द्वितीया ब्रह्मचारिणी

Brahmacharini · नवदुर्गा-2 · तपश्चारिणी · अपर्णा

नवरात्रि की दूसरी रात उस देवी की है जिसके हाथों में शस्त्र नहीं — जपमाला और कमंडलु हैं। श्वेत-वसना, नंगे पाँव, तप में खड़ी ब्रह्मचारिणी — पार्वती के उस युग का रूप, जब उन्होंने शिव को पाने के लिए वह तप किया जिसे देखकर स्वयं तप काँप गया: फल त्यागे, पत्ते त्यागे — और "अपर्णा" कहलाईं।

क्रम: नवदुर्गा-द्वितीया कर-चिह्न: जपमाला · कमंडलु व्रत-नाम: अपर्णा (पत्र-त्याग) योग-सूत्र: स्वाधिष्ठान (लोक-योग)
प्रमुख कथा पढ़ें
तपश्चारिणीतप ही जिसका पथ और परिचय
अपर्णापत्ते तक त्यागने वाली व्रत-मूर्ति
जप-निष्ठाअक्षमाला — निरंतरता का यंत्र
प्रेम-तपस्याप्रेम जो माँगता नहीं — तपता है

परिचय एवं दिव्य स्वरूप

Introduction

नवदुर्गा-क्रम की दूसरी देवी ब्रह्मचारिणी हैं — "द्वितीयं ब्रह्मचारिणी" (देवी कवच)। नाम का अर्थ ध्यान से पढ़िए — ब्रह्मचारिणी अर्थात् ब्रह्म (तप/वेद/परम-तत्त्व) का आचरण करने वाली: यह विवाह-पूर्व अवस्था-मात्र का नहीं, साधना-पद्धति का नाम है। शैलपुत्री (D061) जन्म-रूप थीं — पर्वत-गृह की नन्ही देवी; ब्रह्मचारिणी वही देवी हैं युवा तपस्विनी रूप में: वह युग जब नारद-वाणी सुनकर पार्वती (D006) ने शिव-प्राप्ति का संकल्प लिया और घर-वैभव त्यागकर तप-वन चुना।

स्वरूप-ध्यान में उनके पास न वाहन है, न शस्त्र — नंगे पाँव खड़ी श्वेत-वसना देवी, दाएँ हाथ में अक्षमाला (जपमाला), बाएँ में कमंडलु: नवदुर्गा-मंडल की सबसे "निर्धन" और भीतर से सबसे धनी मूर्ति। यह रूप विद्यार्थियों, साधकों, व्रतियों — हर उस व्यक्ति का आदर्श है जो दीर्घ-लक्ष्य के लिए तात्कालिक सुख स्थगित करता है; लोक-योग परंपरा (ग्रेड C) इन्हें स्वाधिष्ठान-चक्र से जोड़ती है — जल-तत्त्व का वह केंद्र जहाँ इच्छा-रस रहता है: दूसरी रात की साधना इच्छाओं के प्रवाह को एक दिशा देने की साधना है। द्वितीया की देवी का संदेश एक पंक्ति में — संकल्प पहली रात का था (D061); तप दूसरी रात से शुरू होता है

परिवार एवं संबंध

Family
  • तत्त्व-अभिन्नतापार्वती (D006) — तप-काल का नवदुर्गा-पद
  • पिता-माताहिमवान (D059) एवं मेना — जिनसे तप की अनुमति ली
  • प्रेरकनारद — भविष्य-वाणी एवं तप-मार्ग निर्देश
  • साध्यशिव (D003) — जिनके लिए सहस्र-वर्ष तप
  • पूर्व-क्रमशैलपुत्री (D061); अग्र-क्रम: चन्द्रघण्टा (D063)

