महाविद्या मातंगी

Matangi · राज-श्यामला · उच्छिष्ट-चांडालिनी · मंत्रिणी

नवमी महाविद्या दो विपरीत मुकुट एक साथ पहनती हैं: वे ललिता-साम्राज्य की मंत्रिणी हैं — राज-श्यामला, वीणा-धारिणी, समस्त कलाओं की स्वामिनी; और वे उच्छिष्ट-चांडालिनी भी हैं — जूठन स्वीकारने वाली, बहिष्कृतों के द्वार बैठने वाली। महारानी और अंत्यजा — एक देह में: यही मातंगी-रहस्य है।

पद: दशमहाविद्या-9 · ललिता-मंत्रिणी तत्त्व: परा-वाक् · कला-विद्या वर्ण: मरकत-श्याम (हरित-आभ) विशेष-विधि: उच्छिष्ट-भाव नैवेद्य (चिह्नित)
प्रमुख कथा पढ़ें
मंत्रिणीललिता-साम्राज्य की महामात्या — मंत्र-शक्ति
कला-सरस्वतीसंगीत-काव्य की तांत्रिक वाक्-धारा
उच्छिष्ट-स्वीकाराजूठन तक अस्वीकार नहीं — पूर्ण-स्वीकार
अंत्यज-वत्सलाबहिष्कृतों के पक्ष की महाविद्या

परिचय एवं दिव्य स्वरूप

Introduction

इस कोश में वाक्-देवियों की एक त्रयी अब पूर्ण होती है: श्वेत सरस्वती (D008) — शास्त्र-विद्या की क्रमिक धारा; नील-सरस्वती तारा (D071) — संकट-कौंध की विद्युत-वाणी; और अब मातंगी — मरकत-श्याम (पन्ने-सी हरी आभा की) देवी: परा-वाक् की तांत्रिक स्वामिनी, जिनका क्षेत्र है कला — संगीत, काव्य, नृत्य, वह सब जहाँ वाणी नियम तोड़कर रस बन जाती है। ध्यान-रूप में वे वीणा-धारिणी हैं (सरस्वती-साम्य), शुक-सहचरी, मद-विह्वल नयन — कला के उन्माद की देवी।

श्रीविद्या-मंडल (D072) में उनका राज-पद है — मंत्रिणी: ललिता-साम्राज्य की महामात्या राज-श्यामला, जिन्होंने भंडासुर-युद्ध में मंत्र-शक्ति का मोर्चा सँभाला; दक्षिण के मंदिरों में ललिता के वाम-पार्श्व की श्यामला यही हैं। और इसी महारानी-पद के ठीक सामने उनका दूसरा — क्रांतिकारी — नाम खड़ा है: उच्छिष्ट-चांडालिनी — जूठन की, अंत्यजों की देवी; जिस विधि-विधान में सब देवता शुद्धतम नैवेद्य माँगते हैं, वहाँ एक महाविद्या उच्छिष्ट-भाव से पूजी जाती है (तंत्र-विधि — ग्रेड B; अर्थ-मीमांसा कथा-खंड में)। महारानी और बहिष्कृता — एक ही देवी के दो नाम: इस विरोधाभास को खोलना ही इस पृष्ठ की कथा है।

मंडल एवं संबंध

Mandala
  • मंडल-क्रमबगलामुखी (D077) → मातंगी → कमला (D079)
  • राज-पदललिता (D072) की मंत्रिणी — राज-श्यामला; वाराही (दंडनाथा) की युग्म-सचिवा
  • वाक्-त्रयीसरस्वती (D008) श्वेत · तारा (D071) नील · मातंगी श्याम
  • ऋषि-कुल धारामतंग-मुनि कन्या/शिष्या धाराएँ — शबरी-गुरु मतंग वन सेतु (D013)
  • लोक-सेतुदक्षिण की मीनाक्षी-श्यामला धारा (मरकत-वर्ण साम्य — परंपरा-सम्बन्ध)

