विष्णु के आठवें अवतार — देवकी-नंदन, यशोदा के लाल, गीता के उद्गाता। माखन-चोर भी, गोवर्धनधारी भी, कुरुक्षेत्र के सारथी भी — एक ही व्यक्तित्व में बाल-लीला, प्रेम, नीति और ब्रह्मविद्या का पूर्ण-योग।
श्रीकृष्ण हिंदू परंपरा के वे अवतार हैं जिनके जीवन का हर चरण एक स्वतंत्र उपासना-पंथ बन गया — गोकुल का बालक (वात्सल्य), वृंदावन का बंसीधर (माधुर्य), मथुरा का कंस-हंता (वीर), द्वारका का राजनीतिज्ञ (नीति) और कुरुक्षेत्र का गीता-गायक (ज्ञान)। भागवत पुराण उन्हें अन्य अवतारों से अलग रेखा देता है — "कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्" (भागवत 1.3.28): शेष अवतार अंश या कला हैं, कृष्ण स्वयं भगवान। वैष्णव दर्शन की यह घोषणा कृष्ण-उपासना की केंद्रीय धुरी है, और साथ ही यह पृष्ठ यह भी दर्ज करता है कि दशावतार-सूची की मुख्य धारा उन्हें विष्णु का आठवाँ अवतार गिनती है — दोनों दृष्टियाँ परंपरा-सम्मत हैं।
राम यदि मर्यादा हैं तो कृष्ण पूर्णता — "पूर्णावतार", जिसमें ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री, ज्ञान, वैराग्य छहों भग पूर्ण मात्रा में प्रकट माने जाते हैं। उनका जीवन विरोधाभासों का महासमन्वय है: जन्म कारागार में, पर जीवन आनंद का पर्याय; युद्ध के केंद्र में रहकर शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा; राजाओं के राजा होकर सुदामा के तंदुल चबाना और अर्जुन के घोड़ों की रास थामना। गीता में वे स्वयं अपने अवतार-प्रयोजन का सूत्र देते हैं — धर्म-संस्थापन के लिए युग-युग में प्रकट होना ("यदा यदा हि धर्मस्य...") — और यही सूत्र समस्त अवतार-दर्शन की आधारशिला बना।
परिवार एवं संबंध
Family
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जन्मदाता माता-पितादेवकी एवं वसुदेव (यदुवंश — मथुरा)
मथुरा के यदुवंश में उग्रसेन-पुत्र कंस ने पिता को बंदी बनाकर सत्ता हथिया ली थी; जरासंध-जैसे बलशाली ससुर के बल पर उसका आतंक बढ़ता जा रहा था। पर उसका स्नेह-बिंदु थी चचेरी बहन देवकी। उसी के विवाह के दिन नियति बोली — देवकी-वसुदेव का रथ स्वयं हाँकते कंस को आकाशवाणी सुनाई दी: जिसे तू इतने चाव से विदा कर रहा है, उसी का आठवाँ पुत्र तेरा काल होगा। तलवार खिंच गई; वसुदेव ने प्राण-रक्षा का वह कठोरतम वचन दिया — हर संतान जन्मते ही तुझे सौंप दूँगा। कारागार में एक-एक कर छह नवजात शिशु कंस की शिलाओं पर टूटे (भागवत उन्हें मरीचि-पुत्रों का शापित जन्म कहता है)। सातवाँ गर्भ योगमाया ने "संकर्षण" विधि से रोहिणी (वसुदेव की दूसरी पत्नी, गोकुल में) के गर्भ में स्थापित किया — बलराम इसीलिए संकर्षण कहलाए। और आठवें गर्भ के समय कारागार की कोठरी स्वयं गर्भगृह बन गई — पहरे कड़े हुए, बेड़ियाँ दोहरी हुईं, पर भीतर तेज बढ़ता गया।
भाद्रपद की वह अर्धरात्रि
भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, रोहिणी नक्षत्र, अर्धरात्रि — वर्षा से उफनती यमुना, टूटता आकाश, और कारागार में वह प्राकट्य जिसे भागवत विष्णु के चतुर्भुज-रूप का दर्शन कहता है: शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण किए, वनमाला-किरीट सहित प्रकट हुए प्रभु ने माता-पिता को पूर्व-जन्मों (पृश्नि-सुतपा, अदिति-कश्यप) का स्मरण कराया और फिर स्वयं को साधारण नवजात में समेट लिया — ईश्वर