प्रमुख कथा

Major Story — न्यूनतम 1,000 शब्दों में
प्रमुख कथा

अपर्णा — व्रत की सीढ़ियाँ, जो पत्तों से भी ऊपर गईं

संकल्प — जब राजकुमारी ने वन चुना

कथा की भूमिका शैलपुत्री-पृष्ठ (D061) से चली आती है — हिमालय-गृह में जन्मी कन्या के विषय में नारद की भविष्य-वाणी हो चुकी है: वर होगा वैरागी महादेव। पर भविष्य-वाणी और उपलब्धि के बीच वह दूरी थी जिसे कोई वरदान नहीं पाट सकता — शिव समाधि में थे: सती-शोक (D003) में डूबे, जगत् से विरत, हिम-गुफा में नेत्र मूँदे। सेवा से देवी ने निकटता पाई — पिता के आँगन में आए योगिराज की पूजा-परिचर्या का अवसर; पर कामदेव-प्रसंग (D006-कथा) ने दिखा दिया कि इस समाधि का द्वार सौंदर्य से नहीं खुलता — काम भस्म हुआ, शिव अंतर्धान हुए, और पार्वती के सामने दो मार्ग बचे: नियति मानकर बैठ जाना, या वह करना जो साध्य के स्वभाव के अनुरूप हो। यहीं इस पृष्ठ की देवी जन्मती है। पार्वती ने माता मेना से तप की आज्ञा माँगी; माता का हृदय काँपा — "उ (अरी)! मा (नहीं)!" — पुराण-निरुक्त कहता है कि इसी ममता-भरे निषेध से देवी का प्रिय नाम "उमा" जन्मा। पर आज्ञा मिली — पिता-पर्वत जानता था कि शिखर की बेटी शिखर-साधना ही करेगी। राज-वस्त्र उतरे, वल्कल पहने; आभूषण उतरे, रुद्राक्ष चढ़े; और गौरी-शिखर (कुमारसंभव का "गौरी-शिखर" — आज भी हिमालय-परंपरा में तप-स्थल स्मृतियाँ) पर वह साधना आरम्भ हुई जिसके आगे पुराणकार स्वयं स्तब्ध भाव से लिखते हैं — ऐसा तप न पहले किसी ने किया, न आगे कोई कर सकेगा

व्रत की सीढ़ियाँ — फल, पत्ते, और फिर कुछ भी नहीं

शिव पुराण उस तप का जो क्रम देता है, वह त्याग की एक घटती हुई सीढ़ी है — और यही क्रम ब्रह्मचारिणी-स्वरूप की आत्मा है। पहले वर्षों में देवी ने फल-मूल का आहार रखा — ग्रीष्म में पंचाग्नि के बीच (चार दिशाओं में अग्नि, पाँचवाँ ऊपर सूर्य), वर्षा में खुले आकाश-तले शिला पर, शीत में हिम-जल में खड़ी होकर जप करती रहीं। फिर फल भी त्यागे — केवल वृक्षों से स्वयं झरे पत्तों का आहार रह गया: वह भी माँगा हुआ नहीं, गिरा हुआ। और अंतिम सीढ़ी वह आई जिसने देवी को नया नाम दिया — पत्ते भी त्याग दिए: पर्ण तक नहीं — इसीलिए त्रिलोक ने काँपते सम्मान से उन्हें पुकारा "अपर्णा" — बिना पर्ण वाली। निराहार, वायु-मात्र पर टिकी, जप में लीन — कुमारसंभव (सर्ग 5) इस दृश्य को काव्य का शिखर देता है और वहीं वह अमर पंक्ति है जिसका भाव है: तप ही जिसका धन है, उस देह से बढ़कर पवित्र क्या। सहस्र वर्षों की संख्याएँ धाराओं में घटती-बढ़ती हैं (तीन सहस्र वर्ष तक की गणनाएँ — पाठ-भेद चिह्नित), पर संख्या मर्म नहीं है; मर्म वह क्रम है — त्याग बाहर से भीतर की ओर चला: पहले सुख गए, फिर आवश्यकताएँ गईं, फिर आवश्यकता का विचार भी गया। वन के ऋषि उस तपस्विनी के दर्शन को आने लगे; लोक में उसका तप-यश ऐसा फैला कि देवता इन्द्रासन तक चिंतित हुए। और अंत में वह परीक्षा हुई जो D006-कथा का प्रसिद्ध दृश्य है — वटु-वेशधारी (ब्रह्मचारी-रूप) शिव स्वयं आए और शिव की ही निंदा करने लगे; अपर्णा ने उत्तर में जो शिव-तत्त्व-निष्ठा दिखाई, उसने छद्म गिरा दिया: तप पूर्ण हुआ, वरदान सामने खड़ा था। विवाह-गाथा आगे पार्वती-पृष्ठ और हिमवान-पृष्ठ (D059) की है; ब्रह्मचारिणी-रूप की कथा यहीं पूर्ण होती है — स्वीकृति के क्षण पर नहीं, पात्रता के क्षण पर: नवदुर्गा-क्रम की दूसरी देवी वह है जिसने माँगा नहीं — स्वयं को उस योग्य बनाया

