श्री वराह अवतार

Varaha · दशावतार-तृतीय · भूदेवी-उद्धारक · यज्ञवराह

विष्णु का तृतीय अवतार — वह महावराह जिसने रसातल में डुबोई गई पृथ्वी को अपनी दंष्ट्रा (दाँतों) पर उठाकर पुनः स्थापित किया और अत्याचारी हिरण्याक्ष का वध किया। धरती जब भी डूबती है, यह कथा फिर सुनाई जाती है।

श्रेणी: विष्णु-अवतार (दशावतार-3) परंपरा: वैष्णव / पैन-हिंदू ग्रंथ: भागवत 3.13-19 · वराह पुराण पर्व: वराह जयंती
प्रमुख कथा पढ़ें
वराह अवतार — उदासी-परंपरा की सचित्र पोथी (1757-59): नील वराह-मूर्ति, कमल-गदा सहित; शीर्ष पर गुरुमुखी पाठ सिख (उदासी) सचित्र पोथी 1757-59 · Public Domain · Wikimedia Commons
भू-उद्धारकडूबी धरती के त्राता
धरणीधरदंष्ट्रा पर लोक-मंडल
यज्ञवराहअंग-अंग यज्ञ-स्वरूप
हिरण्याक्ष-हंताप्रथम महादैत्य-विजय

परिचय एवं दिव्य स्वरूप

Introduction

वराह विष्णु का तृतीय अवतार है — दशावतार-शृंखला में जल (मत्स्य) और जल-थल संधि (कूर्म) के बाद थल-प्रतिष्ठा का चरण: पृथ्वी को ही जब रसातल में डुबो दिया गया, तब उसे दाँतों पर उठा लाने वाला महाशूकर। मूर्ति-परंपरा में वराह तीन प्रमुख रूपों में मिलते हैं — पूर्ण पशु-रूप "यज्ञवराह" (जिसकी देह पर देव-ऋषि अंकित होते हैं — उदयगिरि/एरण की विश्वप्रसिद्ध प्रतिमाएँ), नर-वराह (मानव-देह, वराह-मुख — दंष्ट्रा पर या भुजा में भूदेवी), और भूवराह-युगल (गोद/जंघा पर विराजित भूदेवी सहित)। "यज्ञवराह" संज्ञा पुराणों की उस स्तुति से है जो वराह-देह के अंग-अंग को यज्ञ-उपकरण कहती है — पाँव वेद, दंष्ट्रा यूप, जिह्वा अग्नि, रोम कुश, मुख स्रुवा: अर्थात् पृथ्वी का उद्धार स्वयं यज्ञ-पुरुष ने किया — रक्षा भी एक यज्ञ है।

इस अवतार की जड़ें भी वैदिक-गर्भ तक जाती हैं — तैत्तिरीय संहिता/ब्राह्मण और शतपथ की जल-से-पृथ्वी उठाने वाली प्रजापति-वराह कथाएँ (एमूष वराह) पुराण-कथा की पूर्व-छायाएँ हैं; पुराण-युग में यह कार्य विष्णु-अवतार को मिला और उसमें हिरण्याक्ष-संग्राम तथा भूदेवी-अनुराग के अध्याय जुड़े। गुप्त-काल ने इस अवतार को राजकीय प्रतीक बनाया — "धरती को संकट से उठाने वाला" राजा वराह-रूपक में स्वयं को देखता था; उदयगिरि (विदिशा) की गुफा-5 का महावराह भारतीय शिल्प का युग-चिह्न है।

स्वरूप एवं संबंध

Form & Relations
  • मूल-स्वरूपभगवान विष्णु — दशावतार-क्रम में तृतीय
  • संगिनीभूदेवी (पृथ्वी) — उद्धार-प्रसंग से वराह-प्रिया; दक्षिण-परंपरा में विष्णु की द्वितीय महिषी
  • प्रतिपक्षहिरण्याक्ष — दिति-पुत्र, जय-विजय के प्रथम जन्म की जोड़ी का छोटा भाई
  • कथा-सूत्रबड़ा भाई हिरण्यकशिपु — अगले अवतार नृसिंह (D019) का प्रतिपक्ष: दो अवतार, एक शाप-शृंखला
  • संतति-परंपरानरकासुर (भूदेवी-पुत्र — भौम) — जिसका वध कृष्ण-काल में हुआ (D014)