का शिशु बनना स्वेच्छा-संकोच था, विवशता नहीं। योगमाया के प्रभाव से पहरेदार सोए, बेड़ियाँ खुलीं, द्वार अपने-आप हटे। वसुदेव सूप में शिशु को लेकर यमुना में उतरे — उफनती धारा ने चरण छूकर मार्ग दिया, शेषनाग ने फनों का छत्र ताना (भागवत 10.3 का अमर दृश्य-चित्र)। गोकुल में नंद-भवन में यशोदा को उसी रात्रि कन्या जन्मी थी — योगमाया स्वयं। शिशु बदल गए। कंस ने जब उस कन्या को शिला पर पटकना चाहा तो वह हाथ से छूटकर आकाश में अष्टभुजा देवी-रूप में प्रकट हुई — "तेरा काल तो कहीं और पल रहा है!" यह घोषणा कंस के शेष जीवन का ग्रहण बन गई — भय ही उसका स्थायी भाव हो गया, और भागवत की सूक्ष्म टिप्पणी है कि निरंतर कृष्ण-चिंतन (भले भय से) करते-करते वह भी एक विचित्र "साधक" बन गया — वैर-भक्ति की यह अवधारणा भागवत-दर्शन की विलक्षण देन है।
पूतना से तृणावर्त — विष पीकर अमृत देना
कंस के भेजे संहारक गोकुल आते गए और लीला-सामग्री बनते गए। पूतना राक्षसी सुंदर वेश में विष-लिप्त स्तनपान कराने आई — शिशु कृष्ण ने विष के साथ उसके प्राण भी पी लिए; पर भागवत का करुण-शिखर यह है कि मरते समय उसे "धाय-माता" की गति मिली — जिसने छल से ही सही, माता का वेश धरा, उसे भी माता का पद मिला। प्रभु का लेखा-जोखा भाव से चलता है, वेश से नहीं — यही पूतना-प्रसंग का अमर पाठ है। फिर शकटासुर (छकड़े में छिपा असुर — नन्हे पाँव की ठोकर से मुक्त) और तृणावर्त (बवंडर बनकर उड़ा ले जाने वाला — जिसे गले से पकड़कर बालक ने चट्टान-भार बन गिराया)। गोकुल विस्मित था — यह बालक है क्या? यशोदा के लिए वह केवल "कान्हा" था; और यही अज्ञान-रूपा वात्सल्य भागवत की दृष्टि में ज्ञान से भी ऊँची उपासना है — देवता जिसे विश्व-नियंता जान डरते हैं, माँ उसे छड़ी दिखाती है।
माखन-चोरी और ऊखल-बंधन — दामोदर-लीला
गोकुल की गलियों का माखन-चोर विश्व-साहित्य का सबसे लाड़ला "अपराधी" है। गोपियों की शिकायतें उलाहना कम, आमंत्रण अधिक थीं — जिस घर चोरी न हो वहाँ शोक मनता। इस लीला का दार्शनिक भाष्य परंपरा ने यह किया कि माखन (हृदय का नवनीत — शुद्ध प्रेम) ही वह वस्तु है जिसे प्रभु "चुराकर" ग्रहण करते हैं; जो बाँटने में कंजूस हो, उसका संचित छीन लिया जाता है। एक दिन यशोदा ने दही मथते हुए दूध उफनने पर कान्हा को अधूरा छोड़ा; रूठे बालक ने मटकी फोड़ी, माखन बंदरों को बाँटा। क्रुद्ध माँ रस्सी लाई — और यहाँ भागवत (10.9) का गूढ़तम प्रसंग घटा: रस्सी हर बार दो अंगुल छोटी पड़ती गई; घर की सारी रस्सियाँ जुड़ गईं, पर जो अनंत को नहीं बाँध सकीं। अंत में बालक स्वयं बँध गया — माँ के श्रम और प्रेम के आगे। परंपरा उन दो अंगुलों का अर्थ करती है: एक भक्त का परिश्रम, दूसरी प्रभु की कृपा — दोनों मिलें तभी बंधन संभव। ऊखल से बँधे "दामोदर" (दाम=रस्सी, उदर=पेट) घसीटते हुए आँगन के यमलार्जुन वृक्षों तक गए — ऊखल अड़ा, वृक्ष उखड़े, और उनसे नलकूबर-मणिग्रीव (नारद-शापित कुबेर-पुत्र) मुक्त हुए। कार्तिक मास की "दामोदर-लीला" उपासना इसी प्रसंग की स्मृति है।
नंदोत्सव और गुप्त नामकरण — "यह कोई साधारण नाम नहीं"
