मोह से मोह काटना — अमृत-पंक्ति से भस्मासुर-नृत्य तक
पृष्ठभूमि — कलश जो युद्ध बनने वाला था
समुद्र-मंथन (D002 कथा 1, D017) के चरम पर धन्वंतरि अमृत-कलश लेकर प्रकट हुए — और सहस्राब्दियों का देव-दानव सहकार उसी क्षण छिन्न हो गया: दैत्यों ने कलश झपट लिया, अपने ही दल में "पहले मैं" का कलह छिड़ा, और देव-पंक्ति हताश खड़ी रह गई — मंथन का श्रम साझा था, फल एक पक्ष की मुट्ठी में। विष्णु ने वह मार्ग चुना जो उनकी नीति-लीलाओं का शिखर है — युद्ध नहीं (युद्ध में अमृत-कलश ही खंडित हो सकता था), मोह। और तब क्षीरसागर-तट पर वह रूप प्रकट हुआ जिसका वर्णन करते भागवतकार की लेखनी भी अलंकार-सागर हो जाती है (8.8.41-46): श्याम-केश में मल्लिका, कंपित कुंडल, करधनी की किंकिणी, और वह चितवन जिसने दैत्य-कलह को क्षण में विराम दे दिया — झगड़ते असुर स्वयं उस सुंदरी को पंच बनाने पर एकमत हो गए: "देवि! तुम ही बाँट दो।" मोहिनी की पहली विजय यही थी — उसने अमृत माँगा नहीं; ऐसा रचा कि देने वाले स्वयं सौंप गए।
वितरण-नीति — पंक्ति, प्रतिज्ञा और राहु
मोहिनी ने शर्त रखी — मैं जो करूँ, कोई टोकेगा नहीं; "स्त्री का विश्वास भी क्या" जैसी चतुर आत्म-निंदा से उसने दैत्यों का संदेह ही निःशस्त्र कर दिया (भागवत की सूक्ष्म व्यंग्य-कला)। दो पंक्तियाँ बनीं — देव इधर, दैत्य उधर; और कलश से धारा केवल देव-पंक्ति में बहने लगी: रूप-दर्शन में डूबे दैत्य "अभी हमारी बारी आएगी" के मोह में प्रतीक्षा करते रहे — जिनका बल छीनने में था, वे शिष्टता निभाते रह गए। एक ने भेद पकड़ा — स्वरभानु दैत्य देव-वेश धरकर सूर्य-चंद्र के मध्य जा बैठा और अमृत-घूँट पा गया; सूर्य-चंद्र के संकेत पर मोहिनी-रूपधारी हरि का सुदर्शन चला — कंठ-नीचे उतरने से पूर्व ही शीश कटा: अमृत-स्पृष्ट शीश "राहु" और धड़ "केतु" होकर छाया-ग्रह बने, और सूर्य-चंद्र से उनका ग्रहण-वैर आज तक पंचांगों में गिना जाता है (राहु-केतु D052/D053-क्षेत्र; ग्रहण-कथा का यही उद्गम)। वितरण पूर्ण होते ही मोहिनी पुनः चतुर्भुज हरि — दैत्यों के हाथ रीता कलश और खुली आँखें। भागवत यहाँ नीति-सूत्र मुखर करता है: असुरों का बल-श्रम व्यर्थ गया क्योंकि फल-लोभ ने उनका विवेक हर लिया था — और यह भी कि प्रभु ने देव-पक्ष लिया तो पक्षपात से नहीं, पात्रता से: अमृत उसी पंक्ति में बहा जहाँ उसे धारण करने का संयम था।
भस्मासुर — वरदान जो वर देने वाले पर चला
मोहिनी की दूसरी महाकथा पुराण-लोक संगम की है (ग्रेड B/D — शिव-पुराण धाराओं और दक्षिण स्थल-लोक में विस्तृत, पाठ-भेद सहित)। वृकासुर — लोक-नाम भस्मासुर — ने शिव (D003) से घोर तप कर वह वर पा लिया जिसकी भयावहता वर देते समय भोलेनाथ की करुणा ने नहीं तौली: जिसके शीश पर हाथ रखूँ, वह भस्म हो जाए। वर मिलते ही परीक्षा की सूझी — और प्रथम लक्ष्य चुना स्वयं वरदाता का शीश! महादेव आगे-आगे, असुर पीछे-पीछे — त्रिलोक स्तब्ध कि वर-वचन से बँधे शिव पलट भी नहीं सकते। तब हरि ने मोहिनी-रूप धरा और मार्ग में प्रकट हुए। असुर ठिठका — तप का उद्देश्य ही बदल गया: अब उसे वह सुंदरी चाहिए थी। मोहिनी ने शर्त रखी — मुझे वही वरे जो मेरे संग नृत्य में मेरी हर मुद्रा दोहरा सके। नृत्य चला — अंग-अंग मुद्राएँ, असुर मोह में यंत्रवत् अनुकरण करता गया; और तब वह मुद्रा आई जिसमें नर्तकी की हथेली क्षण-भर को अपने ही शीश पर टिकी। भस्मासुर की हथेली भी उठी... और वर ने वरदाता का काम पूरा कर दिया — असुर अपनी ही अग्नि में भस्म। इस कथा का सौंदर्य उसका न्याय-शिल्प है: मोहिनी ने असुर को छला नहीं — उसने केवल दर्पण रचा; विनाश-बुद्धि अपने ही प्रतिबिंब से भस्म हुई। (दक्षिण की स्थल-परंपराएँ इस नृत्य-भूमि के अपने-अपने दावे रखती हैं — ग्रेड D।)
