काशी की रसोई — अन्न-ब्रह्म का जीवित शास्त्र
जहाँ वैराग्य ने भूख को प्रणाम किया
कथा-स्मृति से आरम्भ कीजिए (विस्तार D006 पर): जब अन्न-तत्त्व जगत् से लुप्त हुआ, तो योगियों की समाधियाँ टूट गईं, वेदपाठियों के कण्ठ सूख गए — और अंततः स्वयं वह महादेव, जो श्मशान-भस्म रमाकर अन्न-निरपेक्ष वैराग्य के आदि-प्रतीक हैं, पात्र लेकर उस द्वार आए जहाँ देवी रसोई सजाए बैठी थीं। यह दृश्य भारतीय दर्शन का सबसे विनम्र क्षण है: वैराग्य ने भूख को प्रणाम किया। जो सिद्धांत यहाँ स्थापित हुआ, तैत्तिरीय उपनिषद् उसे सूत्र-भाषा में पहले ही कह चुका था — "अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्" (3.2): (भृगु ने तप करके) जाना कि अन्न ब्रह्म है — क्योंकि अन्न से ही प्राणी जन्मते, जीते और अन्न में ही लौट जाते हैं; और उसी परंपरा का व्रत-वाक्य: "अन्नं न निन्द्यात्" — अन्न की निंदा न करे, "अन्नं बहु कुर्वीत" — अन्न बहुत करे (उपजाए-बाँटे)। अन्नपूर्णा इसी उपनिषद्-सूत्र की मूर्ति हैं: अन्न कोई "निम्न" भौतिक वस्तु नहीं जिससे अध्यात्म ऊपर उठ जाए — अन्न वह पहला ब्रह्म है जिसकी उपेक्षा करने वाला अध्यात्म झूठा है। देह अन्नमय कोश है (तैत्तिरीय का पंचकोश-क्रम) — और सीढ़ी का पहला डंडा तोड़कर कोई छत पर नहीं पहुँचता।
काशी — मोक्ष-नगरी की अन्न-व्यवस्था
अब क्षेत्र-दर्शन: देवी ने वास के लिए काशी क्यों चुनी? काशी-खंड की परंपरा इसका उत्तर नगर-रचना से देती है। काशी मोक्ष-नगरी है — "काश्यां मरणान्मुक्तिः" की भूमि; यहाँ जीवन का अंतिम सत्य (मृत्यु-मुक्ति) विश्वनाथ सँभालते हैं। पर परंपरा जानती थी कि मोक्ष की नगरी को भी रसोई चाहिए — भूखे पेट कोई मुक्ति-चिंतन नहीं होता; इसीलिए विश्वनाथ-धाम के ठीक पार्श्व में अन्नपूर्णा-मंदिर है, और लोक-वाणी कहती है: बाबा विश्वनाथ मुक्ति देते हैं, माँ अन्नपूर्णा भुक्ति — काशी में मोक्ष भी माँ की रसोई से होकर जाता है। परंपरा-वचन यह भी कि काशी में मरणासन्न जीव को स्वयं शिव तारक-मंत्र देते हैं — पर वह भी तभी सम्भव है जब जीव यहाँ तक जीवित पहुँचे: वह जीवन-यात्रा माँ के अन्न से चलती है। मंदिर-परंपरा इस दर्शन को विधि में जीती है: अन्नपूर्णा-मंदिर का अन्नक्षेत्र (भंडारा) शताब्दियों से अखंड है; और वर्ष में एक बार — धनतेरस से दीपावली-काल में — मंदिर का स्वर्ण-अन्नपूर्णा दर्शन खुलता है, जब देवी की स्वर्णमयी प्रतिमा के साथ ख़ज़ाने का सिक्का-धान प्रसाद रूप में बँटता है — लोक उसे घर की तिजोरी-रसोई में रखता है: अर्थ पारदर्शी — माँ का दिया बीज-धान घर के अन्न-वैभव का संकल्प है।
अन्नकूट — अन्न का पर्वत, कृतज्ञता का शिखर
अन्नपूर्णा-संस्कृति का महापर्व अन्नकूट है — कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा (दीपावली के अगले दिन): "अन्न का कूट" — पर्वत। इस दिन मंदिरों में — काशी-अन्नपूर्णा से वृंदावन-नाथद्वारा तक — सैकड़ों-हज़ारों पकवानों का अन्न-पर्वत सजाया जाता है: छप्पन-भोग से लेकर कहीं-कहीं सहस्र-व्यंजन तक। पर्व की जड़ में गोवर्धन-कथा है (D014-मुख्य: इन्द्र-मद-भंग, D039) — कृष्ण ने ब्रज से कहा था कि पूजा उस पर्वत की करो जिसकी घास-जल से तुम्हारे गोधन जीते हैं; अन्नकूट उसी का पाक-रूप है: वर्ष-भर जिस अन्न ने पाला, एक दिन उसका पर्वत रचकर उसे देवता