जन्म की सूचना पर गोकुल में जो उत्सव मना, वह "नंदोत्सव" नाम से आज भी जन्माष्टमी के अगले दिन ब्रज में दोहराया जाता है — नंदबाबा ने द्वार खोल दिए, दही-दूध-हल्दी की कीच मची, गोपों ने एक-दूसरे पर माखन मला, दान की धाराएँ बहीं। यशोदा के आँगन का यह आनंद-विस्फोट भक्ति-काव्य (सूरदास की बधाई-पदावली) का स्थायी विषय बना। कुछ काल पश्चात यदुवंश के कुल-पुरोहित गर्गाचार्य वसुदेव की प्रेरणा से गुप्त रूप से गोकुल आए — कंस-भय से नामकरण-संस्कार गोशाला में, बिना समारोह हुआ। गर्ग ने रोहिणी-पुत्र को "राम" (रमण कराने वाला) नाम दिया — जो बल के कारण "बलराम" प्रसिद्ध हुआ — और श्याम शिशु के विषय में रहस्य-वाणी कही: यह हर युग में देह धरता है — श्वेत, रक्त, पीत वर्ण ले चुका, अब कृष्ण (श्याम) हुआ है; इसके नाम-रूप अनंत होंगे, यह तुम सबको भव से पार करेगा, इसे "वासुदेव" भी जानो। भागवत (10.8) का यह नामकरण-प्रसंग कृष्ण-नाम की पहली शास्त्रीय व्याख्या है — और गर्ग की वह पंक्ति कि "इस बालक के गुण-कर्म इसके नाम स्वयं रचेंगे" अक्षरशः फली: दामोदर, गिरिधर, रणछोड़ — हर नाम एक लीला की मुहर है।
मुख में ब्रह्मांड — मिट्टी की शिकायत
गोकुल-लीलाओं का चरम-रहस्य एक साधारण शिकायत से खुला। बलराम और सखाओं ने कहा — कान्हा ने मिट्टी खाई है। यशोदा ने डाँटा; बालक ने भोलेपन से मुख खोल दिया — और माँ ने उस नन्हे मुख में समस्त ब्रह्मांड देखा: चर-अचर, आकाश, दिशाएँ, पर्वत-द्वीप-सागर, वायु-अग्नि-चंद्र-तारे, और स्वयं गोकुल समेत स्वयं को भी — बालक के मुख में गोद में बालक लिए खड़ी यशोदा। क्षण भर को माँ समाधि-स्तब्ध हुई; फिर प्रभु ने वात्सल्य-माया का परदा पुनः डाल दिया — माँ को दर्शन नहीं, बेटा चाहिए था, और प्रभु को भी भगवान बनना नहीं, गोद चाहिए थी। भागवत में यह विश्वरूप-दर्शन गीता से बहुत पहले, बिना युद्धभूमि, बिना उपदेश घट जाता है — अर्जुन को जो दिखाने के लिए दिव्य-चक्षु देने पड़े, यशोदा को वह मिट्टी की शिकायत पर मिल गया। ज्ञान का द्वार जिज्ञासा है, पर दर्शन का द्वार प्रेम — यही इस प्रसंग की घोषणा है।
आध्यात्मिक अर्थ
जन्म-लीला का प्रत्येक चित्र साधना-संकेत है। कारागार में जन्म कहता है कि परमात्मा का प्राकट्य बंधनों के भीतर ही होता है — देह-मन की कोठरी में; और जन्म होते ही बेड़ियाँ खुलती हैं, द्वार हटते हैं। यमुना-पार का दृश्य भवसागर-चित्र है — सिर पर प्रभु हों तो उफनती धारा भी मार्ग देती है। पूतना सिखाती है कि प्रभु के लेखे में छल का विष भी माता के दूध-मूल्य पर चढ़ता है। दो अंगुल छोटी रस्सी भक्ति-शास्त्र का सूत्र-वाक्य है — साधन कितना ही जोड़ो, कृपा-अंगुल के बिना अनंत नहीं बँधता; और बँधता है तो केवल प्रेम से, बल से कभी नहीं। मुख में ब्रह्मांड यह कि जिसे हम "अपना छोटा-सा" समझकर दुलारते हैं, उसी में सब कुछ समाया है — वात्सल्य अद्वैत का सबसे मीठा पाठ है।
स्रोत टिप्पणी: संपूर्ण वृत्त श्रीमद्भागवत दशम स्कंध (अध्याय 1-11) से — चतुर्भुज-प्राकट्य 10.3, पूतना-गति 10.6, दामोदर-यमलार्जुन 10.9-10, विश्वरूप-मुख 10.8 (ग्रेड A); हरिवंश एवं विष्णु पुराण समांतर-पाठ (ग्रेड A/B); "दो अंगुल" की श्रम+कृपा व्याख्या भाष्य-परंपरा (वल्लभ/गौड़ीय — ग्रेड B, व्याख्या रूप में चिह्नित)।
कथा 2 / 3
कालिय-दमन और गोवर्धन-धारण — वृंदावन का रक्षक
स्रोत: श्रीमद्भागवत — दशम स्कंध 15-27
पृष्ठभूमि — वृंदावन की ओर