शिव-मोह और शास्ता-धारा — माया की अंतिम परीक्षा
तीसरा प्रसंग भागवत (8.12) का दार्शनिक-गंभीर अध्याय है। अमृत-लीला की चर्चा सुन शिव स्वयं उस रूप के दर्शन-कुतूहल में सती-सहित हरि के पास आए; विष्णु ने पहले टाला — फिर उद्यान में वह रूप प्रकट किया: गेंद खेलती, वस्त्रांचल सम्हालती मोहिनी। और भागवत निर्भीक लिखता है कि योगियों के भी योगी महादेव क्षण को अपनी सुध खो बैठे — मोह ऐसा कि देवी-सम्मुखता का भान न रहा; प्रभु के पीछे दौड़े महादेव जहाँ-जहाँ गए, वहाँ-वहाँ उनका तेज-पात हुआ (उन स्थलों के तीर्थ-दावे दक्षिण-परंपरा में)। मोह-भंग हुआ तो लज्जा नहीं — बोध हुआ: शिव ने मुस्कुराकर कहा कि आपकी माया के पार तो मैं भी नहीं — यह स्वीकार ही प्रसंग का प्रयोजन था; भागवत की टिप्पणी है कि यह लीला हरि ने शिव के लघुत्व हेतु नहीं, जीव-मात्र की शिक्षा हेतु रची — जब आदि-योगी क्षण को विचलित हो सकते हैं, तो साधक माया को कभी "जीत ली" न समझे: सतर्कता ही एकमात्र कवच। इसी मिलन की दक्षिण-धारा (ग्रेड B — केरल-तमिल परंपरा, भागवत-मूल में शास्ता-जन्म स्पष्ट नहीं — भेद चिह्नित) हरि-हर के तेज-संगम से महाशास्ता/अय्यनार के जन्म की है, जिनके अवतार-क्रम में शबरिमला के धर्मशास्ता अयप्पा (D089) दक्षिण के महानतम तीर्थ-नायकों में हैं: मोहिनी इस तरह शैव-वैष्णव धाराओं की "सेतु-माता" भी है — करोड़ों की शबरिमला-यात्रा में यही हरिहर-सुत गूँज है।
आध्यात्मिक अर्थ — माया किसकी सेविका है
मोहिनी-तत्त्व के पाठ बारीक हैं — तलवार के नहीं, सुई के काम। पहला — बुद्धि बल से बड़ी है: अमृत-प्रसंग में एक भी शस्त्र नहीं उठा; जो कलश महायुद्ध से न लौटता, वह विनयन-नीति से लौट आया — संकट में पहला अस्त्र मति है, और मति का श्रेष्ठ रूप वह जो विपक्षी से "हाँ" कहलवा ले। दूसरा — मोह की दिशा: वही मोह जो दैत्यों का नाश बना, देवों की रक्षा बना — माया स्वयं शुभ-अशुभ नहीं; प्रश्न यह है कि उसकी डोर किसके हाथ है: प्रभु-हाथ की माया लीला है, अहं-हाथ की माया फंदा। तीसरा — भस्मासुर-दर्पण: विनाश-शक्ति माँगने वाला अंततः उसे अपने ही शीश पर पाता है — मोहिनी-नृत्य नियति का वह शिष्ट रूप है जो दुष्ट को दंड नहीं देता, उसकी अपनी हथेली उसे सौंप देता है। चौथा — शिव-मोह की विनम्रता: साधना की सबसे खतरनाक अवस्था "अब मुझे माया नहीं ब्याप सकती" का विश्वास है; भागवत ने स्वयं महादेव का उदाहरण रखकर हर साधक का यह दर्प पहले ही तोड़ दिया। और अंतिम — रूप-अभेद: वही नारायण शंख-चक्रधारी भी, मोहन-नर्तकी भी; रयाली का द्विमुख विग्रह जो पाठ पत्थर में कहता है, वही इस पूरे चरित का सार है — परम-सत्ता के लिए स्त्री-पुरुष वेश-भेद भर है, तत्त्व-भेद नहीं; जो उपासक रूप पर अटका, वह मोहिनी से ठगा गया — जो रूप के भीतर हरि देख गया, उसके लिए मोहिनी भी मुक्ति-द्वार है।