माता अन्नपूर्णा

Annapurna · अन्न-पूर्णा · काशी-महारानी · भवानी-भिक्षा-दात्री

जिनके नाम का अर्थ ही है — अन्न से पूर्ण: वह देवी जिनके द्वार पर स्वयं महादेव भिक्षा-पात्र लेकर खड़े हुए। काशी की अधिष्ठात्री अन्न-महारानी, जिनका दर्शन कहता है: अन्न ब्रह्म है — और परोसने वाले हाथ ब्रह्म के हाथ।

श्रेणी: शक्ति-रूप (B) · काशी-अधिष्ठात्री कर-चिह्न: रत्न-पात्र एवं दर्वी (कलछी) महापर्व: अन्नकूट (कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा) स्तोत्र: अन्नपूर्णा-स्तोत्र (शंकर-परंपरा)
प्रमुख कथा पढ़ें
अन्न-दात्रीक्षुधा का देवी-स्तर उत्तर
सदा-पूर्णापात्र जो परोसने से घटता नहीं
काशी-राज्ञीविश्वनाथ-नगरी की गृह-स्वामिनी
अन्न-ब्रह्म साक्षीभोजन को यज्ञ बनाने वाली दृष्टि

परिचय एवं दिव्य स्वरूप

Introduction

वह कथा जिसने इस देवी को जन्म दिया — पार्वती का लीला-रूठकर जगत् से अन्न-तत्त्व समेट लेना, जगत् की क्षुधा, और स्वयं शिव का काशी में भिक्षा-पात्र लेकर देवी के द्वार आना — इस कोश में पार्वती-पृष्ठ (D006, कथा-2: "अन्नपूर्णा — जब शिव ने भिक्षा माँगी") पर पूर्ण विस्तार से खड़ी है। यह पृष्ठ उस कथा का क्षेत्र-पक्ष है: वह देवी जो उस दिन से काशी में रह गईं — अन्नपूर्णा: विश्वनाथ की नगरी की अन्न-महारानी, जिनके विषय में काशी-वासी आज भी कहते हैं कि इस नगरी में कोई भूखा नहीं सोता, क्योंकि रसोई माँ की है।

स्वरूप-ध्यान गृहस्थ-कोमल है: रक्तिम-स्वर्ण आभा, एक कर में रत्न-जटित अन्न-पात्र, दूसरे में दर्वी (परोसने की कलछी) — आयुध नहीं, रसोई के उपकरण: भारतीय मूर्ति-परंपरा में यह विरल व्याकरण है — देवत्व चूल्हे की भाषा में। सम्मुख भिक्षु-रूप शिव — जगत् के अन्नदाता से अन्न लेते संन्यासी-ईश्वर: दाता-याचक का यह विनिमय ही अन्नपूर्णा-दर्शन है, जिसकी परतें नीचे की कथा खोलती है।

परिवार एवं संबंध

Family
  • तत्त्व-मूलपार्वती (D006) का अन्न-दात्री रूप — भिक्षा-कथा मुख्य-रेखा वहीं
  • पति-पक्षशिव (D003) — काशी-विश्वनाथ; भिक्षु-याचक लीला-युग्म
  • पोषण-मंडलशाकम्भरी (D009-धारा), भूदेवी (D060), भुवनेश्वरी (D073) — धारण-पोषण वर्ग
  • क्षेत्र-सम्बन्धकाशी — विश्वनाथ-अन्नपूर्णा युग्म-मंदिर; सिद्धिदात्री-यात्रा नगरी (D069)
  • पर्व-सेतुअन्नकूट — गोवर्धन-कथा (D014/D039) का अन्न-पक्ष