शकट-तृणावर्त जैसे उपद्रवों से चिंतित नंदबाबा गोकुल छोड़कर वृंदावन आ बसे — यमुना-तट का वह वन-प्रदेश जो आगे चलकर भक्ति-भूगोल की राजधानी बनना था। यहीं बछड़े चराते बाल-गोपाल की सखा-मंडली जमी; वत्सासुर (बछड़ा-रूप), बकासुर (विशाल बगुला — चोंच चीरकर मुक्त) और अघासुर (योजन-लंबा अजगर — जिसके मुख-गुफा में पूरी सखा-मंडली समा गई थी और कृष्ण ने भीतर जाकर कंठ में विराट होकर उसे विदीर्ण किया) जैसे कंस-प्रेषित असुर आते गए। ब्रह्मा तक परीक्षा ले बैठे — बछड़ों और ग्वाल-बालों को हर ले गए, और वर्ष भर कृष्ण स्वयं ही उतने बछड़े, उतने बालक बनकर हर घर में लौटते रहे; लौटे ब्रह्मा ने असंख्य चतुर्भुज-रूप देखकर क्षमा माँगी (ब्रह्म-विमोहन लीला, भागवत 10.13-14)। पर वृंदावन के सामूहिक जीवन पर दो बड़े संकट ऐसे आए जिनकी स्मृति आज भी उपासना-पर्व है — यमुना का विष और इंद्र का प्रलय-मेघ।
कालिय-दह — विष का मंथन
यमुना का एक कुंड कालिय नाग के विष से खौलता था — वृक्ष झुलसे, उड़ते पक्षी गिर जाते; एक दिन विष-जल पीकर गौएँ और ग्वाल-बाल मूर्च्छित हो गए (कृष्ण-दृष्टि ने जिलाया)। तब बालक कृष्ण कदंब पर चढ़े और खौलते दह में कूद पड़े। कालिय ने सौ फनों समेत लपेट लिया — तट पर विलाप जम गया, यशोदा-नंद को सखियों ने रोका। और तब जल के भीतर से वह दृश्य उभरा जो भारतीय कला का शाश्वत विषय है — फनों के मंच पर नृत्य करते नटवर। जिस-जिस फन को नाग उठाता, चरण-ताल उसी को झुका देती; मणि-जड़ित सौ फन सौ रंगमंच बन गए। रक्त वमन करते, शरणागत कालिय की नाग-पत्नियों ने करबद्ध स्तुति की — भागवत की नागपत्नी-स्तुति दशम स्कंध के श्रेष्ठ स्तोत्रों में है: "यह दंड नहीं, अनुग्रह है — जिस चरण-रज को लक्ष्मी तप से माँगती हैं, वह हमारे स्वामी के सिर पर पड़ी!" कृष्ण ने प्राण-दान दिया और आदेश — परिवार सहित रमणक द्वीप जाओ; गरुड़-भय (जो कालिय के यमुना-शरण का मूल कारण था) मेरे चरण-चिह्न देखकर तुम्हें नहीं छुएगा। विष-मुक्त यमुना पुनः अमृत हुई। दक्षिण की नृत्य-परंपराओं में "कालिय-मर्दन" आज भी प्रिय विषय है, और यह प्रसंग पर्यावरण-पाठ की तरह भी पढ़ा जाता रहा है — जल-स्रोत का विष समाज का साझा संकट है, और उसका समाधान किसी को मारना नहीं, विस्थापित-संतुलन भी हो सकता है।
दावानल-पान और वंशी — रक्षा भी, रस भी
कालिय-प्रसंग की उसी रात्रि थके ब्रजवासी यमुना-तट पर ही सो गए थे कि ग्रीष्म-सूखे वन में दावानल भड़क उठा — चारों ओर अग्नि का घेरा। नींद से हड़बड़ाए गोपों ने कृष्ण को पुकारा, और भागवत कहता है कि प्रभु ने वह विकराल अग्नि पी ली — जैसे कोई जल का घूँट ले (आगे मुंजारण्य में भी यही दावाग्नि-पान दोहराया गया, जब बलराम समेत गोप-मंडली इषीका-वन में घिरी)। विष के बाद अग्नि — एक ही दिन में जल और ज्वाला दोनों के संकट से त्राण: ब्रज की श्रद्धा अब निर्णय बन चुकी थी कि यह बालक ही उनका वास्तविक रक्षा-कवच है। पर वृंदावन-काल केवल संकट-कथाओं का नहीं, रस-कथाओं का भी है — इन्हीं वनों में वह वेणु बजी जिसका "वेणुगीत" (भागवत 10.21) गोपियों की वाणी से वृंदावन की समूची प्रकृति का कृष्णमय हो जाना गाता है: नदियाँ थम जातीं, गौएँ कान उठाए चित्रवत्, पक्षी मौन-मुनि बन डालों पर आँख मूँदे बैठ जाते। मुरली कृष्ण-तत्व का स्थायी प्रतीक बनी — भीतर से पूर्णतः खाली (अहं-शून्य) बाँस ही प्रभु के अधरों का स्पर्श और स्वर पाता है; रास-माधुर्य की उस धारा का पूर्ण विवेचन, राधा-तत्व सहित, D011 राधा-पृष्ठ का विषय है — यहाँ इतना ही कि रक्षक और रसिक एक ही व्यक्तित्व के दो अभिन्न मुख हैं।