प्रमुख कथा

Major Story — न्यूनतम 1,000 शब्दों में
प्रमुख कथा / तंत्र-दर्शन

जूठन की देवी — शुद्धता के पार का शुद्धतम

प्राकट्य — शिव-पार्वती की जूठन से

मातंगी की प्राकट्य-कथा तंत्र-साहित्य की सबसे घरेलू — और सबसे विध्वंसक — कथा है (तंत्र-निबंध धारा — ग्रेड B): एक दिन शिव-पार्वती (D003/D006) भोजन कर रहे थे। खाते-खाते कुछ अन्न-कण नीचे गिरे — जूठन। उन गिरे हुए उच्छिष्ट कणों से एक कन्या प्रकट हुई — मरकत-आभा, अनुपम तेज — और उसने विनयपूर्वक उन्हीं कणों को ग्रहण किया। शिव ने प्रसन्न होकर वर दिया: तुम उच्छिष्ट-मातंगी होगी — जो साधक उच्छिष्ट-भाव से तुम्हें पूजेगा, उसे वाक्-सिद्धि और सर्व-कला-सिद्धि मिलेगी। कथा को सतह पर पढ़ें तो विचित्र लगेगी; उसकी विध्वंसक गहराई तब खुलती है जब भारतीय शुद्धि-शास्त्र का संदर्भ सामने रखा जाए। जूठन उस व्यवस्था में अशुद्धतम वस्तु है — और "जूठन खाने वाला" होना सामाजिक पदानुक्रम की अंतिम सीढ़ी का अपमान-चिह्न बनाया गया। ठीक वहीं तंत्र ने महाविद्या बिठा दी: देवी जो जूठन से जन्मी, जूठन स्वीकारती है, और जूठे मुख से किया जप जिसे अर्पित हो सकता है — एकमात्र देवता जिसकी विधि में वह वर्जना ही नहीं। यह कथा शुद्धि-अहंकार पर तंत्र का सीधा प्रहार है: जो सत्ता जूठन में भी प्रकट हो सकती है, उसके लिए "अशुद्ध" क्या बचा? और जो मनुष्य किसी को "अशुद्ध" कहकर द्वार से हटाता है, वह किस देवता के नाम पर हटाता है?

चांडालिनी — बहिष्कारों का देवी-स्तर उत्तर

मातंगी का दूसरा नाम इस दर्शन को समाज के सबसे दुखते बिंदु तक ले जाता है — चांडालिनी: चांडाल-कन्या रूपा; मतंग-धारा भी यहीं जुड़ती है — "मातंगी" अर्थात् मतंग की (मतंग-जाति प्राचीन साहित्य में अंत्यज-वर्ग नाम भी है, और मतंग-मुनि ऋषि-नाम भी: दोनों धाराएँ परंपरा में गुँथी हैं — चिह्नित)। स्मरण कीजिए रामकथा का मतंग-वन (D013-मंडल): वही आश्रम जहाँ शबरी ने राम को जूठे बेर खिलाए — और राम ने प्रेम से खाए; भक्ति-इतिहास की वह अमर घटना मातंगी-तत्त्व का ही रामायण-मुख है: उच्छिष्ट जब प्रेम से सना हो, तो देवता के लिए वही महाप्रसाद है। तंत्र-परंपरा ने इसी सत्य को विधि-रूप दिया: मातंगी-उपासना में उच्छिष्ट-भाव — सांकेतिक रूप में विधि यह मानती है कि साधक "शुद्ध होकर" नहीं, जैसा है वैसा — अपने समस्त अपूर्ण, जूठे, अस्वीकृत आत्म-सहित — देवी के सम्मुख आए (विधि-विवरण दीक्षा-क्षेत्र; यहाँ भाव-पाठ मात्र)। सामाजिक स्तर पर यह जितना क्रांतिकारी था, उतना ही आवश्यक: जिस समाज ने मनुष्यों को छुआछूत की सीढ़ियों पर बाँटा, उसी के भीतर एक साधना-धारा ने घोषित किया कि देवी स्वयं चांडालिनी है — अब बहिष्कार किसका करोगे? इस कोश की दृष्टि में मातंगी उन देवी-प्रमाणों की शिरोमणि हैं जो कहते हैं: छुआछूत धर्म नहीं — धर्म का विलोम है; यह वही नीति-रेखा है जो शीतला (D092) के चबूतरे और धूमावती (D076) के वैधव्य-नोट से चलती आई है — मातंगी उसका महाविद्या-शिखर हैं।