प्रमुख कथा

Major Story — न्यूनतम 1,000 शब्दों में
प्रमुख कथा / क्षेत्र-दर्शन

काशी की रसोई — अन्न-ब्रह्म का जीवित शास्त्र

जहाँ वैराग्य ने भूख को प्रणाम किया

कथा-स्मृति से आरम्भ कीजिए (विस्तार D006 पर): जब अन्न-तत्त्व जगत् से लुप्त हुआ, तो योगियों की समाधियाँ टूट गईं, वेदपाठियों के कण्ठ सूख गए — और अंततः स्वयं वह महादेव, जो श्मशान-भस्म रमाकर अन्न-निरपेक्ष वैराग्य के आदि-प्रतीक हैं, पात्र लेकर उस द्वार आए जहाँ देवी रसोई सजाए बैठी थीं। यह दृश्य भारतीय दर्शन का सबसे विनम्र क्षण है: वैराग्य ने भूख को प्रणाम किया। जो सिद्धांत यहाँ स्थापित हुआ, तैत्तिरीय उपनिषद् उसे सूत्र-भाषा में पहले ही कह चुका था — "अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्" (3.2): (भृगु ने तप करके) जाना कि अन्न ब्रह्म है — क्योंकि अन्न से ही प्राणी जन्मते, जीते और अन्न में ही लौट जाते हैं; और उसी परंपरा का व्रत-वाक्य: "अन्नं न निन्द्यात्" — अन्न की निंदा न करे, "अन्नं बहु कुर्वीत" — अन्न बहुत करे (उपजाए-बाँटे)। अन्नपूर्णा इसी उपनिषद्-सूत्र की मूर्ति हैं: अन्न कोई "निम्न" भौतिक वस्तु नहीं जिससे अध्यात्म ऊपर उठ जाए — अन्न वह पहला ब्रह्म है जिसकी उपेक्षा करने वाला अध्यात्म झूठा है। देह अन्नमय कोश है (तैत्तिरीय का पंचकोश-क्रम) — और सीढ़ी का पहला डंडा तोड़कर कोई छत पर नहीं पहुँचता।

काशी — मोक्ष-नगरी की अन्न-व्यवस्था

अब क्षेत्र-दर्शन: देवी ने वास के लिए काशी क्यों चुनी? काशी-खंड की परंपरा इसका उत्तर नगर-रचना से देती है। काशी मोक्ष-नगरी है — "काश्यां मरणान्मुक्तिः" की भूमि; यहाँ जीवन का अंतिम सत्य (मृत्यु-मुक्ति) विश्वनाथ सँभालते हैं। पर परंपरा जानती थी कि मोक्ष की नगरी को भी रसोई चाहिए — भूखे पेट कोई मुक्ति-चिंतन नहीं होता; इसीलिए विश्वनाथ-धाम के ठीक पार्श्व में अन्नपूर्णा-मंदिर है, और लोक-वाणी कहती है: बाबा विश्वनाथ मुक्ति देते हैं, माँ अन्नपूर्णा भुक्ति — काशी में मोक्ष भी माँ की रसोई से होकर जाता है। परंपरा-वचन यह भी कि काशी में मरणासन्न जीव को स्वयं शिव तारक-मंत्र देते हैं — पर वह भी तभी सम्भव है जब जीव यहाँ तक जीवित पहुँचे: वह जीवन-यात्रा माँ के अन्न से चलती है। मंदिर-परंपरा इस दर्शन को विधि में जीती है: अन्नपूर्णा-मंदिर का अन्नक्षेत्र (भंडारा) शताब्दियों से अखंड है; और वर्ष में एक बार — धनतेरस से दीपावली-काल में — मंदिर का स्वर्ण-अन्नपूर्णा दर्शन खुलता है, जब देवी की स्वर्णमयी प्रतिमा के साथ ख़ज़ाने का सिक्का-धान प्रसाद रूप में बँटता है — लोक उसे घर की तिजोरी-रसोई में रखता है: अर्थ पारदर्शी — माँ का दिया बीज-धान घर के अन्न-वैभव का संकल्प है।