इंद्र-यज्ञ का प्रश्न — परंपरा से पुरुषार्थ
वार्षिक इंद्र-यज्ञ की तैयारियाँ देख किशोर कृष्ण ने नंदबाबा से वह प्रश्न पूछा जो वैदिक-लौकिक धर्म-विमर्श का क्रांति-बिंदु बन गया: हम वनवासी गोप हैं — हमारा जीवन गौ, ब्राह्मण और यह गोवर्धन पर्वत है; वर्षा तो मेघ अपने स्वभाव-धर्म (और जीवों के कर्म-विधान) से करते हैं — फिर पूजा उसकी क्यों न हो जो प्रत्यक्ष हमारा पालन करता है? यह परंपरा का निषेध नहीं, पुनर्विचार था — पूजा कृतज्ञता है, और कृतज्ञता का पहला अधिकारी निकटतम पालनहार। गोपों ने मान लिया; उस वर्ष यज्ञ-सामग्री से गोवर्धन का "अन्नकूट" सजा — छप्पन भोग पर्वत को अर्पित हुए, परिक्रमा हुई, और कृष्ण ने स्वयं विराट रूप से "मैं ही गोवर्धन हूँ" कहकर भोग स्वीकारा (गिरिराज-उपासना का जन्म-क्षण)। पर स्वर्ग में अपमान सुलग उठा — इंद्र ने संवर्तक (प्रलय-काल के) मेघों को ब्रज डुबोने का आदेश दे दिया।
सात दिन, एक अंगुली — गोवर्धनधारी
आकाश फट पड़ा — स्तंभ-धार वर्षा, ओले, आँधी; ब्रज डूबने लगा, गौएँ काँपती हुई कृष्ण को घेरकर खड़ी हो गईं। तब सात वर्ष के उस बालक ने वह किया जिसने उसे सदा के लिए "गिरिधर" बना दिया — गोवर्धन को धरती से उखाड़कर बाएँ हाथ की कनिष्ठा (सबसे छोटी अंगुली) पर छत्र-सा उठा लिया। सात दिन-सात रात समस्त ब्रज — मनुष्य, गौ, पक्षी तक — उस पर्वत-छत्र के नीचे रहा; कृष्ण अपलक खड़े रहे, न भूख न थकान (परंपरा कहती है कि ब्रजवासी अपनी रोटियाँ बाँटते रहे और सात दिन को एक क्षण-सा अनुभव हुआ)। संवर्तक मेघ रीत गए; लज्जित इंद्र ने वर्षा रोकी। सबके घर लौटने पर पर्वत यथास्थान रखा गया। फिर एकांत में इंद्र आए — ऐरावत के साथ, सुरभि (कामधेनु) को आगे कर — और क्षमा-स्तुति की; सुरभि ने दुग्धाभिषेक कर उन्हें "गोविंद" नाम दिया (गो-इंद्र: गौओं और इंद्रियों के स्वामी)। भागवत की टिप्पणी मार्मिक है — इंद्र का ऐश्वर्य-मद उतारना ही इस लीला का प्रयोजन था, पर दंड में भी पदच्युति नहीं: इंद्र इंद्र ही रहे, केवल अहं गिरा। गोवर्धन आज भी परिक्रमा-पथ है — 21 किलोमीटर की वह यात्रा जो दीपावली के अगले दिन "गोवर्धन पूजा / अन्नकूट" रूप में राष्ट्रीय पर्व बन चुकी है।
आध्यात्मिक अर्थ
कालिय-दमन मन के विष-कुंड का चित्र है — दह (अवचेतन) में बैठा सौ फन वाला अहं-नाग जो पूरे जीवन-जल को विषैला करता है; प्रभु उसे मारते नहीं (वृत्तियाँ मरती नहीं), उसके फनों पर नृत्य कर उसे शरणागत बनाते हैं और "रमणक द्वीप" — अपनी सीमा — में भेज देते हैं। नागपत्नी-स्तुति का सूत्र स्थायी है: प्रभु का दंड भी अनुग्रह-वेश में आता है। गोवर्धन-प्रसंग तीन स्तरों पर पढ़ा जाता है — सामाजिक स्तर पर श्रम और प्रत्यक्ष-पालक की प्रतिष्ठा (परंपरा भी विवेक-कसौटी पर कसी जाए); आध्यात्मिक स्तर पर यह कि प्रकोप के मेघ जब टूटें, साधक को चाहिए एक ही छत्र — गुरु/प्रभु का आश्रय; और भक्ति-स्तर पर वह कनिष्ठा-अंगुली: प्रभु के लिए ब्रज-भर की रक्षा "सबसे छोटी अंगुली" का काम है, पर शर्त यह कि सब उस छत्र के नीचे एकत्र आ जाएँ। "गिरिधर" इसीलिए मीरा से लेकर आज तक भक्त-हृदय का प्रिय नाम है — जो पर्वत उठा सकता है, वह मेरा भार क्या न उठाएगा?