मंत्रिणी — वही देवी, राज-सिंहासन पर

अब विरोधाभास का दूसरा छोर: यही "जूठन की देवी" श्रीविद्या-साम्राज्य की महामात्या हैं। ललितोपाख्यान (D072) में भंडासुर-युद्ध की सेना-रचना स्मरण कीजिए: महारानी ललिता के दो महासचिव — दंड (सेना) की स्वामिनी वाराही, और मंत्र (नीति-वाणी-रहस्य) की स्वामिनी मंत्रिणी श्यामला — यही मातंगी हैं: राज-श्यामला। युद्ध में उन्होंने मंत्र-मोर्चा सँभाला — कूट, संधि-विग्रह, वाक्-शक्ति; दक्षिण के श्रीविद्या-मंदिरों में आज भी ललिता के पार्श्व में श्यामला-अर्चना जीवित है, और कालिदास-परंपरा का श्यामला-दंडक — "माणिक्य-वीणामुपलालयन्तीं..." से उठता वह छंद-प्रपात — इसी देवी की स्तुति है (रचयिता-परंपरा कालिदास; शोध-प्रश्न चिह्नित — ग्रेड B); लोक-कथा कहती है कि मूक कालिदास को वाणी-कवित्व देवी-कृपा से ही मिला था। दोनों छोर मिलाकर पढ़िए तो मातंगी-रहस्य खुलता है: जो जूठन स्वीकार सकती है, वही मंत्रिणी हो सकती है — क्योंकि राज-नीति का सर्वोच्च गुण यही है कि कोई सूचना, कोई व्यक्ति, कोई संसाधन "अस्पृश्य" कहकर फेंका न जाए; श्रेष्ठ मंत्री वही जो वह भी सुन ले जो दरबार ठुकरा देता है। और कला का भी यही स्वभाव है — संगीत की महानतम कृतियाँ लोक की "जूठन" (लोक-धुनों, उपेक्षित रागों, अशिष्ट कही गई बोलियों) से रस लेकर बनीं; मातंगी कला-देवी इसीलिए हैं कि कला शुद्धता-सीमाओं की नहीं — समग्र-स्वीकार की संतान है।

शुक और मद — कला-साधना का मनोविज्ञान

मातंगी-ध्यान के दो सूक्ष्म चिह्न कला-साधकों के लिए अलग पाठ रखते हैं। पहला — शुक (तोता): देवी की सहचरी-पक्षी। शुक भारतीय परंपरा में श्रवण-स्मृति का प्रतीक है — जो सुनता है, धारण करता है, दोहराता है; कथा-परंपरा का महावाचक ही "शुकदेव" हैं। कला की पहली सीढ़ी यही शुक-वृत्ति है — गुरु-मुख से सुनना और सधे हुए अनुकरण से धारण करना: रियाज़ का अनुशासन। पर देवी का दूसरा चिह्न उसके पार ले जाता है — मद-विह्वल नयन: वह रस-अवस्था जहाँ अनुकरण छूट जाता है और कला बहने लगती है; संगीत-शास्त्र जिसे तन्मयता कहता है, भक्ति-शास्त्र भाव-समाधि। दोनों चिह्न मिलकर कला-साधना का पूरा नक्शा हैं: पहले शुक बनो (सीखो, दोहराओ, साधो), तब मद उतरता है (स्वयं का स्वर मिलता है) — जो सीखे बिना "मौलिकता" चाहे वह अराजक है, और जो जीवन-भर अनुकरण में रहे वह पिंजरे का शुक। मातंगी दोनों की देवी हैं — पिंजरा खोलने की तिथि भी वही तय करती हैं।