प्रमुख कथा

Major Story — न्यूनतम 1,000 शब्दों में
प्रमुख कथा

नासिका से निकला त्राता — पृथ्वी का दंष्ट्रा-उद्धार

पृष्ठभूमि — डूबी हुई धरती और द्वारपालों का शाप

कथा के तल में दो धाराएँ मिलती हैं। पहली — सृष्टि-क्रम की: स्वायंभुव मनु को प्रजा-विस्तार का आदेश मिला, पर बसने के लिए पृथ्वी ही स्थान पर नहीं थी — वह रसातल (गर्भोदक/प्रलय-जल) में निमग्न थी। ब्रह्मा चिंतन में डूबे — "जिसे मैंने रचा, वह धरा कहाँ?" दूसरी धारा — वैकुंठ की: सनकादि कुमारों को द्वार पर रोकने वाले जय-विजय को शाप मिला कि तीन जन्म भगवद्-विरोधी होकर लेने होंगे (यह शाप-शृंखला आगे तीन अवतारों की कथा-रीढ़ है — पहले जन्म में हिरण्याक्ष-हिरण्यकशिपु, फिर रावण-कुंभकर्ण, फिर शिशुपाल-दंतवक्र)। दिति के गर्भ से जन्मे उस पहले युगल में छोटा हिरण्याक्ष ("स्वर्ण-नेत्र") ऐसा बलोन्मत्त हुआ कि गदा घुमाता समुद्रों को रौंदता वरुण तक से युद्ध माँगने पहुँचा; वरुण ने कूटनीति से कहा — मुझमें अब वह बल कहाँ, युद्ध चाहिए तो उनसे माँगो जो सबका संहार करते हैं। और पुराणों की एक प्रबल धारा (विष्णु पुराण-परंपरा एवं लोक-प्रचलित पाठ) में पृथ्वी के रसातल-गमन का कारण भी यही दैत्य है — उसने धरती को समेटकर जल में डुबो दिया; भागवत-पाठ में पृथ्वी प्रलय-जल में निमग्न है और हिरण्याक्ष जल-क्रीड़ा करता वहीं मिलता है — दोनों पाठ-रूप यहाँ ईमानदारी से साथ दर्ज हैं (भेद चिह्नित): फल एक ही है — धरती नीचे, दैत्य जल में, और सृष्टि रुकी हुई।