अन्नकूट — अन्न का पर्वत, कृतज्ञता का शिखर

अन्नपूर्णा-संस्कृति का महापर्व अन्नकूट है — कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा (दीपावली के अगले दिन): "अन्न का कूट" — पर्वत। इस दिन मंदिरों में — काशी-अन्नपूर्णा से वृंदावन-नाथद्वारा तक — सैकड़ों-हज़ारों पकवानों का अन्न-पर्वत सजाया जाता है: छप्पन-भोग से लेकर कहीं-कहीं सहस्र-व्यंजन तक। पर्व की जड़ में गोवर्धन-कथा है (D014-मुख्य: इन्द्र-मद-भंग, D039) — कृष्ण ने ब्रज से कहा था कि पूजा उस पर्वत की करो जिसकी घास-जल से तुम्हारे गोधन जीते हैं; अन्नकूट उसी का पाक-रूप है: वर्ष-भर जिस अन्न ने पाला, एक दिन उसका पर्वत रचकर उसे देवता मानकर पूजना। ध्यान दीजिए यह पर्व फसल-चक्र की संधि पर है — खरीफ़ कट रही है, नया धान घर आया है: अन्नकूट किसान-संस्कृति का धन्यवाद-पर्व है, और उसका शास्त्र-सम्मत नियम यह कि पर्वत अंततः बँट जाए — प्रसाद रूप में सहस्रों तक: संग्रह का उत्सव नहीं, वितरण का। यही अन्नपूर्णा-अर्थशास्त्र है, जिसे भारतीय रसोई-संस्कार सूक्ष्म नियमों में जीता आया है: थाली में अन्न छोड़ना अन्न-देवी का अनादर; पहली रोटी गाय की, अंतिम कुत्ते की (वैश्वदेव-बलि परंपरा); अतिथि को बिना खिलाए न जाने देना; और अन्न-दान को दानों में सर्वोपरि कहना — "अन्नदानं परं दानम्" की स्मृति-धारा: क्योंकि अन्य हर दान में पात्र बचा रह सकता है, भूखे को खिलाया अन्न उसी क्षण प्राण बन जाता है।

अक्षय-पात्र — जो परोसने से नहीं घटता

अन्नपूर्णा-तत्त्व का महाभारत-मुख भी स्मरणीय है — अक्षय-पात्र: वनवास-काल में द्रौपदी को सूर्यदेव (D043) से मिला वह पात्र, जो प्रतिदिन तब तक अन्न देता जब तक द्रौपदी स्वयं भोजन न कर ले (वन-पर्व धारा — अतिथि-संकट की दुर्वासा-कथा इसी पात्र पर टिकी है)। पात्र का नियम ही उसका दर्शन है: वह परोसने के लिए अक्षय है, संग्रह के लिए नहीं — और परोसने वाली के भोजन पर उसकी सीमा टिकी है: अन्न-व्यवस्था की धुरी वह स्त्री है जो सबको खिलाकर अंत में खाती है; महाभारत ने भारतीय रसोई की इस चिर-वास्तविकता को दिव्य-पात्र की कथा में अमर कर दिया। आधुनिक भारत में यह पात्र फिर से चल पड़ा है — मध्याह्न-भोजन रसोइयों से लेकर मंदिर-गुरुद्वारों के अखंड लंगर-भंडारे तक ("अक्षय पात्र" नाम की विशाल अन्न-सेवाएँ भी इसी कथा से नाम लेती हैं): जहाँ-जहाँ बड़ी देग चढ़ी है और पंगत बैठी है, वहाँ-वहाँ अन्नपूर्णा का पात्र घूम रहा है — देवी की मूर्ति के बिना भी उन्हीं की पूजा।

