धरती जो दुही गई — पृथु का दोहन और माता का सौदा
वेन का अंधकार — जब धरती ने अन्न रोक लिया
पृथ्वी को "पृथिवी" नाम देने वाली कथा भागवत (चतुर्थ स्कंध) के पृथु-चरित्र में है — और वह कथा राजनीति, अर्थशास्त्र और पारिस्थितिकी की जैसी त्रिवेणी है, वैसी पुराण-साहित्य में दुर्लभ है। ध्रुव-वंश में राजा वेन हुआ — प्रजापीड़क, यज्ञ-विध्वंसक, घोषणा करने वाला कि "पूजा केवल राजा की हो।" ऋषियों ने पहले समझाया, फिर वह किया जो भारतीय राजधर्म-चिंतन का सबसे साहसी वाक्य है — अत्याचारी राजा को मंत्र-पूत हुंकार से पद-च्युत (धाराओं में: प्राण-च्युत) कर दिया: राजा धर्म से बड़ा नहीं। पर अराजकता अत्याचार से भी बुरी निकली — बिना दंड-धारक के चोर-लुटेरे उठ खड़े हुए। तब ऋषियों ने वेन की देह का मंथन किया — पापांश से निषाद-धारा पृथक् हुई, और शुभांश से प्रकट हुए पृथु — जिन्हें परंपरा विष्णु-कला (आदि-सम्राट, प्रथम "राजा" जिसका राज्याभिषेक विधि-पूर्वक हुआ) मानती है। पर नए राजा को राज्य नहीं, अकाल मिला — प्रजा भूखी थी, क्योंकि पृथ्वी ने अन्न अपने भीतर समेट लिया था: बीज बोए जाते, उगते नहीं। पृथु ने धनुष उठाया; धरती गो-रूप धरकर भागी — त्रिलोक में कहीं शरण न मिली (जो सबको धारण करती है, उसे कौन धारण करे?); अंत में रुककर उसने वह उत्तर दिया जो इस कथा की धुरी है: "राजन्, मैंने अन्न इसलिए रोका कि दुष्ट उसे लूट रहे थे और पात्र भूखे थे — व्यवस्था के बिना दान चोरी को पालता है। मुझे दंड नहीं — दोहन चाहिए: बछड़ा लाओ, दोग्धा लाओ, पात्र लाओ — मैं सब दूँगी।"
महा-दोहन — अर्थव्यवस्था का जन्म-श्लोक
और तब वह अद्भुत दृश्य घटा जिसे भागवत विस्तार से गाता है — सृष्टि का महा-दोहन। पृथु ने स्वायंभुव मनु को बछड़ा बनाकर स्वयं दोहन किया — अन्न-औषधि दुहे; ऋषियों ने बृहस्पति (D047) को वत्स बनाकर वेद-वाणी दुही; देवताओं ने इन्द्र (D039) को वत्स बना अमृत-ओज दुहा; पितरों ने स्वधा, नागों ने विष, यक्षों ने अंतर्धान-विद्या, गंधर्वों ने संगीत, पर्वतों ने धातु-रत्न — हर वर्ग ने अपना वत्स और अपना पात्र लाकर अपनी वृत्ति दुही। यह पुराण-रूपक जितना सुंदर है उतना ही गहरा — पृथ्वी सबको सब कुछ देती है, पर हर लेने वाले को अपना "बछड़ा" चाहिए: वह स्नेह-सम्बन्ध जो गो को दूध उतारने देता है; बिना सम्बन्ध का दोहन लूट है, सम्बन्ध-सहित दोहन ही अर्थ-व्यवस्था। प्रसन्न धरती ने पृथु को पुत्री-भाव से वरा — तभी से वह "पृथिवी" है: पृथु की बेटी; पिता वह राजा जिसने भूमि को समतल किया (भागवत कहता है पृथु ने ही पर्वत-उबड़खाबड़ हटाकर कृषि-ग्राम-नगर योग्य भूमि रची — नगर-सभ्यता का पुराण-क्षण), और बेटी वह धरती जिसने वचन दिया कि धर्म-युक्त दोहन कभी निष्फल नहीं जाएगा। ध्यान रहे — इस पूरे प्रकरण में पृथ्वी न शत्रु है, न दासी: वह अनुबंध-कर्ता है — देने की शर्तें तय करने वाली माता। आधुनिक भाषा में यह "सतत विकास" (sustainable use) का आदि-पाठ है: धरती से लो, पर व्यवस्था से; दुहो, चीरो मत।
वराह-गोद और स्तर-रेखाएँ — डूबी हुई माँ के तीन चित्र