अंगुष्ठ से आकाश तक — नासिका-प्राकट्य

ब्रह्मा के चिंतन-क्षण में विलक्षण घटना घटी — उनकी नासिका (नथुने) से अंगुष्ठ-प्रमाण एक नन्हा वराह-शिशु निकला और देखते-देखते आकाश में पर्वताकार होता गया — गज-सा, फिर गिरि-सा, फिर लोक-व्यापी: सत्यलोक तक गूँजती उसकी घुरघुराहट (गर्जन) सुनकर जनलोक-तपोलोक के ऋषियों ने पहचान लिया — यह यज्ञ-पुरुष का ही रूप है, और वेद-स्तुतियों से अभिनंदन किया। यह प्राकट्य-रीति अपने-आप में सूत्र है — ब्रह्मा की "नाक से" यानी प्राण से, विचार की सूक्ष्मतम श्वास से निकला समाधान, जो आरंभ में अँगूठे-भर दिखता है और आवश्यकता के नाप से बढ़ता जाता है (मत्स्य की वृद्धि-लीला का थल-संस्करण)। महावराह ने गर्जना कर जल में गोता लगाया — खुरों से जल चीरता, गंध-संकेत से (शूकर-प्रकृति की ही दिव्य-विधि) पाताल-पथ सूँघता वह वहाँ पहुँचा जहाँ धरा मलिन-वसना डूबी पड़ी थी। दंष्ट्रा ने उसे कोमलता से उठाया — पुराण-कवियों का प्रिय चित्र यही है: लोक-मंडल उन श्वेत दाँतों पर ऐसे शोभित हुआ जैसे (जयदेव की उपमा में) चंद्रमा पर उसका कलंक-चिह्न, या कमल-दल पर जल-बिंदु। भागवत में इस क्षण ऋषियों की जो वेद-गर्भ स्तुति है (3.13.34 आदि), वही "यज्ञवराह" दर्शन का मूल-पाठ है — छंद जिसके रोम हैं, वेदी जिसका स्कंध, हवि जिसकी गंध: ऋषि कह रहे हैं कि हमारे सामने पशु नहीं, मूर्तिमान यज्ञ-तंत्र जल चीर रहा है; इसी स्तुति-परंपरा से शिल्पियों ने वे प्रतिमाएँ गढ़ीं जिनकी देह पर देव-ऋषि-मंडल उकेरा जाता है। जल-सतह की ओर लौटते त्राता का मार्ग गदा लिए हिरण्याक्ष ने रोका — "अरे वनचर पशु! यह धरा छोड़कर जा!" — त्राण और अहंकार आमने-सामने थे।

गदा-युद्ध — सहस्र वर्ष का द्वंद्व

वराह ने पहले कार्य पूरा किया — यह क्रम ध्यान देने योग्य है: पृथ्वी को जल के ऊपर स्थापित कर, उस पर अपनी योग-शक्ति से आधार (धारण-शक्ति) रखकर ही वे युद्ध को मुड़े; रक्षक का धर्म पहले रक्षा है, प्रतिशोध बाद में। फिर वह गदा-द्वंद्व हुआ जिसे भागवत देव-दानव युद्धों का आदि-मल्ल कहता है — ब्रह्मांड काँपता रहा; दिति के हृदय में अपशकुन दौड़े। हिरण्याक्ष के छल-बल — माया-अंधकार, शिला-वर्षा, अदृश्य-प्रहार — वराह-तेज के आगे बुझते गए; ब्रह्मा ने स्मरण कराया कि संध्या-वेला आ रही है, दैत्य वर-बल से रात्रि में और प्रबल होगा — खेल समाप्त कीजिए। और तब कान की जड़ पर वराह के एक थप्पड़-प्रहार (कर्ण-मूल पर तल-प्रहार) से वह महादैत्य घूमकर गिरा — जिसके भय से लोक काँपते थे, वह ऐसे गिरा जैसे आँधी से उखड़ा वट। भागवत की श्रद्धांजलि-पंक्ति दैत्य को भी गरिमा देती है — मरते हुए उसका मुख भगवान के चरण-स्पर्श से दमक रहा था; ऋषियों ने कहा — धन्य है यह भी, जिसका अंत स्वयं यज्ञ-पुरुष के हाथों हुआ: वैर-मार्ग से भी जो प्रभु-चिंतन में जिए, उसकी गति भी छू ही ली जाती है (जय-विजय की मुक्ति-यात्रा का पहला चरण पूरा हुआ — अगला चरण D019 नृसिंह-कथा में)।

