आधा देना, पूरा होना — अर्धनारी-प्राकट्य और भृंगी का पाठ
पृष्ठभूमि — सृष्टि जो आगे नहीं बढ़ती थी
पुराणों की मुख्य प्राकट्य-कथा सृष्टि के आरंभिक गतिरोध की है। ब्रह्मा (D001) ने मानस-पुत्र रचे — पर वे सब तपोमुख विरागी निकले; प्रजा-विस्तार का चक्र चलता ही नहीं था, क्योंकि रची गई सृष्टि में अभी केवल एक ही तत्त्व था — पौरुष; "दूसरे" का सिद्धांत ही अनुपस्थित था। हताश ब्रह्मा ने महादेव का ध्यान किया, और उत्तर में जो प्रकट हुआ उसने सृष्टिकर्ता की आँखें खोल दीं — एक ऐसा रूप जो आधा पुरुष था, आधा स्त्री: अर्धनारीश्वर। संकेत स्पष्ट था — सृजन के लिए दो चाहिए, और वे "दो" मूल में एक ही सत्ता के दो पक्ष हैं। रुद्र ने अपने वाम-अर्ध से देवी को पृथक् किया; ब्रह्मा की स्तुति पर देवी ने सृष्टि-हेतु शक्ति-अंश प्रदान किया (धाराओं में — दक्ष-कन्या रूप में अवतरण का वचन: यही आगे सती-पार्वती की कथा-रेखा है, D006), और तब मिथुन-सृष्टि का प्रवाह खुला। लिंग-शिव पुराणों की यह कथा जितनी सरल दिखती है, उतनी ही मौलिक है — यह "स्त्री-तत्त्व" को सृष्टि में जोड़ी गई कोई द्वितीयक कड़ी नहीं कहती; वह आदि-सत्ता के भीतर सदा से था — प्रकट भर हुआ। अर्थात नारी पुरुष से नहीं निकली — दोनों अर्धनारीश्वर से निकले: भारतीय सृष्टि-दर्शन का यह वाक्य विश्व-कथाशास्त्र में अपनी टक्कर का अकेला है।
भृंगी की परिक्रमा — आधे की भक्ति का उत्तर
दूसरी कथा दक्षिण की शैव-स्थल परंपरा का रत्न है — भृंगी ऋषि का आख्यान (ग्रेड B — तमिल शैव/स्थल-पुराण धारा, उत्तर-पुराणों में छाया-रूप)। भृंगी शिव के अनन्य — पर एकांगी — भक्त थे: वे केवल शिव को मानते, देवी को प्रणाम तक नहीं करते थे। कैलास में नित्य-परिक्रमा का उनका नियम था — पर केवल शिव की; पार्वती को बाहर छोड़कर। देवी ने एक दिन खेल-कौतुक में शिव की गोद में आसन लिया — परिक्रमा-पथ बंद; भृंगी भ्रमर (भृंग) बनकर दोनों के बीच के सूक्ष्म अंतराल से निकल भागे। तब प्रभु ने वह किया जिसके आगे हठ की सारी उड़ानें व्यर्थ थीं — देह ही एक कर ली: अर्धनारीश्वर। अब बीच में छिद्र कहाँ? पर हठी भक्त की श्रद्धा भी विलक्षण थी — कथा कहती है कि भृंगी ने भ्रमर-रूप से युग्म-देह के मध्य छेदन का दुस्साहस किया। देवी का रोष अब न्याय बना: स्त्री-अंश से ही तो देह में रक्त-मांस है (परंपरा-शरीरशास्त्र: अस्थि-शुक्र पितृ-अंश, रक्त-मांस मातृ-अंश) — देवी ने अपना अंश खींच लिया, और भृंगी अस्थि-पंजर मात्र रह गए — खड़े होने तक में असमर्थ। करुणा-निधान युगल ने तब उन्हें तीसरा चरण दिया — त्रिपाद भृंगी (दक्षिण के मंदिरों में तीन-पैरों वाले कंकाल-से भृंगी-विग्रह आज भी नटराज-सभाओं में खड़े हैं)। हठ टूटा; भृंगी ने अर्ध-नारी को प्रणाम किया — और परंपरा को उसका सबसे नाटकीय पाठ मिला: शिव की भक्ति में से शक्ति को घटाया नहीं जा सकता; जो घटाएगा, वह स्वयं घटकर अस्थि-शेष रह जाएगा — क्योंकि जीवन का रस-पक्ष ही देवी है।
पार्वती का अर्ध-आसन — तप की धारा
