जूठन की देवी — शुद्धता के पार का शुद्धतम
प्राकट्य — शिव-पार्वती की जूठन से
मातंगी की प्राकट्य-कथा तंत्र-साहित्य की सबसे घरेलू — और सबसे विध्वंसक — कथा है (तंत्र-निबंध धारा — ग्रेड B): एक दिन शिव-पार्वती (D003/D006) भोजन कर रहे थे। खाते-खाते कुछ अन्न-कण नीचे गिरे — जूठन। उन गिरे हुए उच्छिष्ट कणों से एक कन्या प्रकट हुई — मरकत-आभा, अनुपम तेज — और उसने विनयपूर्वक उन्हीं कणों को ग्रहण किया। शिव ने प्रसन्न होकर वर दिया: तुम उच्छिष्ट-मातंगी होगी — जो साधक उच्छिष्ट-भाव से तुम्हें पूजेगा, उसे वाक्-सिद्धि और सर्व-कला-सिद्धि मिलेगी। कथा को सतह पर पढ़ें तो विचित्र लगेगी; उसकी विध्वंसक गहराई तब खुलती है जब भारतीय शुद्धि-शास्त्र का संदर्भ सामने रखा जाए। जूठन उस व्यवस्था में अशुद्धतम वस्तु है — और "जूठन खाने वाला" होना सामाजिक पदानुक्रम की अंतिम सीढ़ी का अपमान-चिह्न बनाया गया। ठीक वहीं तंत्र ने महाविद्या बिठा दी: देवी जो जूठन से जन्मी, जूठन स्वीकारती है, और जूठे मुख से किया जप जिसे अर्पित हो सकता है — एकमात्र देवता जिसकी विधि में वह वर्जना ही नहीं। यह कथा शुद्धि-अहंकार पर तंत्र का सीधा प्रहार है: जो सत्ता जूठन में भी प्रकट हो सकती है, उसके लिए "अशुद्ध" क्या बचा? और जो मनुष्य किसी को "अशुद्ध" कहकर द्वार से हटाता है, वह किस देवता के नाम पर हटाता है?
चांडालिनी — बहिष्कारों का देवी-स्तर उत्तर
मातंगी का दूसरा नाम इस दर्शन को समाज के सबसे दुखते बिंदु तक ले जाता है — चांडालिनी: चांडाल-कन्या रूपा; मतंग-धारा भी यहीं जुड़ती है — "मातंगी" अर्थात् मतंग की (मतंग-जाति प्राचीन साहित्य में अंत्यज-वर्ग नाम भी है, और मतंग-मुनि ऋषि-नाम भी: दोनों धाराएँ परंपरा में गुँथी हैं — चिह्नित)। स्मरण कीजिए रामकथा का मतंग-वन (D013-मंडल): वही आश्रम जहाँ शबरी ने राम को जूठे बेर खिलाए — और राम ने प्रेम से खाए; भक्ति-इतिहास की वह अमर घटना मातंगी-तत्त्व का ही रामायण-मुख है: उच्छिष्ट जब प्रेम से सना हो, तो देवता के लिए वही महाप्रसाद है। तंत्र-परंपरा ने इसी सत्य को विधि-रूप दिया: मातंगी-उपासना में उच्छिष्ट-भाव — सांकेतिक रूप में विधि यह मानती है कि साधक "शुद्ध होकर" नहीं, जैसा है वैसा — अपने समस्त अपूर्ण, जूठे, अस्वीकृत आत्म-सहित — देवी के सम्मुख आए (विधि-विवरण दीक्षा-क्षेत्र; यहाँ भाव-पाठ मात्र)। सामाजिक स्तर पर यह जितना क्रांतिकारी था, उतना ही आवश्यक: जिस समाज ने मनुष्यों को छुआछूत की सीढ़ियों पर बाँटा, उसी के भीतर एक साधना-धारा ने घोषित किया कि देवी स्वयं चांडालिनी है — अब बहिष्कार किसका करोगे? इस कोश की दृष्टि में मातंगी उन देवी-प्रमाणों की शिरोमणि हैं जो कहते हैं: छुआछूत धर्म नहीं — धर्म का विलोम है; यह वही नीति-रेखा है जो शीतला (D092) के चबूतरे और धूमावती (D076) के वैधव्य-नोट से चलती आई है — मातंगी उसका महाविद्या-शिखर हैं।
मंत्रिणी — वही देवी, राज-सिंहासन पर
