गा-यात्रा का चतुर्थ-दिवस।
नवदुर्गा-मंडप सर्वत्र
चतुर्थी-आराधना का पंडाल-जाल — जीवित लोक-दर्शन।

बच्चों के लिए ज्ञान

For Children

सरल परिचय: सोचो — जब कुछ भी नहीं था, न सूरज, न तारे, न रोशनी... तब क्या हुआ? कहते हैं, देवी माँ हल्के-से मुस्कुराईं — और उसी मुस्कान से पूरा ब्रह्मांड बन गया! यही हैं चौथे दिन की देवी कूष्माण्डा। वे सूरज के अंदर रहती हैं — इतने तेज में, जहाँ कोई और नहीं रह सकता!

रोचक तथ्य:

  • उनके नाम में छिपा है ब्रह्मांड — कु + ऊष्मा + अण्ड = "थोड़ी-सी गर्मी (मुस्कान) से अंडा (ब्रह्मांड) बनाने वाली"!
  • संस्कृत में "कूष्माण्ड" का मतलब कुम्हड़ा (पेठा) भी है — इसीलिए कहीं-कहीं देवी को पेठे का भोग लगता है।
  • उनकी आठ भुजाएँ हैं, इसलिए उन्हें अष्टभुजा भी कहते हैं।
  • उनकी पूजा से सेहत और ताक़त मिलती है।

सीख: मुस्कान छोटी चीज़ नहीं — उससे तो ब्रह्मांड बन गया था! जब सब मुश्किल लगे, तो शिकायत से नहीं, हिम्मत-भरी मुस्कान से शुरुआत करो।

मिनी क्विज़:

  1. कूष्माण्डा ने ब्रह्मांड कैसे बनाया?
  2. वे कहाँ रहती हैं?
  3. उनकी कितनी भुजाएँ हैं?
  4. "कूष्माण्ड" का दूसरा मतलब क्या है?