मणिकंठ — गले में घंटी वाला राजकुमार
पम्पा-तट का शिशु
केरल के पंदलम राज्य के नरेश राजशेखर निःसंतान थे — यह पीड़ा उनके राजमुकुट से भारी थी। एक दिन आखेट से लौटते हुए पम्पा नदी के तट पर उन्हें एक अलौकिक शिशु मिला — तेजस्वी, शांत, और गले में स्वर्ण-घंटी बँधी हुई। राजा ने उसे गोद उठाया तो लगा जैसे रिक्त गोद के लिए ही यह शिशु उतरा हो; गले की मणि-घंटी से नाम पड़ा — मणिकंठ। परंपरा पर्दे के पीछे की कथा जानती है: यह शिशु हरि-हर का पुत्र था — भस्मासुर-प्रसंग (D029) के बाद शिव के आग्रह पर विष्णु ने जो मोहिनी-रूप पुनः धारण किया, उसी संयोग से जन्मा दिव्य बालक, जिसे महिषी-वध के प्रयोजन से भू-लोक भेजा गया था (स्थल-पुराण धारा — ग्रेड B; मोहिनी-प्रसंग का पुराण-आधार D029 पर विस्तृत)। मणिकंठ पंदलम के राजमहल में बड़े हुए — शस्त्र और शास्त्र दोनों में अद्वितीय; गुरु-दक्षिणा का प्रसंग उनकी पहली प्रकट-लीला बना: गुरु ने दक्षिणा में अपने मूक-बधिर पुत्र के लिए वाणी माँगी, और मणिकंठ के स्पर्श से बालक बोल उठा — गुरु समझ गए कि शिष्य कौन है, पर मौन रहे।
महल का षड्यंत्र और दूध-शेरनी
कथा का मानवीय अध्याय अब खुलता है। मणिकंठ के आने के बाद रानी को अपना पुत्र हुआ — राजराजन। उत्तराधिकार का प्रश्न उठा, और मंत्री (दीवान) की कुटिल सलाह ने रानी के मातृ-मोह को विष दिया: गोद लिया बालक राज्य ले जाएगा। षड्यंत्र रचा गया — रानी ने असाध्य शिर-पीड़ा का अभिनय किया; वैद्य (षड्यंत्र में सम्मिलित) ने व्यवस्था दी कि उपचार एक ही है — शेरनी का दूध, और वह भी ताज़ा। गणित साफ़ था: बारह वर्ष का किशोर शेरनियों के वन से लौटेगा नहीं। पर यहीं कथा अपना पहला महावाक्य कहती है — मणिकंठ ने जानते हुए भी विष-प्रस्ताव को सेवा-अवसर की तरह उठाया: "माँ के लिए दूध मैं लाऊँगा।" वन में उनकी प्रतीक्षा नियति कर रही थी — महिषी: महिषासुर-वंश की वह प्रतिशोध-तप्ता असुरी (D009-मंडल का दक्षिण-विस्तार), जिसे वरदान था कि उसे केवल हरि-हर का पुत्र ही मार सकेगा — यानी उसकी दृष्टि में कोई नहीं, क्योंकि ऐसा पुत्र असम्भव था। असम्भव सामने खड़ा था। युद्ध हुआ — परंपरा अळुदा-तट और अळुदा-पर्वत के नाम उस रण से जोड़ती है — और महिषी का दर्प चूर हुआ; वध नहीं, मुक्ति: शाप-बद्ध वह पूर्व-जन्मा (लीला-धारा में दत्तात्रेय-सम्बन्धित प्रसंग से शापित) असुरी-देह से छूट गई। और तब वन ने वह दृश्य देखा जो मूर्ति-कला का प्रिय विषय बना — शेरनी पर सवार मणिकंठ, पीछे शावकों की पंक्ति: देवराज इन्द्र (D039) और देव-गण ही व्रत-परीक्षा पूर्ण होने पर शेरनी-शावक बने थे। महल पहुँचे तो षड्यंत्र स्वयं नतमस्तक था — शेरनी का दूध दुहने की आवश्यकता नहीं पड़ी; रोग वहीं समाप्त हो गया जहाँ से उपजा था — भय से।
शरम्-कुत्ती — बाण जहाँ रुका, मंदिर वहाँ बना