कंस ने धनुष-यज्ञ के बहाने दोनों भाइयों को मथुरा बुलाया — योजना कुवलयापीड़ हाथी और चाणूर-मुष्टिक मल्लों से कुचलवाने की थी। अक्रूर रथ लेकर आए — और गोपियों-राधा के विरह का वह अध्याय खुला जिसका विवेचन D011 राधा-पृष्ठ पर है; स्वयं अक्रूर यमुना-स्नान में जल के भीतर दोनों भाइयों का दिव्य-दर्शन पाकर कृतार्थ हुए। मथुरा में धोबी का दर्प-हरण, दर्जी-सुदामा माली पर कृपा, और कुब्जा का उद्धार हुआ — तीन टेढ़ेपन वाली दासी को सीधा कर प्रभु ने संकेत दिया कि वे देह नहीं, भाव देखते हैं। यज्ञशाला में रखा शिव-धनुष कृष्ण ने उठाकर चढ़ाते-चढ़ाते तोड़ दिया — टंकार से मथुरा काँपी और कंस की रातों की नींद उड़ गई: उसे हर ओर काल ही काल दिखने लगा।
रंगभूमि — कंस-वध और मुक्त मथुरा
प्रातः रंगभूमि के द्वार पर कुवलयापीड़ छोड़ा गया — कृष्ण ने उसे दाँत उखाड़कर मारा और वही दाँत कंधे पर रख अखाड़े में उतरे। भागवत का प्रसिद्ध श्लोक-चित्र है कि उस सभा में हर वर्ग को कृष्ण अपने ही भाव-रंग में दिखे — मल्लों को वज्र, स्त्रियों को कामदेव, गोपों को स्वजन, दुष्ट राजाओं को दंड, माता-पिता को शिशु, कंस को साक्षात् मृत्यु और योगियों को परम-तत्त्व (एक ही सत्य, जितने द्रष्टा उतने दर्शन — यह श्लोक भारतीय सौंदर्य-दर्शन में बहु-उद्धृत है)। चाणूर-मुष्टिक गिरे; और तब कृष्ण मंच पर चढ़े — केश पकड़कर कंस को अखाड़े में पटका। वर्षों का भय समाप्त हुआ — पर ध्यान रहे, प्रतिशोध-भाव से नहीं: भागवत कहता है कि निरंतर भय-चिंतन से कंस को भी सारूप्य-गति मिली। कृष्ण ने उग्रसेन को पुनः सिंहासन दिया (स्वयं राजा नहीं बने — यह संकेत आजीवन रहा: सत्ता के केंद्र में रहकर सत्ता से अलिप्त), देवकी-वसुदेव के बंधन काटे, और संदीपनि-आश्रम (उज्जैन) में विधिवत विद्या पूर्ण कर गुरु-दक्षिणा में उनका मृत पुत्र लौटाया। आगे जरासंध के सत्रह आक्रमणों और कालयवन-संकट के बीच वह रणनीतिक निर्णय हुआ जिसने "रणछोड़" नाम दिया — युद्ध जीतने से प्रजा-रक्षा बड़ी है: समुद्र-मध्य द्वारका बसाकर समस्त यादव सुरक्षित स्थानांतरित हुए। द्वारकाधीश-काल की कथाएँ असंख्य हैं — रुक्मिणी-हरण (पत्री लिखकर बुलाने वाली विदर्भ-राजकुमारी), स्यमंतक-प्रकरण, नरकासुर-वध और सोलह हज़ार बंदिनी राजकुमारियों को सम्मान-आश्रय, सुदामा के तंदुल — हर कथा का सूत्र एक: ऐश्वर्य के शिखर पर करुणा।
कुरुक्षेत्र — शस्त्र नहीं, शास्त्र
महाभारत-संग्राम में कृष्ण की भूमिका विलक्षण थी। दुर्योधन और अर्जुन दोनों सहायता माँगने पहुँचे — कृष्ण ने बाँटा: एक ओर नारायणी सेना, दूसरी ओर निःशस्त्र मैं। दुर्योधन सेना पाकर प्रसन्न, अर्जुन सारथी पाकर कृतार्थ — यह चुनाव ही गीता का पहला श्लोक है: साधन चाहिए या साधन-दाता? युद्ध टालने वे स्वयं शांतिदूत बनकर हस्तिनापुर गए (इस पृष्ठ का शीर्ष-चित्र वही सभा है) — पाँच गाँव तक का प्रस्ताव; दुर्योधन ने बंदी बनाना चाहा तो सभा में विराट-रूप दिखाकर लौटे: अब युद्ध धर्म था। रणभूमि में जब स्वजन देखकर अर्जुन का गांडीव छूटा, तब दोनों सेनाओं के मध्य वह संवाद हुआ जो सात सौ श्लोकों में विश्व की सर्वाधिक अनूदित भारतीय पुस्तक बना — श्रीमद्भगवद्गीता। कर्म का अधिकार और फल का त्याग (2.47), स्वधर्म-निष्ठा, समत्व-योग, भक्ति की सुलभता (पत्र-पुष्प-फल-जल — 9.26), विभूति-दर्शन, ग्यारहवें अध्याय का विश्वरूप और अंतिम आश्वासन — "सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज... मा शुचः" (18.66)। युद्ध भर कृष्ण ने प्रतिज्ञा-अनुसार शस्त्र नहीं उठाया (भीष्म ने एक दिन प्रतिज्ञा तुड़वाने की भक्ति-जिद जीत ही ली थी — रथ-चक्र उठाए दौड़ पड़े प्रभु का वह रूप भीष्म को इष्ट-दर्शन था); वे केवल सारथी रहे — पांचजन्य फूँकते, मार्ग दिखाते, घोड़े सँभालते। "पार्थसारथी" उपाधि इसीलिए उपासना-नाम बना: जो जीवन-रथ की रास प्रभु को सौंप दे, उसका महाभारत जीता हुआ है।