ज्ञान-वैराग्य की भिक्षा — स्तोत्र का शिखर-वाक्य

अन्नपूर्णा-दर्शन का समापन उस स्तोत्र से हो, जिसे परंपरा आदि शंकराचार्य से जोड़ती है (शंकर-परंपरा — ग्रेड B; रचयिता-प्रश्न चिह्नित) — अन्नपूर्णा-स्तोत्र, जिसकी टेक-पंक्ति भारतीय प्रार्थना-साहित्य की सबसे प्रसिद्ध भिक्षा-याचना है: "अन्नपूर्णे सदापूर्णे शङ्करप्राणवल्लभे । ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति ॥" — हे सदा-पूर्णा अन्नपूर्णा, शंकर की प्राण-वल्लभा पार्वती! मुझे भिक्षा दो — ज्ञान और वैराग्य की सिद्धि के लिए। इस याचना की चतुराई देखिए: संन्यासी-कवि अन्न की देवी से अन्न नहीं माँग रहा — ज्ञान-वैराग्य माँग रहा है; पर माँग रहा है भिक्षा रूप में — अन्न की भाषा में। अर्थ दो-स्तरीय है: पहला — असली क्षुधा आत्मा की है, और उसकी अन्नपूर्णा भी यही माँ है: जो देह को अन्न देती है, वही चित्त को ज्ञान; दूसरा — ज्ञान भी भिक्षा है: अर्जित नहीं, दिया हुआ — जैसे शिव पात्र लेकर खड़े हुए, वैसे हर साधक को ज्ञान-द्वार पर पात्र लेकर ही खड़ा होना है — भरा हुआ पात्र (अहंकार) वहाँ कुछ नहीं पाता। स्तोत्र आगे माता-पिता का वह युग्म-वाक्य देता है जो हर भारतीय कण्ठ में बसा है: "माता च पार्वती देवी पिता देवो महेश्वरः" — और यही अन्नपूर्णा-क्षेत्र का अंतिम चित्र है: काशी एक घर है — पिता विश्वनाथ, माता अन्नपूर्णा; मुक्ति पिता के हाथ, रोटी माँ के हाथ — और घर वही पूरा है जहाँ दोनों हों। ॥ जय माँ अन्नपूर्णा ॥

स्रोत टिप्पणी: "अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्" — तैत्तिरीय 3.2 (भृगुवल्ली — ग्रेड A शब्दशः); "अन्नं न निन्द्यात् / बहु कुर्वीत" — तैत्तिरीय 3.7-3.9 व्रत-सूत्र (ग्रेड A); पंचकोश-क्रम — तैत्तिरीय 2 (ग्रेड A); भिक्षा-कथा मुख्य-रेखा — D006-कथा-2 पूर्व-प्रकाशित (अनुपूरक-विभाजन नियम); काशी-मुक्ति वचन "काश्यां मरणान्मुक्तिः" — काशी-खंड/स्मृति-धारा (ग्रेड A/B); स्वर्ण-दर्शन/ख़ज़ाना-वितरण — वाराणसी मंदिर जीवित परंपरा (ग्रेड B); अन्नकूट-गोवर्धन — D014/D039 पूर्व-प्रकाशित मुख्य-रेखा का अन्न-पक्ष; "अन्नदानं परं दानम्" — स्मृति-सुभाषित धारा (ग्रेड B); अन्नपूर्णा-स्तोत्र "अन्नपूर्णे सदापूर्णे..." एवं "माता च पार्वती..." — शंकर-परंपरा (ग्रेड B — रचयिता-प्रश्न शोध-विमर्शित, चिह्नित; उद्धृत अंश प्रचलित पाठ)। अन्न-अर्थशास्त्र/रसोई-संस्कार खंड — जीवित लोकाचार + व्याख्या-स्तर।

नाम एवं अर्थ

Names
अन्नपूर्णा
अन्न से पूर्णा — जिसका पात्र परोसने से कभी रीता नहीं।
सदापूर्णा
स्तोत्र-पद — नित्य-भरा भंडार: अक्षय-दान का नाम।
काशी-राज्ञी / अन्नपूर्णेश्वरी
विश्वनाथ-नगरी की महारानी — क्षेत्र-अधिष्ठात्री पद।
भवानी-भिक्षादात्री
भिक्षु-शिव को अन्न देने वाली — लीला-चित्र नाम।
शाकम्भरी-सहोदरा भाव
पोषण-मुख देवियों का वर्ग-नाता (D009-धारा) — भाव-नाम।