तीसरी, कोमल धारा देवी-पक्ष से चलती है (स्कंद/शिव-परंपरा एवं दक्षिण स्थल-कथाएँ): पार्वती ने एक बार खेल में शिव के नेत्र मूँदे और जगत् क्षण-भर अंधकार में डूबा — प्रायश्चित-तप के लिए वे कांची (या धाराओं में अन्य क्षेत्र) गईं; तप ऐसा कि प्रभु का वाम-अर्ध ही उन्हें आसन रूप में मिला। एक अन्य लोक-प्रिय रूपांतर में देवी ने प्रत्यक्ष वर माँगा — "आपसे क्षण-भर का भी वियोग न हो, ऐसा स्थान दीजिए" — और उत्तर में स्थान नहीं, स्वयं का आधा मिला: प्रेम की माँग जितनी बड़ी थी, उत्तर उससे बड़ा। तिरुचेंगोडे (तमिलनाडु) का पर्वत-शिखर मंदिर इसी युग्म-रूप का प्रधान जीवित पीठ है — "अर्धनारीश्वरर्" वहाँ पहाड़ी के स्वामी हैं और तमिल-परंपरा उन्हें "माधोरुबागन्" (जिसके एक भाग में उमा हैं) कहती है; एलिफेंटा की छठी-शती गुहा में यही दर्शन पाषाण-महाकाव्य बना — त्रिमूर्ति-सद्म के पार्श्व में विश्राम-भंगिमा का वह अर्धनारीश्वर, जिसे विश्व-कला इतिहास भारतीय मूर्ति-चिंतन के उदाहरण-शिखरों में गिनता है; बादामी-गुहा, खजुराहो और चोल-कांस्यों की माला इसी की परंपरा है। शिल्प-लक्षण ग्रंथ (आगम) अंग-विभाजन का सूक्ष्म विधान देते हैं — दक्षिण-जटा में गंगा-चंद्र, वाम-केश में सीमंत-सिंदूर; दायीं भुजा में त्रिशूल/परशु, बायीं में दर्पण/नीलोत्पल; आधा वृषभ, आधा सिंह वाहन-पीठ — आधे-आधे में भी प्रत्येक पक्ष अपनी पूर्ण गरिमा से।
दर्शन-पक्ष — सांख्य से तंत्र तक
अर्धनारीश्वर केवल कथा नहीं, दर्शन-संहिता है। सांख्य की भाषा में यह पुरुष (चैतन्य-साक्षी) और प्रकृति (क्रियाशील जगत्-शक्ति) का युग्म-चित्र है — सांख्य उन्हें द्वैत रखता है, पर विग्रह उन्हें एक देह देकर वेदांत-तंत्र की ओर ले जाता है: चैतन्य और उसकी शक्ति भिन्न पदार्थ नहीं, अग्नि और उष्णता हैं। तंत्र-आगम इसी को शिव-शक्ति सामरस्य कहते हैं — सौंदर्यलहरी की प्रथम पंक्ति का सार यही है कि शक्ति-युक्त होकर ही शिव सृजन-समर्थ हैं। व्याकरण-काव्य पक्ष कालिदास का है — वाक् (शब्द) और अर्थ की तरह संपृक्त: शब्द के बिना अर्थ गूँगा, अर्थ के बिना शब्द खोखला — जगत् के माता-पिता का यही संबंध है। और वैदिक-छाया भी परंपरा दिखाती है — बृहदारण्यक का आदि-पुरुष जो अकेलेपन से "द्वितीय" की इच्छा में स्वयं को दो में विभक्त करता है (उपनिषद्-स्तर, दार्शनिक समांतर — ग्रेड A पाठ, योजना-संबंध ग्रेड B)। आधुनिक विमर्श में यह विग्रह लिंग-भेद की कठोर दीवारों पर भारतीय परंपरा का प्राचीन प्रश्न-चिह्न भी माना जाता है — हर व्यक्ति में दोनों तत्त्व हैं, और पूर्णता उनके संतुलन में है; मनोविज्ञान की अनिमा-अनिमस भाषा से बहुत पहले हमारे शिल्पियों ने यह छेनी से कह दिया था।
आध्यात्मिक अर्थ — विवाह से अभेद तक
इस स्वरूप के पाठ सीधे घर तक आते हैं। पहला — अर्धांगिनी-धर्म: भारतीय विवाह-कल्पना का आदर्श स्वामित्व नहीं, अर्ध-अंगत्व है; अर्धनारीश्वर दांपत्य का ध्येय-चित्र है — दो व्यक्तित्व जो एक-दूसरे को मिटाए बिना एक हो जाएँ: शिव-पक्ष में जटा यथावत, देवी-पक्ष में वेणी यथावत — एकता का अर्थ एकरूपता नहीं। दूसरा — भृंगी-चेतावनी: उपासना में पक्षपात आत्म-हानि है; जो जीवन में से कोमलता (या दृढ़ता) को "कम महत्त्व का" कहकर काटता है, वह अपना ही आधा काट रहा है — अस्थि रह जाएगी, रस नहीं। तीसरा — भीतर का संतुलन: हर साधक के भीतर शिव भी है (वैराग्य, स्थिरता, संहार-सामर्थ्य) और शक्ति भी (करुणा, सृजन, गति); साधना दोनों का विवाह है — केवल-वैराग्य सूखा है, केवल-राग बिखरा; अर्धनारी वह मध्य-रेखा है जहाँ योगी और प्रेमी एक आसन पर बैठते हैं। और चौथा — विवादों का विग्रह-उत्तर: शैव-शाक्त, पुरुष-स्त्री, निर्गुण-सगुण — भारतीय मनीषा ने अपने गहनतम द्वंद्वों का उत्तर तर्क-ग्रंथ से नहीं, एक मूर्ति से दिया; जो आँख इस विग्रह को एक बार ठीक से देख ले, वह "कौन बड़ा" पूछना भूल जाती है — यही इसका शाश्वत अनुग्रह है।