ब्रह्मचर्य का अर्थ-विस्तार — माला और कमंडलु का शास्त्र

अब स्वरूप-चिह्नों का पाठ। ब्रह्मचारिणी के दो ही उपकरण हैं, और दोनों मिलकर साधना का पूर्ण व्याकरण रचते हैं। अक्षमाला — जप की माला: निरंतरता का यंत्र; एक-एक मनका एक-एक पुनरावृत्ति — तप कोई विस्फोट नहीं, दोहराव है: वही नाम, वही आसन, वही घड़ी — सहस्र वर्ष। आधुनिक भाषा जिसे consistency कहती है, नवदुर्गा-मंडल उसे अक्षमाला कहता है। कमंडलु — जल-पात्र: संन्यासी की समस्त संपत्ति; इतना जल जितना आवश्यक — संचय नहीं, संग्रह नहीं: आवश्यकता की न्यूनतम रेखा पर जीवन। माला "करते रहो" कहती है, कमंडलु "कम में रहो" — दोनों मिलकर ब्रह्मचर्य की व्यावहारिक परिभाषा हैं: ऊर्जा का अपव्यय रोककर उसे एक लक्ष्य में लगाना। इसीलिए "ब्रह्मचर्य" शब्द को केवल इन्द्रिय-निग्रह तक सीमित पढ़ना इस देवी को छोटा करना है — वैदिक परंपरा में ब्रह्मचारी वह विद्यार्थी है जो ब्रह्म (वेद/ज्ञान) में चरता है: उसकी चर्या ही उसका ब्रह्म है। पार्वती का तप शिव के लिए था — पर विधि पूर्ण विद्यार्थी-धर्म की थी: गुरु-वाक्य (नारद) पर श्रद्धा, दीर्घ-काल अभ्यास, आहार-विजय, ऋतु-सहिष्णुता, और परीक्षा में निष्ठा-प्रमाण। यही कारण है कि परंपरा ब्रह्मचारिणी को विद्यार्थियों-प्रतियोगियों-शोधार्थियों की विशेष देवी कहती है — हर लंबी तैयारी (परीक्षा की, कला की, तपस्या की) उनके क्षेत्र की यात्रा है; और द्वितीया-नैवेद्य की लोक-विधि (शक्कर/मिश्री — सादगी का मीठा) व्रती को स्मरण कराती है कि तप कठोर हो, कटु नहीं।

आध्यात्मिक अर्थ — प्रेम की तपोमय परिभाषा

ब्रह्मचारिणी-तत्त्व का शिखर-पाठ उसके विरोधाभास में है — यह प्रेम-कथा है जिसकी विधि वैराग्य है। पार्वती को शिव चाहिए थे; उन्होंने शिव को पाने के लिए वह सब त्यागा जो "चाहना" कहलाता है — सौंदर्य का प्रदर्शन नहीं, सामीप्य का आग्रह नहीं, वरदान की याचना नहीं: केवल स्वयं को साध्य के स्वभाव में ढालती चली गईं — वैरागी को पाने के लिए वैराग्य, योगी को पाने के लिए योग। प्रेम की इससे परिपक्व परिभाषा दुर्लभ है: जिसे चाहते हो, उसके योग्य बनो — यही चाहने का शुद्धतम रूप है। दूसरा पाठ — अपर्णा-रेखा: त्याग की सीढ़ी में एक बिंदु आता है जहाँ अंतिम आवश्यक भी छूटता है; हर गहरी साधना में वह "पत्तों वाला क्षण" आता है — जब लगता है कि इतना तो रखा ही जा सकता है, और साधक वह भी रख नहीं रखता। वहीं नाम बदलता है — पार्वती वहाँ अपर्णा हुईं; साधारण साधक वहाँ असाधारण होता है। तीसरा — तप बनाम भाग्य: भविष्य-वाणी (नारद) पहले से थी, फिर तप क्यों? क्योंकि भारतीय दर्शन में भाग्य बीज है, तप खेती — बिना साधना का वरदान भी अंकुरित नहीं होता; ब्रह्मचारिणी उस हर व्यक्ति का उत्तर हैं जो "होना होगा तो हो जाएगा" कहकर बैठा है। नवरात्रि की दूसरी रात का दीप यही कहता जलता है — पहली रात संकल्प था; आज से अभ्यास। ॥ द्वितीयं ब्रह्मचारिणी ॥

स्रोत टिप्पणी: तप-प्रकरण (आज्ञा, वल्कल, पंचाग्नि, फल-पत्र-निराहार क्रम, अपर्णा-नाम, वटु-परीक्षा) — शिव पुराण रुद्र-संहिता पार्वती-खंड (ग्रेड A; विवाह-फल एवं कामदहन मुख्य-धाराएँ D006/D003 पर — complementary-split); "उमा" निरुक्त (उ-मा ममता-निषेध) — कालिदास/पुराण-परंपरा निरुक्त-स्तर (ग्रेड B); तप-वर्षों की संख्याएँ — धारा-भेद (ग्रेड B — चिह्नित); कुमारसंभव सर्ग 5 — काव्य-स्तर (चिह्नित; "तप ही धन" भावानुवाद); देवी कवच क्रम-पद (ग्रेड A/B); ध्यान-श्लोक "दधाना करपद्माभ्याम्..." — प्रचलित पूजा-पाठ (ग्रेड B — सप्तशती-मूल में नहीं); स्वाधिष्ठान-योजना — लोक-योग (ग्रेड C — चिह्नित); द्वितीया-नैवेद्य लोक-विधि (ग्रेड C)। ब्रह्मचर्य के अर्थ-विस्तार की टिप्पणी वैदिक विद्यार्थी-संस्था सामान्य-ज्ञान पर आधारित (ग्रेड B)।