भूदेवी-चरित्र का दूसरा महाध्याय वराह-प्रकरण है — मुख्य-कथा अवतार-पृष्ठ (D018) पर है; यहाँ देवी का कोण। हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को रसातल में डुबो दिया — पुराण-चित्र में माता जल-गर्भ में असहाय; विष्णु (D002) यज्ञ-वराह रूप में उतरे, दंष्ट्रा पर धरा को उठाया — और उदयगिरि-महाबलिपुरम् के शिल्पियों ने उस क्षण को पत्थर में अमर किया: विराट वराह की बाँह पर कोमल-कृतज्ञ भूदेवी। वैष्णव आगम-परंपरा ने इस उद्धार को विवाह-पद दिया — भूदेवी विष्णु की द्वितीय महिषी हुईं: दक्षिण के मंदिरों में "श्रीदेवी-भूदेवी" युग्म पेरुमाल के दोनों ओर खड़ा मिलता है — श्री (लक्ष्मी D007) संपदा हैं, भू धारण-क्षमा; ऐश्वर्य और धैर्य — नारायण के दो हाथ। संतति-धाराएँ भी यहीं से — भौम मंगल (D045: वराह-भू संसर्ग धारा से ग्रह-पुत्र) और भौमासुर नरक (कृष्ण-प्रकरण: जिसके वध पर स्वयं माता भूदेवी ने कृष्ण D014 से पौत्र भगदत्त के लिए अभय माँगा — पुत्र दुष्ट हो तो माता न्याय चुनती है, यह मार्मिक धारा भागवत 10.59 की है)। और तीसरा चित्र इतिहास-काव्य का है — सीता (D015): जनक के हल की रेखा (सीता = हल-रेखा) से मिली भूमिजा, जो अग्नि-परीक्षाओं से थकी संध्या में माँ को पुकारती है और धरती फटकर सिंहासन-सहित बेटी को गोद में ले लेती है। तीन चित्र — दुही गई माता (पृथु), डूबी-उबारी गई पत्नी (वराह), और लौटा ली गई बेटी (सीता): तीनों में पृथ्वी की एक ही मुद्रा है — अंत तक सहना, और निर्णायक क्षण में अपनी गरिमा से खड़ा हो जाना। "सर्वंसहा" उसका नाम है — पर सहना उसकी दुर्बलता नहीं, उसका व्रत है।
भूमि-सूक्त और आध्यात्मिक अर्थ — पहला पर्यावरण-घोषणापत्र
अंत में वह स्तर जो इस पृष्ठ का वैदिक शिखर है — अथर्ववेद का भूमि-सूक्त (12.1)। त्रेसठ ऋचाओं का यह स्तवन विश्व-वाङ्मय में अकेला है: उसमें भूमि की प्रशस्ति केवल उर्वरता की नहीं — उसके सम्पूर्ण परिस्थिति-तंत्र की है: सत्य-ऋत-दीक्षा-तप जिसे धारण करते हैं; जिसके पर्वत, हिम-शिखर, वन कल्याणकारी हों; जिस पर अनेक भाषाओं, अनेक धर्मों (नाना-धर्माणं) के मनुष्य ऐसे बसें जैसे एक घर के निवासी; जिसकी गंध (वह वर्षा-मिट्टी की गंध जिस पर सूक्त की पूरी ऋचा है) पवित्र करे; और जिससे ऋषि याचना करता है — "जो कुछ तुझसे खोदूँ माँ, वह शीघ्र भर जाए; तेरे मर्म पर आघात न करूँ" — यत् ते भूमे विखनामि क्षिप्रं तदपि रोहतु का यह भाव मानव-इतिहास की प्रथम खनन-नैतिकता है। इसीलिए विद्वान इस सूक्त को प्रथम पर्यावरण-घोषणापत्र कहते हैं — और इसीलिए इस पृष्ठ का समापन-पाठ अनिवार्य है: भूमि-पूजन (गृह-निर्माण से खेत-बुवाई तक), प्रातः पाद-स्पर्श क्षमा-श्लोक, अन्न को "ब्रह्म" कहने वाली परंपरा — ये सब उसी सूक्त की जीवित संततियाँ हैं; पर मिट्टी-क्षरण, विष-रसायन और अंधाधुंध खनन के युग में इन विधियों का अर्थ तभी है जब पृथु-अनुबंध याद रहे — दोहन धर्म है, दोहन-से-आगे लूट। गीता-परंपरा का "क्षमया धरित्री" (क्षमा में धरती-सी) हर साधक का आदर्श है — पर स्वयं धरित्री की क्षमा को असीम मान लेना इस युग की सबसे महँगी भूल होगी; माता है, इसीलिए तो — माँ से लिया सब लौटाना नहीं पड़ता, पर माँ को तोड़ना भी नहीं चाहिए। ॥ माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः ॥