वाक्-त्रयी की पूर्ति — और मंडल का अगला द्वार

मातंगी के साथ इस कोश की वाक्-त्रयी पूरी होती है, और तीनों का भेद अब सूत्र-रूप में बाँधा जा सकता है: सरस्वती (D008) विद्या की वाणी हैं — जो सीखी जाती है; तारा (D071) संकट की वाणी — जो कौंधती है; मातंगी कला की वाणी — जो रस बनती है। पहली पाठशाला में मिलती है, दूसरी प्रार्थना में, तीसरी रियाज़ और रंगमंच पर। संगीत-साधकों की परंपरा मातंगी को अपनी विशेष देवी मानती आई है — वीणा उनका चिह्न है, और "मद-विह्वल" ध्यान-पद कला के उस उन्माद का है जहाँ कलाकार स्वयं मिट कर माध्यम रह जाता है। साधना-क्रम की दृष्टि से बगलामुखी → मातंगी का अनुक्रम भी अर्थ-गर्भ है: पहले वाणी का स्तम्भन (D077 — कुवाक् रुके), फिर वाणी का राज्याभिषेक (मातंगी — सुवाक् बहे); विराम साधे बिना संगीत नहीं — सम के बिना ताल कहाँ? अब मंडल अपने अंतिम द्वार पर खड़ा है — कमला (D079): चांडालिनी के ठीक बाद कमल-वासिनी श्री; तंत्र का अंतिम व्यंग्य-मधुर वाक्य यह कि जूठन की देवी और वैभव की देवी बहनें हैं — एक ही मंडल की क्रमागत विद्याएँ: जिसने अस्वीकृत को स्वीकारा, लक्ष्मी उसी के द्वार आती हैं। ॥ राज-श्यामला मातंगी की जय ॥

स्रोत टिप्पणी: उच्छिष्ट-प्राकट्य (शिव-पार्वती भोजन-कण) — तंत्र-निबंध धाराएँ (ग्रेड B; पाठ-भेद: कहीं विष्णु-लक्ष्मी अन्न-दान प्रसंग — चिह्नित); उच्छिष्ट-विधि — तंत्र-परंपरा (ग्रेड B; विधि-विवरण दीक्षा-गम्य, यहाँ भाव-स्तर; "उच्छिष्ट" पद की आचार-मीमांसा परंपरा-भेद सहित); चांडालिनी/मतंग-धारा — तंत्र+रामायण मतंग-वन शबरी-सेतु (D013-पूर्व-प्रकाशित जूठे-बेर प्रसंग); मंत्रिणी राज-श्यामला — ललितोपाख्यान (D072-सूत्र, ग्रेड A/B); श्यामला-दंडक — कालिदास-परंपरा (ग्रेड B — रचयिता शोध-प्रश्न चिह्नित; मूक-कालिदास कथा ग्रेड C लोक); मीनाक्षी-श्यामला सम्बन्ध — दक्षिण-परंपरा (ग्रेड B/C); छुआछूत-खंडन नीति-पंक्ति — कोश की मानव-गरिमा नीति (D076/D092-शृंखला)। कला-दर्शन एवं वाक्-त्रयी सूत्र व्याख्या-स्तर। बीज-साधना अप्रकाशित — मंडल-नीति D070।

नाम एवं अर्थ

Names
मातंगी
मतंग-सम्बद्धा — ऋषि-कन्या/अंत्यज-कुला दोनों धाराएँ (चिह्नित)।
राज-श्यामला
ललिता-मंत्रिणी का राज-नाम — मरकत-श्याम महामात्या।
उच्छिष्ट-चांडालिनी
जूठन-स्वीकारा, अंत्यजा-रूपा — शुद्धि-अहंकार का खंडन-नाम।
मंत्रिणी
मंत्र (नीति-वाणी) की स्वामिनी — भंडासुर-युद्ध की महासचिवा।
तांत्रिक-सरस्वती
वाक्-त्रयी का श्याम-मुख — कला-रस की देवी।