सुदामा के तंदुल — द्वारकाधीश के आँसू
द्वारका-काल की सबसे आर्द्र कथा किसी युद्ध की नहीं, एक पोटली की है। संदीपनि-आश्रम के सहपाठी सुदामा दरिद्रता की पराकाष्ठा में थे; पत्नी के आग्रह पर वे "मित्र" से मिलने चले — भेंट में पड़ोस से माँगे चार मुट्ठी चिउड़े (तंदुल) फटे वस्त्र में बाँधे हुए, और मन में संकोच का पहाड़। द्वार-प्रहरियों से "कृष्ण का मित्र सुदामा" कहलवाते ब्राह्मण को भीतर जो मिला, उसने राजसभाओं की परिभाषा तोड़ दी — द्वारकाधीश नंगे पाँव दौड़े, आलिंगन में आँसू, स्वयं आसन पर बैठाकर चरण धोए, और भागवत का चित्र है कि चरणोदक के स्थान पर प्रभु के नेत्र-जल से ही पाद-प्रक्षालन हो गया। फिर वह पोटली — जिसे सुदामा लज्जा से दबाते रहे — कृष्ण ने झपटकर खोली: "यह तो मेरा प्रिय-तम उपहार है!" एक मुट्ठी फाँकी, दूसरी पर रुक्मिणी ने हाथ थाम लिया (परंपरा कहती है — दूसरी मुट्ठी में प्रभु समस्त वैभव दिए देते थे)। सुदामा बिना कुछ माँगे लौटे — और गाँव पहुँचकर देखा कि झोंपड़ी के स्थान पर प्रासाद खड़ा है। "सुदामा-चरित" भक्ति-साहित्य (नरोत्तमदास) का अमर काव्य बना; इसका सूत्र गीता के "पत्रं पुष्पं फलं तोयम्" का ही कथा-रूप है — प्रभु भेंट का भार नहीं, भाव तौलते हैं; और मैत्री वह संबंध है जिसमें सिंहासन और दरिद्रता की दूरी शून्य हो जाती है।
मौसल — अंत भी लीला
युद्धोपरांत गांधारी का शाप (छत्तीस वर्ष में यदुवंश-नाश) और ऋषियों के अपमान से उपजा मूसल-प्रकरण द्वारका के अंत की भूमिका बने। प्रभास-क्षेत्र में आपसी कलह में एरका-घास (जो शापित मूसल-चूर्ण से उगी थी) से यादव परस्पर कट मरे; बलराम शेष-रूप में समुद्र-लीन हुए। कृष्ण पीपल-तले योग-मुद्रा में लेटे — तलवा (एकमात्र मर्म-स्थल, दुर्वासा-प्रसंग की परंपरा) देख जरा नामक व्याध ने मृग-भ्रम में बाण मारा। घबराए व्याध को प्रभु ने अभय दिया — परंपरा इसे त्रेता के बाली-प्रसंग का ऋण-शोधन कहती है (ओट से मारने वाला राम-रूप, बाण खाने वाला कृष्ण-रूप — ग्रेड B/D लोक-भाष्य, चिह्नित)। भागवत का एकादश स्कंध इससे पूर्व उद्धव-गीता रखता है — गोपियों को ज्ञान देने भेजे गए उद्धव प्रेम सीखकर लौटे थे; अंत में वही उद्धव अंतिम उपदेश के पात्र बने। स्वधाम-गमन के साथ द्वापर बीता — परंपरा के अनुसार उसी क्षण से कलियुग-गणना आरंभ हुई, और समुद्र ने द्वारका समेट ली (आधुनिक पुरातत्व की समुद्री-खोजें द्वारका-तट पर प्राचीन संरचनाएँ दर्ज करती हैं — शोध-स्तर पर अध्ययन जारी, ग्रेड C चिह्नित)। जिसने जन्म कारागार में लिया, उसने देह वन में त्यागी — आदि से अंत तक "अपना" कुछ नहीं रखा; यही अनासक्ति उनका अंतिम उपदेश थी।
आध्यात्मिक अर्थ — पूर्णावतार का पाठ्यक्रम
कृष्ण-चरित की तीसरी कथा का केंद्र-सूत्र है: शक्ति का संयम ही ईश्वरत्व है। कंस-वध के बाद सिंहासन ठुकराना, सोलह हज़ार को आश्रय देकर अपयश ओढ़ लेना, सुदामा के चरण धोना, दूत बनना, सारथी बनना, जूठी पत्तलें तक उठाना (राजसूय-यज्ञ की सेवा-कथा — महाभारत-परंपरा) — पूर्णावतार ने हर वह पद चुना जिसे संसार "छोटा" कहता है; क्योंकि जो वस्तुतः बड़ा है, उसे पद की भूख नहीं। गीता इसी जीवन का सैद्धांतिक संस्करण है — निष्काम कर्म वही सिखा सकता है जिसने राज्य जीतकर छोड़े हों। "मा शुचः" (शोक मत कर) उनका अंतिम-सार है: यह आश्वासन कि समर्पित जीव का भार प्रभु का है। और मौसल-पर्व यह कठोर-कोमल सत्य कि अवतार भी देह-धर्म निभाकर जाता है — पर जाते-जाते भी व्याध को अभय देता है। कृष्ण इसीलिए "संपूर्ण" हैं: जीवन का कोई स्वाद — जन्म, खेल, प्रेम, वियोग, युद्ध, राजनीति, ज्ञान, मृत्यु — ऐसा नहीं जिसे उन्होंने चखकर दिखाया न हो कि इसमें भी ब्रह्म कैसे रहा जाता है।