भूदेवी-संवाद और वराह पुराण

उद्धार के बाद की धारा दक्षिण-परंपरा में विशेष विकसित है — कृतज्ञ भूदेवी का वराह-अनुराग: वे विष्णु की नित्य-संगिनी (श्रीदेवी-भूदेवी युगल की द्वितीया) हुईं; तिरुमला-परंपरा में तो विधान ही है कि वेंकटेश्वर-दर्शन से पूर्व भू-वराह स्वामी (स्वामी पुष्करिणी-तट) का दर्शन हो — क्योंकि वह क्षेत्र मूलतः वराह-क्षेत्र है, वेंकटेश्वर को निवास वराह-अनुमति से मिला (स्थल-पुराण, ग्रेड B)। वराह पुराण इसी युगल-संवाद का ग्रंथ है — वराह-मुख से भूदेवी को कहे गए धर्म, व्रत, तीर्थ और भक्ति-प्रकरण; "वराह-कल्प" की गणना भी इसी अवतार से — वर्तमान कल्प का नाम ही श्वेतवराह कल्प है: हर संकल्प-मंत्र में जब पुरोहित "श्वेतवराहकल्पे..." पढ़ता है, वह इसी उद्धार-लीला की स्मृति है — हिंदू काल-गणना की घड़ी वराह-क्षण से चल रही है। और भूदेवी-वंश का एक काँटा भी परंपरा दर्ज करती है — पुत्र नरकासुर (भौम), जो माता के पुण्य-कवच के बावजूद अधर्मी हुआ और अंततः कृष्ण-सत्यभामा के हाथों मुक्त हुआ (D014): धरती का बेटा भी बिगड़ सकता है, और तब स्वयं धरती उसकी ढाल नहीं बनती — भूदेवी-नीति का यह कठोर पक्ष भी कथा-परंपरा ने बचा रखा है।

आध्यात्मिक अर्थ — डूबे हुए को दाँतों पर उठाना

वराह-कथा का प्रतीक-कोश थल-जीवन का है। पृथ्वी यहाँ केवल ग्रह नहीं — जीव की धर्म-भूमि है: कर्तव्य, मर्यादा, आजीविका, संबंध — वह सब जिस पर जीवन "बसता" है; हिरण्याक्ष ("सोने की आँख") वह दृष्टि है जिसे हर वस्तु में केवल स्वर्ण दिखता है — लोभ जब चरम पर जाता है तो धर्म-भूमि ही रसातल में चली जाती है। उद्धारक रूप शूकर का चुना जाना पुराण-विनोद नहीं, गहन संकेत है — कीचड़ से उठाने का काम वही कर सकता है जो कीचड़ में उतरने से घिनाता नहीं; प्रभु ने पतितोद्धार के लिए वह देह धरी जिसे संसार "अशुद्ध" कहता है — करुणा शुद्धता-अहंकार से बड़ी है। दंष्ट्रा-उद्धार की कोमलता (दाँत — जो चीरने के उपकरण हैं — यहाँ पालने बने) सिखाती है कि शक्ति की सार्थकता संहार में नहीं, संधारण में है। और यज्ञवराह-स्तुति का सार: रक्षा-कर्म ही सबसे बड़ा यज्ञ है — जो डूबते को उठाए, उसके पाँव वेद और श्वास मंत्र हो जाते हैं, भले उसका रूप संसार की आँख में शूकर-सा ही क्यों न हो।

स्रोत टिप्पणी: नासिका-प्राकट्य, वृद्धि, उद्धार, यज्ञवराह-स्तुति — भागवत 3.13; हिरण्याक्ष-वरुण एवं गदा-युद्ध-वध 3.17-19; जय-विजय शाप 3.15-16 (सभी ग्रेड A); पृथ्वी-डुबाने वाला हिरण्याक्ष विष्णु पुराण-परंपरा/लोक-पाठ (ग्रेड A/B — भागवत से भेद चिह्नित); एमूष-वराह वैदिक स्तर (तैत्तिरीय/शतपथ — ग्रेड A, स्तर पृथक्); तिरुमला भू-वराह विधान स्थल-पुराण (ग्रेड B); श्वेतवराह कल्प संकल्प-परंपरा (ग्रेड A — जीवित विधि)।

नाम एवं अर्थ

Names
वराह
शूकर — वर+आह: श्रेष्ठ वरदाता की निरुक्ति-धारा भी परंपरा में।
यज्ञवराह
जिसकी देह के अंग-अंग यज्ञ-उपकरण — पुराण-स्तुति का रूप।
भूवराह / धरणीधर
भूदेवी-सहित/भूदेवी-धारक रूप — दक्षिण के मंदिर-विग्रहों का प्रधान नाम।
आदिवराह
तिरुमला-परंपरा एवं प्राचीन राज-मुद्राओं (चालुक्य-गुर्जर आदि के वराह-लांछन) का संबोधन।

