धरती की कोख का अंगारा — जन्म-धाराएँ, उज्जैन और मंगल-विवेक
पृष्ठभूमि — जिस ग्रह की माँ धरती हो
नवग्रहों में मंगल अकेले हैं जिनकी जन्म-कथा का केंद्र कोई देव-प्रकोप या शाप नहीं — माता है, और माता भी कौन: स्वयं पृथ्वी। यह वंश-सूत्र उनके समूचे कारकत्व की कुंजी है — भूमि का पुत्र भूमि-भवन का कारक हुआ; धरती के गर्भ की अग्नि (ज्वालामुखी-तेज) का अंश हुआ तो रक्त-वर्ण और उग्र-वीर्य; और धरती-सा ही धैर्य-भार भी उसकी प्रकृति में रहा — ज्योतिष मंगल को क्रूर कहता है, कपटी कभी नहीं: भौम का क्रोध खुला युद्ध है, षड्यंत्र नहीं — यह "धरती-स्वभाव" है, जो फटती है तो सामने से।
जन्म-धारा एक — वराह-भूदेवी का तेजस्वी पुत्र
पहली और वैष्णव-प्रधान धारा वराह-प्रसंग (D018) की संतति-रेखा है। रसातल से पृथ्वी का उद्धार कर जब यज्ञवराह ने भूदेवी को पुनः प्रतिष्ठित किया, तो कृतज्ञता और अनुराग के उस दिव्य-मिलन से एक रक्त-दीप्त पुत्र जन्मा — भौम। धाराएँ जोड़ती हैं कि जन्म-क्षण से ही उसकी देह से अंगार-सी आभा फूटती थी; माता ने उसे तप-मार्ग दिखाया, और भौम ने (क्षेत्र-पाठों में काशी/उज्जयिनी-तट पर) शिव-आराधना से ग्रह-पद अर्जित किया — नवग्रह-सभा में तृतीय आसन और सेनापति-भार। इसी वंश-रेखा का दूसरा — विपरीत — छोर परिचित है: भूदेवी का ही एक और पुत्र नरकासुर (भौमासुर!) अधर्म-पथ पर गया और कृष्ण-हस्तों मुक्त हुआ (D014/D018 पूर्व-दर्ज)। एक ही माँ के दो "भौम" — एक ग्रह-देव बना, एक असुर: पुराणों की यह जोड़ी स्पष्ट कह रही है कि जन्म-ऊर्जा नियति नहीं होती — दिशा होती है; धरती की आग चूल्हा भी है, दावानल भी।
जन्म-धारा दो — शिव-स्वेद और उज्जैन का दावा
दूसरी धारा शैव है और उसका भूगोल आज भी दर्शनार्थियों से भरा है। अंधकासुर-संग्राम (शिव पुराण-धारा) में महादेव के घोर युद्ध-श्रम से ललाट का स्वेद-बिंदु (पसीने की बूँद) उज्जयिनी की धरती पर गिरा — और धरती ने उसे गर्भ-वत् धारण कर जिस रक्तिम तेज-पुत्र को जन्म दिया, वही अंगारक-मंगल हुआ: यहाँ भी माता भूमि ही हैं, बीज शिव-तेज का है — दोनों धाराओं में "भौम" नाम अक्षुण्ण। इसी कथा पर उज्जैन का मंगलनाथ महादेव मंदिर खड़ा है — परंपरा उसे मंगल की जन्मभूमि कहती है, और विशेष यह कि वहाँ पूजित विग्रह शिवलिंग है: पुत्र की जन्मभूमि पर पिता-रूप की अर्चना — भात-पूजा (पके चावल का शीतल-लेपन) वहाँ की प्रसिद्ध विधि है, जिसका लोक-तर्क सीधा है: उग्र अंगारक को भात-सा शीतल आवरण। खगोल-गौरव भी इस दावे के पक्ष में खड़ा किया जाता है — उज्जैन प्राचीन भारतीय ज्योतिष की मध्य-रेखा (शून्य देशांतर) नगरी रही; ग्रह-गणना की राजधानी में ग्रह-जन्म की स्थल-कथा का बसना सांस्कृतिक दृष्टि से सर्वथा संगत है (स्थल-परंपरा — ग्रेड B/D)। दक्षिण की समांतर पीठ-परंपरा वैथीश्वरन् कोइल (तमिलनाडु) है — नवग्रह-स्थलों में अंगारक-क्षेत्र, जहाँ मंगल शिव-वैद्यनाथ के आश्रित रूप में पूजित हैं: उत्तर-दक्षिण दोनों में मंगल शिव-छत्र के नीचे ही मिलते हैं — उग्र का अनुशासन उग्रेश्वर के घर।
ग्रह-सभा का सेनापति — पद और प्रकृति