स्रोत टिप्पणी: मथुरा-कांड (कुब्जा, धनुष-भंग, रंगभूमि बहु-दर्शन श्लोक, कंस-गति) भागवत 10.41-44; संदीपनि 10.45; द्वारका-स्थापना 10.50-52; रुक्मिणी-पत्री 10.52-53; सुदामा 10.80-81 (सभी ग्रेड A)। शांतिदूत-विश्वरूप महाभारत उद्योग पर्व; गीता भीष्म पर्व 23-40 (उद्धरण 2.47, 9.26, 18.66); भीष्म-प्रतिज्ञा प्रसंग भीष्म पर्व (ग्रेड A)। मौसल पर्व एवं भागवत 11 (उद्धव-गीता, स्वधाम-गमन — ग्रेड A); बाली-ऋण लोक-भाष्य (ग्रेड B/D); समुद्री-पुरातत्व टिप्पणी आधुनिक शोध-स्थिति (ग्रेड C)।
नाम एवं अर्थ
Names
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कृष्ण
"कृष्" धातु — आकर्षित करने वाला; श्याम वर्ण वाला। जो समस्त चित्त खींच ले।
गोविंद / गोपाल
गौओं, इंद्रियों और पृथ्वी के पालक-स्वामी — सुरभि-अभिषेक से प्राप्त नाम।
गिरिधर / गोवर्धनधारी
गोवर्धन उठाने वाले — मीरा-सूर की भक्ति का प्रिय संबोधन।
दामोदर
दाम (रस्सी) से उदर बाँधा गया — ऊखल-लीला की स्मृति; कार्तिक-उपासना का नाम।
पार्थसारथी
पार्थ (अर्जुन) के सारथी — शरणागत के जीवन-रथ की रास थामने वाले।
रणछोड़ / द्वारकाधीश
प्रजा-हित में रण छोड़ने वाले; द्वारका के अधीश्वर — गुजरात-परंपरा के प्रधान नाम।
मंत्र एवं पाठ
Mantras
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द्वादशाक्षर मंत्र
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
महामंत्र (गौड़ीय परंपरा)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे । हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ॥
गीता — अवतार-सूत्र
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥
संदर्भ: भगवद्गीता 4.7-8 — अवतार-प्रयोजन की स्वयं भगवान के मुख से घोषणा; द्वादशाक्षर मंत्र पांचरात्र-भागवत परंपरा का मूल वासुदेव-मंत्र; महामंत्र कलिसंतरण उपनिषद्-गौड़ीय परंपरा।
मधुराष्टकम्, कृष्णाष्टकम् एवं गीता के अध्याय-सार पूर्ण-पाठ शब्दशः सत्यापन के साथ भावी मंत्र-सूचकांक विस्तार में — यहाँ नियम-अनुसार असत्यापित पूर्ण-पाठ नहीं छापा गया।
पर्व एवं व्रत
Festivals
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कृष्ण जन्माष्टमी
भाद्रपद कृष्ण अष्टमी — अर्धरात्रि जन्मोत्सव, व्रत-झाँकी; महाराष्ट्र की दही-हांडी गोविंदा-परंपरा।
गोवर्धन पूजा / अन्नकूट
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा (दीपावली के अगले दिन) — छप्पन भोग, गिरिराज-परिक्रमा।
होली (ब्रज)
फाल्गुन — बरसाना की लठमार से वृंदावन की फूलों की होली तक; राधा-कृष्ण रंग-परंपरा (D011 भी देखें)।
गीता जयंती
मार्गशीर्ष शुक्ल (मोक्षदा) एकादशी — कुरुक्षेत्र में गीता-उपदेश की तिथि; गीता-पाठ का पर्व।
मंदिर एवं तीर्थ
Temples
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श्रीकृष्ण जन्मस्थान, मथुरा
कारागार-जन्मभूमि की स्मृति पर मंदिर-परिसर — ब्रज-चौरासी कोस यात्रा का केंद्र।
बांके बिहारी, वृंदावन
स्वामी हरिदास-परंपरा का त्रिभंग-विग्रह — झाँकी-दर्शन की अनूठी पर्दा-प्रथा।
द्वारकाधीश, द्वारका
चार धामों में पश्चिम-धाम; गोमती-संगम पर जगत-मंदिर शिखर।
श्रीकृष्ण मठ, उडुपी
मध्वाचार्य-स्थापित बाल-कृष्ण विग्रह — कनकदास की खिड़की (कनकन किंडी) की भक्ति-कथा।
बच्चों के लिए ज्ञान
For Children
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सरल परिचय: श्रीकृष्ण भगवान विष्णु के अवतार हैं। वे जेल में पैदा हुए, गोकुल में माखन चुराते हुए बड़े हुए, और उन्होंने छोटी-सी अंगुली पर पूरा गोवर्धन पर्वत उठा लिया! बड़े होकर उन्होंने अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया।
रोचक तथ्य:
जन्माष्टमी पर उनका जन्मदिन ठीक आधी रात को मनाया जाता है।
उन्होंने विषैले कालिय नाग के फनों पर नाचकर यमुना को साफ किया।
वे सात दिन तक गोवर्धन पर्वत उठाए खड़े रहे — सबसे छोटी अंगुली पर!
महाभारत के युद्ध में उन्होंने कोई हथियार नहीं उठाया — वे अर्जुन के सारथी बने।
सीख: अपना काम मन लगाकर करो और नतीजे की चिंता भगवान पर छोड़ दो — यही गीता की सबसे बड़ी सीख है।