मंत्र एवं पाठ

Mantras

नाम मंत्र

ॐ वराहरूपाय नमः ॥

दशावतार-स्तोत्र — वराह-वंदना

वसति दशनशिखरे धरणी तव लग्ना
शशिनि कलङ्ककलेव निमग्ना ।
केशव धृतशूकररूप जय जगदीश हरे ॥

अर्थ: आपके दंष्ट्रा-शिखर पर धरती ऐसी विराजी है जैसे चंद्रमा में उसकी कलंक-रेखा; हे शूकर-रूपधारी केशव! जय जगदीश हरे। — जयदेव।

वराह-गायत्री, भू-स्तुति एवं वराह पुराण के स्तोत्र-अंश शब्दशः सत्यापन के साथ भावी मंत्र-सूचकांक विस्तार में — यहाँ नियम-अनुसार असत्यापित पूर्ण-पाठ नहीं छापा गया।

पर्व एवं व्रत

Festivals
वराह जयंती
भाद्रपद शुक्ल तृतीया (गणेश चतुर्थी-पूर्व दिवस की प्रचलित गणना) — प्राकट्य-पर्व; भूमि-पूजन संकल्पों में विशेष।
तिरुमला वराह-दर्शन विधि
वेंकटेश्वर से पूर्व भू-वराह स्वामी दर्शन की नित्य-परंपरा — प्रतिदिन का "वराह-पर्व"।
श्वेतवराह-कल्प संकल्प
हर पूजा-संकल्प में "श्वेतवराहकल्पे" — काल-गणना में अवतार की दैनिक स्मृति।

मंदिर एवं तीर्थ

Temples
भू-वराह स्वामी, तिरुमला (आंध्र)
स्वामी पुष्करिणी-तट का आदिवराह क्षेत्र — वेंकटेश्वर-दर्शन की पूर्व-शर्त परंपरा।
श्रीमुष्णम् (तमिलनाडु)
भूवराहस्वामी का स्वयंव्यक्त-क्षेत्र — वैष्णव-परंपरा के आठ स्वयंव्यक्त क्षेत्रों में गण्य।
उदयगिरि गुफाएँ, विदिशा (म.प्र.)
गुप्तकालीन (5वीं सदी) महावराह शैल-पट — भारतीय शिल्प का युग-प्रसिद्ध दृश्य।
खजुराहो वराह-मंडप / एरण
चंदेल यज्ञवराह प्रतिमा (देह पर देव-मंडल) एवं एरण का विशाल पशु-रूप वराह।

बच्चों के लिए ज्ञान

For Children

सरल परिचय: एक बार दुष्ट राक्षस हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को समुद्र के नीचे छिपा दिया। तब विष्णु भगवान विशाल वराह (सूअर) का रूप लेकर पानी में उतरे, अपने मज़बूत दाँतों पर पूरी पृथ्वी उठा लाए और राक्षस को हराया!

रोचक तथ्य:

  • वराह भगवान ब्रह्मा जी की नाक से अँगूठे जितने छोटे रूप में निकले और पहाड़ जितने बड़े हो गए।
  • यह विष्णु जी का तीसरा अवतार है।
  • हिरण्याक्ष का भाई था हिरण्यकशिपु — उसकी कहानी नृसिंह अवतार में आती है।
  • हमारे युग (कल्प) का नाम ही "श्वेतवराह कल्प" है!

सीख: जो गिर गया हो उसे उठाने में कभी मत हिचकिचाओ — मदद करने वाले हाथ सबसे सुंदर होते हैं।

मिनी क्विज़:

  1. पृथ्वी को किसने डुबोया था?
  2. वराह भगवान कहाँ से प्रकट हुए?
  3. उन्होंने पृथ्वी किस पर उठाई?
  4. हिरण्याक्ष के भाई का नाम क्या था?