ज्योतिष-परंपरा नवग्रहों को एक राज-सभा रूप में पढ़ती आई है — सूर्य-चन्द्र राज-दंपती (राजा-रानी पद), बुध युवराज, गुरु-शुक्र दोनों पक्षों के मंत्री-आचार्य, शनि सेवा-न्याय विभाग, राहु-केतु छाया-सेना; और इस पूरी सभा की तलवार — मंगल: सेनापति। पद की यह कल्पना उनके फल-विचार की कुंजी है: सेनापति का काम आदेश पर तुरंत, पूर्ण-बल प्रहार है — विचार-विमर्श मंत्रियों (गुरु-बुध) का विभाग है; इसीलिए शुभ-युति में मंगल विजय, शल्य-कौशल, भूमि-लाभ और नेतृत्व देता है, और अशुभ-योग में वही वेग कलह-दुर्घटना-उग्रता बन जाता है — तलवार वही, म्यान और आदेश बदल जाते हैं। कुंडली-पाठ की भाषा में "मंगल कहाँ बैठा है" का अर्थ ही है — इस जीवन की सेना किस मोर्चे पर तैनात है।
मंगल-दोष — भय से विवेक तक
लोक-जीवन में मंगल सबसे अधिक जिस द्वार से आते हैं, वह विवाह-पत्रिका है — "मांगलिक" शब्द ने कितने घरों में कितनी चिंताएँ बोई हैं, यह सर्वविदित है; इसलिए इस ज्ञानकोश का धर्म है कि यहाँ शास्त्र-विवेक दर्ज हो। ज्योतिष-सिद्धांत में "कुज-दोष" कुंडली के कुछ भावों (1-4-7-8-12 गणना-परंपराएँ) में मंगल-स्थिति से विचारा जाता है — पर वही शास्त्र तत्काल परिहार-अध्याय भी खोलता है: भाव-राशि-दृष्टि के अनेक संयोगों में दोष स्वयं भंग माना जाता है, दोनों पत्रिकाओं के मेल से संतुलन गिना जाता है, और परिहार-विधियाँ (कुंभ-विवाह आदि लोक-रूप) प्रतीकात्मक समाधान रही हैं। मर्म यह कि परंपरा में मंगल-दोष "भाग्य-दंड" नहीं — ऊर्जा-असंतुलन की सूचना है: प्रबल भौम-ऊर्जा वाले स्वभावों के मेल-मिलान का विवेक; भय-व्यापार उसका शास्त्र-सम्मत उपयोग नहीं (विवेक-टिप्पणी — परियोजना-नीति अनुसार)। इसी ऊर्जा-दर्शन से जुड़ी है ऋण-मोचन परंपरा — "ऋणमोचक मंगल स्तोत्र" का पाठ ऋण-मुक्ति की प्रसिद्ध विधि है (स्कंद-धारा; पूर्ण-पाठ सत्यापन-विस्तार में): संकेत सुंदर है — ऋण भी तो रक्त-ऊर्जा और भूमि-संपत्ति का ही असंतुलन है; जिस देवता के पास बल और भूमि दोनों के खाते हैं, उसी के दरबार में उधारी के मुकदमे लगते हैं। और अंगारकी चतुर्थी — मंगलवार को पड़ने वाली संकष्टी (D004) — महाराष्ट्र-भर में विशेष फलदा गिनी जाती है: विघ्नहर्ता और सेनापति की युति का दिन; मंगलवार का दूसरा लोक-द्वार हनुमान (D012) हैं — बल-ब्रह्मचर्य के दो रक्त-वर्ण आराध्य एक ही वार पर: लोक ने ऊर्जा-प्रबंधन का पूरा साप्ताहिक विधान यों रच रखा है।
आध्यात्मिक अर्थ — अंगारे की दिशा
मंगल-तत्त्व का पाठ ऊर्जा-प्रबंधन का पाठ है। पहला — नाम-विधि: उग्र को "मंगल" कहना केवल शिष्टाचार नहीं, साधना-सूत्र है; अपने भीतर के क्रोध-आवेग को शत्रु कहोगे तो वह विद्रोही होगा, "मंगल" — कल्याण-शक्ति — मानकर दिशा दोगे तो सेनापति बनेगा: वही ऊर्जा जो कलह में जलाती है, संकल्प में सिद्ध कराती है। दूसरा — दो भौम का दर्पण: ग्रह-देव मंगल और भौमासुर एक ही मातृ-ऊर्जा की दो परिणतियाँ हैं — तप ने एक को नवग्रह-आसन दिया, भोग-लिप्सा ने दूसरे को वध-स्तंभ; युवा-रक्त के लिए इससे सीधा पाठ्यक्रम नहीं। तीसरा — भूमि-धर्म: भौम का कारकत्व भूमि है — और भूमि का स्वभाव देना: जो पराक्रम अर्जन-भर में लगे वह अधूरा है, भूमि-पुत्र वही सार्थक जो माँ की तरह उपजाए-बाँटे; संपत्ति-विवाद (मंगल-क्षेत्र के प्रिय मुकदमे!) प्रायः इसी धर्म के विस्मरण हैं। और चौथा — भात-पूजा का घर-सूत्र: उज्जैन की विधि हर घर की विधि बन सकती है — तप्त स्वभावों पर शीतल-लेप (मीठी वाणी, धैर्य, अन्न-जल का सम्मान) ही सच्चा मंगल-शांति पाठ है; ग्रह दान-दक्षिणा से उतना नहीं सधता जितना स्वभाव-संस्कार से। अंगारा बुझाना नहीं है — चूल्हे में रखना है: यही मंगल-उपासना का एक वाक्य में सार है।