मंत्र एवं स्तोत्र

Mantras

नाम-मंत्र

ॐ श्री अन्नपूर्णायै नमः ॥

अन्नपूर्णा-स्तोत्र — टेक-श्लोक (शंकर-परंपरा, ग्रेड B)

अन्नपूर्णे सदापूर्णे शङ्करप्राणवल्लभे ।
ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति ॥

अर्थ: हे सदा-पूर्ण अन्नपूर्णा, शंकर की प्राण-प्रिया पार्वती! ज्ञान और वैराग्य की सिद्धि के लिए मुझे भिक्षा दो।

अन्न-ब्रह्म श्रुति-सूत्र (तैत्तिरीय 3.2)

अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात् ॥

पूर्ण अन्नपूर्णा-स्तोत्र (12 श्लोक-धारा) एवं अन्नपूर्णा-सहस्रनाम शब्दशः-सत्यापन सहित भावी मंत्र-सूचकांक विस्तार में।

पर्व एवं विधान

Festivals
अन्नकूट
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा — अन्न-पर्वत महाभोग; गोवर्धन-युग्म पर्व।
स्वर्ण-अन्नपूर्णा दर्शन, काशी
धनतेरस-दीपावली काल — ख़ज़ाना (सिक्का-धान) प्रसाद वितरण।
अन्नपूर्णा-जयंती
मार्गशीर्ष पूर्णिमा-धारा — रसोई-चूल्हा पूजन की गृह-विधि।
अक्षय-तृतीया अन्नदान
अक्षय-फल तिथि पर अन्न-दान की विशेष महिमा — "परं दानम्" परंपरा।

मंदिर एवं क्षेत्र

Temples
अन्नपूर्णा मंदिर, वाराणसी
विश्वनाथ-धाम पार्श्व — क्षेत्र-अधिष्ठात्री पीठ; अखंड अन्नक्षेत्र।
अन्नपूर्णेश्वरी, होरनाडु (कर्नाटक)
मलनाड की प्रसिद्ध पीठ — प्रत्येक यात्री को भोजन-प्रसाद अनिवार्य परंपरा।
अन्नपूर्णा-हिमशिखर (नेपाल)
देवी-नाम का 8091मी हिमालय-शृंग — अन्न-दात्री का पर्वत-स्मारक (नाम-भूगोल)।
मंदिर-अन्नक्षेत्र परंपरा सर्वत्र
स्वर्ण-मंदिर लंगर से तिरुपति-भोग तक — अन्नपूर्णा-तत्त्व का अखिल-भारतीय जाल।

बच्चों के लिए ज्ञान

For Children

सरल परिचय: अन्नपूर्णा माता खाने-अन्न की देवी हैं — पार्वती जी का ही रूप! उनके एक हाथ में अन्न से भरा पात्र और दूसरे में कलछी है। कथा कहती है कि एक बार स्वयं शिव जी उनसे भिक्षा माँगने आए थे — तभी से वे काशी में सबका पेट भरती हैं।

रोचक तथ्य:

  • दीपावली के अगले दिन "अन्नकूट" पर मंदिरों में पकवानों का पहाड़ सजता है!
  • काशी में विश्वनाथ जी के मंदिर के पास ही माँ अन्नपूर्णा का मंदिर है।
  • नेपाल का एक विशाल हिमालयी पर्वत भी "अन्नपूर्णा" कहलाता है!
  • उपनिषद् कहते हैं — "अन्न ही ब्रह्म है": खाना भगवान का रूप है।

सीख: थाली में खाना कभी मत छोड़ो और अन्न का अनादर मत करो — हर रोटी में माँ अन्नपूर्णा का आशीर्वाद है। और हो सके तो भूखे को खिलाओ — यही सबसे बड़ा दान है।

मिनी क्विज़:

  1. अन्नपूर्णा माँ के हाथों में क्या है?
  2. उनसे भिक्षा माँगने कौन आए थे?
  3. अन्नकूट किस दिन मनता है?
  4. उपनिषद् अन्न को क्या कहते हैं?