नाम एवं अर्थ

Names
ब्रह्मचारिणी
ब्रह्म (तप/परम-तत्त्व) में विचरने वाली — साधना-पद्धति का नाम।
अपर्णा
अ-पर्ण — पत्ते तक न लेने वाली; तप-शिखर का नाम।
उमा
"उ! मा!" — माता के ममता-निषेध से जन्मा प्रिय नाम (निरुक्त-स्तर)।
तपश्चारिणी
तप का आचरण करने वाली — रूप-पर्याय।
अनुत्तमा
ध्यान-श्लोक का पद — जिससे उत्तम कोई नहीं।

मंत्र एवं पाठ

Mantras

नाम मंत्र

ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः ॥

ध्यान-श्लोक (नवदुर्गा पूजा-परंपरा — ग्रेड B)

दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू ।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा ॥

अर्थ: जो अपने कर-कमलों में अक्षमाला और कमंडलु धारण करती हैं, वे सर्वोत्तम ब्रह्मचारिणी देवी मुझ पर प्रसन्न हों।

तप-प्रकरण के शिव पुराण मूल-श्लोक एवं कुमारसंभव सर्ग-5 के चयनित पद्य शब्दशः सत्यापन के साथ भावी विस्तार में — यहाँ नियम-अनुसार असत्यापित पूर्ण-पाठ नहीं छापे गए।

पर्व एवं व्रत

Festivals
नवरात्रि द्वितीया
दूसरी रात्रि — ब्रह्मचारिणी-पूजन; जप-प्रधान साधना-दिवस।
द्वितीया-नैवेद्य
शक्कर/मिश्री अर्पण की लोक-विधि — दीर्घायु-कामना (लोक-स्तर)।
विद्यारम्भ-योग
विद्यार्थी-वर्ग की विशेष आराधना-परंपरा — तप-निष्ठा की देवी।

मंदिर एवं तीर्थ

Temples
ब्रह्मचारिणी मंदिर, वाराणसी
दुर्गा घाट (बालाजी घाट क्षेत्र) — काशी नवदुर्गा-यात्रा का द्वितीय-दिवस मंदिर।
गौरी-शिखर स्मृति-स्थल
हिमालयी तप-स्थल परंपराएँ (गौरीकुंड-केदार क्षेत्र) — तप-भूमि तीर्थ।
नवदुर्गा-मंडप सर्वत्र
नवरात्र-पंडालों में द्वितीया-रूप — जीवित लोक-दर्शन।

बच्चों के लिए ज्ञान

For Children

सरल परिचय: नवरात्रि के दूसरे दिन की देवी हैं ब्रह्मचारिणी — तपस्या करने वाली देवी! ये पार्वती जी का वह रूप हैं जब उन्होंने शिव जी को पाने के लिए सालों-साल कठिन तपस्या की। पहले सिर्फ़ फल खाए, फिर सिर्फ़ पेड़ से गिरे पत्ते — और आख़िर में पत्ते भी छोड़ दिए! इसीलिए उनका नाम पड़ा "अपर्णा" — यानी जो पत्ते भी न खाए।

रोचक तथ्य:

  • उनके एक हाथ में जपमाला और दूसरे में कमंडलु (पानी का पात्र) होता है — बस यही उनकी संपत्ति है!
  • "उमा" नाम कैसे पड़ा? माँ मेना ने तपस्या से रोकते हुए कहा था — "उ! मा!" (अरी! मत कर!)
  • गर्मी में वे पाँच आग के बीच और सर्दी में बर्फ़ीले पानी में खड़ी होकर तप करती थीं।
  • विद्यार्थियों के लिए ये ख़ास देवी मानी जाती हैं — पढ़ाई भी तो तपस्या है!

सीख: बड़ा लक्ष्य चाहिए तो रोज़-रोज़ मेहनत करो — जैसे माला का एक-एक मनका, वैसे अभ्यास का एक-एक दिन। शॉर्टकट नहीं, साधना जिताती है।

मिनी क्विज़:

  1. ब्रह्मचारिणी किस दिन पूजी जाती हैं?
  2. "अपर्णा" नाम क्यों पड़ा?
  3. उनके हाथों में क्या-क्या होता है?
  4. उन्होंने किसे पाने के लिए तप किया?