राजा राजशेखर लज्जा और प्रेम से भर कर मणिकंठ को राज्य देने खड़े हुए — पर मणिकंठ का प्रयोजन पूर्ण हो चुका था। उन्होंने पिता से कहा: मेरा सिंहासन महल में नहीं, पहाड़ पर है। उन्होंने बाण चलाया — बाण जहाँ गिरा, वह स्थान शरम्-कुत्ती (बाण-चिह्न) कहलाया, और उसी के पास की पहाड़ी — शबरीमला (रामायण की शबरी की स्मृति से जुड़ा नाम — D013-मंडल की भक्तिन) — उनका नित्य-धाम बनी। जाते-जाते उन्होंने पिता को वही विधान सौंपा जो आज तक अक्षरशः चलता है: मेरा मंदिर बनवाना, पर मेरे दर्शन की शर्त रहेगी — 41 दिन का व्रत; भक्त जब आए तो सिर पर इरुमुडी (दो गाँठों की पोटली — आगे की गाँठ में मेरे अभिषेक का घी-भरा नारियल, पीछे की गाँठ में यात्री का अपना राशन) लेकर आए; और 18 सीढ़ियाँ केवल वही चढ़े जिसके पास इरुमुडी हो। पंदलम राज-परिवार ने मंदिर बनवाया — और आज भी अयप्पा के आभूषण (तिरुवाभरणम्) हर मकर-संक्रांति पर पंदलम राजमहल से शोभायात्रा में शबरीमला पहुँचते हैं: गोद लेने वाला वंश तीन सहस्र वर्ष बाद भी पुत्र के शृंगार का अधिकारी है — कथा और भूगोल का ऐसा जीवित गूँथन भारत में भी विरल है।
वावर — मित्रता जो विधि बन गई
शबरीमला-मंडल का एक पात्र ऐसा है जो इस कथा को भारत की साझी विरासत का दस्तावेज़ बना देता है — वावर। परंपरा उन्हें अरब-मूल का योद्धा-नाविक कहती है (धाराओं में समुद्री सरदार या व्यापारी), जो मणिकंठ से युद्ध में भिड़ा और हारकर — या उनके तेज से जीतकर — उनका अभिन्न सहचर हो गया; उदयनन् जैसे दस्यु-दमन के अभियानों में वह अयप्पा का सेनानी रहा (स्थल-पुराण/लोक-धारा — ग्रेड B/C, विवरण-भेद चिह्नित)। अयप्पा ने विदा लेते समय आदेश दिया था कि मेरे भक्त पहले वावर का सम्मान करें — और परंपरा ने इसे शब्दशः निभाया: एरुमेली की वावर-मस्जिद (वावरु पळ्ळि) की प्रदक्षिणा-वंदना आज भी लाखों हिंदू तीर्थयात्रियों की विधि का अंग है, और मुस्लिम परिवार पीढ़ियों से उस दरगाह की सेवा करते हुए अयप्पा-यात्रियों को विभूति-प्रसाद देते हैं। पेट्टा-तुळ्ळल का उन्मुक्त नृत्य इसी पड़ाव पर होता है। एक धर्म के महातीर्थ की अनिवार्य-विधि में दूसरे धर्म का प्रार्थना-स्थल — हरिहर-सुत ने दो देव-धाराओं को ही नहीं, दो पंथों को भी एक रास्ते पर चला दिया।
व्रतम् — 41 दिन का लोकतंत्र
अयप्पा-दर्शन की महिमा उसकी शर्त में है — और वह शर्त भारतीय उपासना का सबसे बड़ा सामाजिक प्रयोग बन गई। मंडलम्-व्रत के 41 दिन: ब्रह्मचर्य, सात्त्विक भोजन, मद्य-मांस-त्याग, नंगे पाँव, काले/नीले वस्त्र, तुलसी-रुद्राक्ष माला, दिन में दो बार स्नान-पूजा, कटु-वचन और हिंसा का त्याग — और सबसे क्रांतिकारी नियम: व्रतधारी को सब "स्वामी" कहकर पुकारते हैं, और वह भी हर व्रतधारी को "स्वामी" कहता है। मालिक और मज़दूर, न्यायाधीश और अभियुक्त — काले वस्त्र और 41 दिन के तप में सब एक पद: अयप्पन् सब में, सब अयप्पन् में। एरुमेली की वावर-वंदना (ऊपर वर्णित) इसी मार्ग का पड़ाव है। अंत में पम्पा-स्नान, नीलिमला की चढ़ाई, और वे पतिनेट्टाम्-पडि — 18 पवित्र सीढ़ियाँ (व्याख्या-धाराएँ: पंच-इंद्रियाँ + अष्ट-राग + त्रिगुण + विद्या-अविद्या — गिनती-भेद परंपराओं में): हर सीढ़ी पर एक बंधन छूटता है, और द्वार के ऊपर लिखा महावाक्य प्रतीक्षा करता है — तत्त्वमसि (छांदोग्य 6.8.7)। जिस भक्त को 41 दिन सबने "स्वामी" कहा, वह "स्वामिये शरणम्" पुकारता शिखर पर पहुँचता है, और द्वार उत्तर देता है — जिसकी शरण माँग रहा है, वह तू ही है। भक्ति से आरम्भ कर वेदांत पर पूर्ण होने वाली यह सीढ़ी-दर-सीढ़ी यात्रा — अयप्पा-धर्म का सार है: तप सबको बराबर करता है, और बराबरी की पराकाष्ठा अभेद है। ॥ स्वामिये शरणम् अय्यप्पा ॥