अब विरोधाभास का दूसरा छोर: यही "जूठन की देवी" श्रीविद्या-साम्राज्य की महामात्या हैं। ललितोपाख्यान (D072) में भंडासुर-युद्ध की सेना-रचना स्मरण कीजिए: महारानी ललिता के दो महासचिव — दंड (सेना) की स्वामिनी वाराही, और मंत्र (नीति-वाणी-रहस्य) की स्वामिनी मंत्रिणी श्यामला — यही मातंगी हैं: राज-श्यामला। युद्ध में उन्होंने मंत्र-मोर्चा सँभाला — कूट, संधि-विग्रह, वाक्-शक्ति; दक्षिण के श्रीविद्या-मंदिरों में आज भी ललिता के पार्श्व में श्यामला-अर्चना जीवित है, और कालिदास-परंपरा का श्यामला-दंडक — "माणिक्य-वीणामुपलालयन्तीं..." से उठता वह छंद-प्रपात — इसी देवी की स्तुति है (रचयिता-परंपरा कालिदास; शोध-प्रश्न चिह्नित — ग्रेड B); लोक-कथा कहती है कि मूक कालिदास को वाणी-कवित्व देवी-कृपा से ही मिला था। दोनों छोर मिलाकर पढ़िए तो मातंगी-रहस्य खुलता है: जो जूठन स्वीकार सकती है, वही मंत्रिणी हो सकती है — क्योंकि राज-नीति का सर्वोच्च गुण यही है कि कोई सूचना, कोई व्यक्ति, कोई संसाधन "अस्पृश्य" कहकर फेंका न जाए; श्रेष्ठ मंत्री वही जो वह भी सुन ले जो दरबार ठुकरा देता है। और कला का भी यही स्वभाव है — संगीत की महानतम कृतियाँ लोक की "जूठन" (लोक-धुनों, उपेक्षित रागों, अशिष्ट कही गई बोलियों) से रस लेकर बनीं; मातंगी कला-देवी इसीलिए हैं कि कला शुद्धता-सीमाओं की नहीं — समग्र-स्वीकार की संतान है।
शुक और मद — कला-साधना का मनोविज्ञान
मातंगी-ध्यान के दो सूक्ष्म चिह्न कला-साधकों के लिए अलग पाठ रखते हैं। पहला — शुक (तोता): देवी की सहचरी-पक्षी। शुक भारतीय परंपरा में श्रवण-स्मृति का प्रतीक है — जो सुनता है, धारण करता है, दोहराता है; कथा-परंपरा का महावाचक ही "शुकदेव" हैं। कला की पहली सीढ़ी यही शुक-वृत्ति है — गुरु-मुख से सुनना और सधे हुए अनुकरण से धारण करना: रियाज़ का अनुशासन। पर देवी का दूसरा चिह्न उसके पार ले जाता है — मद-विह्वल नयन: वह रस-अवस्था जहाँ अनुकरण छूट जाता है और कला बहने लगती है; संगीत-शास्त्र जिसे तन्मयता कहता है, भक्ति-शास्त्र भाव-समाधि। दोनों चिह्न मिलकर कला-साधना का पूरा नक्शा हैं: पहले शुक बनो (सीखो, दोहराओ, साधो), तब मद उतरता है (स्वयं का स्वर मिलता है) — जो सीखे बिना "मौलिकता" चाहे वह अराजक है, और जो जीवन-भर अनुकरण में रहे वह पिंजरे का शुक। मातंगी दोनों की देवी हैं — पिंजरा खोलने की तिथि भी वही तय करती हैं।
वाक्-त्रयी की पूर्ति — और मंडल का अगला द्वार
मातंगी के साथ इस कोश की वाक्-त्रयी पूरी होती है, और तीनों का भेद अब सूत्र-रूप में बाँधा जा सकता है: सरस्वती (D008) विद्या की वाणी हैं — जो सीखी जाती है; तारा (D071) संकट की वाणी — जो कौंधती है; मातंगी कला की वाणी — जो रस बनती है। पहली पाठशाला में मिलती है, दूसरी प्रार्थना में, तीसरी रियाज़ और रंगमंच पर। संगीत-साधकों की परंपरा मातंगी को अपनी विशेष देवी मानती आई है — वीणा उनका चिह्न है, और "मद-विह्वल" ध्यान-पद कला के उस उन्माद का है जहाँ कलाकार स्वयं मिट कर माध्यम रह जाता है। साधना-क्रम की दृष्टि से बगलामुखी → मातंगी का अनुक्रम भी अर्थ-गर्भ है: पहले वाणी का स्तम्भन (D077 — कुवाक् रुके), फिर वाणी का राज्याभिषेक (मातंगी — सुवाक् बहे); विराम साधे बिना संगीत नहीं — सम के बिना ताल कहाँ? अब मंडल अपने अंतिम द्वार पर खड़ा है — कमला (D079): चांडालिनी के ठीक बाद कमल-वासिनी श्री; तंत्र का अंतिम व्यंग्य-मधुर वाक्य यह कि जूठन की देवी और वैभव की देवी बहनें हैं — एक ही मंडल की क्रमागत विद्याएँ: जिसने अस्वीकृत को स्वीकारा, लक्ष्मी उसी के द्वार आती हैं। ॥ राज-श्यामला मातंगी की जय ॥