मंत्र एवं स्तुति

Mantras

नाम-स्मरण

ॐ श्री मातंग्यै नमः ॥  ·  ॐ श्री राजश्यामलायै नमः ॥

श्यामला-दंडक — आदि-पद (कालिदास-परंपरा, ग्रेड B)

माणिक्यवीणामुपलालयन्तीं मदालसां मञ्जुलवाग्विलासाम् ।

अर्थ: माणिक्य-वीणा को दुलारती, मद-अलस, मंजुल वाणी-विलास वाली (श्यामला देवी का ध्यान)। — छंद-साहित्य का प्रसिद्ध देवी-दंडक; पूर्ण पाठ भावी सत्यापित-विस्तार में।

मातंगी बीज-साधना एवं उच्छिष्ट-विधि दीक्षा-गम्य — अप्रकाशित (मंडल-नीति D070)।

पर्व एवं उपासना

Festivals
मातंगी-जयंती
वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय-तृतीया संगति) — प्राकट्य-तिथि धारा।
गुप्त-नवरात्र
मंडल-साझा काल — नवम-दिवस धारा (D070-सूत्र)।
वसंत-पंचमी सेतु
वाक्-त्रयी का साझा ऋतु-पर्व (D008/D071) — कला-आरम्भ।
नवरात्र-श्यामला अर्चन
श्रीविद्या-पीठों में मंत्रिणी-पूजा — ललिता-परिकर विधि (D072)।

मंदिर एवं पीठ

Temples
श्यामला-मंदिर धाराएँ (दक्षिण)
श्रीविद्या-क्षेत्रों में ललिता-पार्श्व श्यामला — कांची-मदुरै परिकर।
मीनाक्षी, मदुरै (सम्बन्ध-धारा)
मरकत-वर्णा देवी — श्यामला-भाव की महापीठ (परंपरा-सम्बन्ध चिह्नित)।
कामाख्या-परिसर
नीलाचल मंडल की नवमी (D070-भूगोल)।
श्यामला हिल्स-स्मृति, भोपाल
नगर-स्थल नाम में जीवित श्यामला-धारा — लोक-भूगोल चिह्न।

बच्चों के लिए ज्ञान

For Children

सरल परिचय: मातंगी माँ नौवीं महाविद्या हैं — हरी आभा वाली, वीणा बजाने वाली संगीत और कला की देवी! ये ललिता देवी के राज्य की "मंत्री" भी हैं — सबसे समझदार सलाहकार। और इनकी सबसे ख़ास बात: ये किसी को छोटा या "अछूत" नहीं मानतीं — शबरी के जूठे बेर वाली सीख इन्हीं के वन से आई है!

रोचक तथ्य:

  • संगीत सीखने वाले मातंगी माँ को अपनी ख़ास देवी मानते हैं।
  • तीन वाणी-देवियाँ हुईं — सफ़ेद सरस्वती, नीली तारा, हरी मातंगी!
  • शबरी ने राम जी को जिस मतंग-वन में बेर खिलाए, वह इन्हीं की परंपरा का है।
  • कवि कालिदास की प्रतिभा इन्हीं देवी की कृपा मानी जाती है।

सीख: किसी को छोटा मत समझो — न काम से, न जाति से, न हालत से। मातंगी माँ की नज़र में सब बराबर हैं; प्रेम से दिया जूठा बेर भी प्रसाद है।

मिनी क्विज़:

  1. मातंगी माँ के हाथ में कौन-सा वाद्य है?
  2. वे ललिता देवी के राज्य में क्या हैं?
  3. तीन वाणी-देवियों के नाम बताओ।
  4. शबरी ने राम जी को क्या खिलाया था?