मानकर पूजना। ध्यान दीजिए यह पर्व फसल-चक्र की संधि पर है — खरीफ़ कट रही है, नया धान घर आया है: अन्नकूट किसान-संस्कृति का धन्यवाद-पर्व है, और उसका शास्त्र-सम्मत नियम यह कि पर्वत अंततः बँट जाए — प्रसाद रूप में सहस्रों तक: संग्रह का उत्सव नहीं, वितरण का। यही अन्नपूर्णा-अर्थशास्त्र है, जिसे भारतीय रसोई-संस्कार सूक्ष्म नियमों में जीता आया है: थाली में अन्न छोड़ना अन्न-देवी का अनादर; पहली रोटी गाय की, अंतिम कुत्ते की (वैश्वदेव-बलि परंपरा); अतिथि को बिना खिलाए न जाने देना; और अन्न-दान को दानों में सर्वोपरि कहना — "अन्नदानं परं दानम्" की स्मृति-धारा: क्योंकि अन्य हर दान में पात्र बचा रह सकता है, भूखे को खिलाया अन्न उसी क्षण प्राण बन जाता है।
अक्षय-पात्र — जो परोसने से नहीं घटता
अन्नपूर्णा-तत्त्व का महाभारत-मुख भी स्मरणीय है — अक्षय-पात्र: वनवास-काल में द्रौपदी को सूर्यदेव (D043) से मिला वह पात्र, जो प्रतिदिन तब तक अन्न देता जब तक द्रौपदी स्वयं भोजन न कर ले (वन-पर्व धारा — अतिथि-संकट की दुर्वासा-कथा इसी पात्र पर टिकी है)। पात्र का नियम ही उसका दर्शन है: वह परोसने के लिए अक्षय है, संग्रह के लिए नहीं — और परोसने वाली के भोजन पर उसकी सीमा टिकी है: अन्न-व्यवस्था की धुरी वह स्त्री है जो सबको खिलाकर अंत में खाती है; महाभारत ने भारतीय रसोई की इस चिर-वास्तविकता को दिव्य-पात्र की कथा में अमर कर दिया। आधुनिक भारत में यह पात्र फिर से चल पड़ा है — मध्याह्न-भोजन रसोइयों से लेकर मंदिर-गुरुद्वारों के अखंड लंगर-भंडारे तक ("अक्षय पात्र" नाम की विशाल अन्न-सेवाएँ भी इसी कथा से नाम लेती हैं): जहाँ-जहाँ बड़ी देग चढ़ी है और पंगत बैठी है, वहाँ-वहाँ अन्नपूर्णा का पात्र घूम रहा है — देवी की मूर्ति के बिना भी उन्हीं की पूजा।
ज्ञान-वैराग्य की भिक्षा — स्तोत्र का शिखर-वाक्य
अन्नपूर्णा-दर्शन का समापन उस स्तोत्र से हो, जिसे परंपरा आदि शंकराचार्य से जोड़ती है (शंकर-परंपरा — ग्रेड B; रचयिता-प्रश्न चिह्नित) — अन्नपूर्णा-स्तोत्र, जिसकी टेक-पंक्ति भारतीय प्रार्थना-साहित्य की सबसे प्रसिद्ध भिक्षा-याचना है: "अन्नपूर्णे सदापूर्णे शङ्करप्राणवल्लभे । ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति ॥" — हे सदा-पूर्णा अन्नपूर्णा, शंकर की प्राण-वल्लभा पार्वती! मुझे भिक्षा दो — ज्ञान और वैराग्य की सिद्धि के लिए। इस याचना की चतुराई देखिए: संन्यासी-कवि अन्न की देवी से अन्न नहीं माँग रहा — ज्ञान-वैराग्य माँग रहा है; पर माँग रहा है भिक्षा रूप में — अन्न की भाषा में। अर्थ दो-स्तरीय है: पहला — असली क्षुधा आत्मा की है, और उसकी अन्नपूर्णा भी यही माँ है: जो देह को अन्न देती है, वही चित्त को ज्ञान; दूसरा — ज्ञान भी भिक्षा है: अर्जित नहीं, दिया हुआ — जैसे शिव पात्र लेकर खड़े हुए, वैसे हर साधक को ज्ञान-द्वार पर पात्र लेकर ही खड़ा होना है — भरा हुआ पात्र (अहंकार) वहाँ कुछ नहीं पाता। स्तोत्र आगे माता-पिता का वह युग्म-वाक्य देता है जो हर भारतीय कण्ठ में बसा है: "माता च पार्वती देवी पिता देवो महेश्वरः" — और यही अन्नपूर्णा-क्षेत्र का अंतिम चित्र है: काशी एक घर है — पिता विश्वनाथ, माता अन्नपूर्णा; मुक्ति पिता के हाथ, रोटी माँ के हाथ — और घर वही पूरा है जहाँ दोनों हों। ॥ जय माँ अन्नपूर्णा ॥