वशिष्ठ की हार-जीत और तारापीठ — तारने वाली की कथा
वशिष्ठ — जब विधि हार गई
तारा-परंपरा की केंद्र-कथा एक ऋषि की पराजय से खुलती है — और पराजित कोई साधारण साधक नहीं: वशिष्ठ, ब्रह्मर्षि, रामकथा के कुल-गुरु। तंत्र-धारा कहती है (तारा-तंत्र/ब्रह्मयामल परंपरा — ग्रेड B): वशिष्ठ ने तारा-साधना का संकल्प लिया और वैदिक विधि-विधान से — यम-नियम, शुद्धि-पवित्रता, हवन-जप — सहस्रों वर्ष तप किया। फल? शून्य। देवी का कोई उत्तर नहीं। क्रुद्ध ऋषि शाप देने को उद्यत हुए — तब आकाशवाणी हुई (धाराओं में स्वयं देवी या ब्रह्मा का निर्देश): "वशिष्ठ! जिस विद्या को तुम साध रहे हो, उसकी रीति तुम्हारे पास नहीं। यह विद्या 'चीन-आचार' से सधती है — जाओ, महाचीन के क्षेत्र में उस बुद्ध-रूपी जनार्दन से सीखो जो इस विद्या के आचार्य हैं।" वशिष्ठ गए — और वहाँ जो देखा उससे वैदिक ऋषि का सिर घूम गया: विधि-निषेधों के पार का उन्मुक्त साधना-लोक। पहले उन्होंने घृणा की; फिर — कथा का निर्णायक क्षण — झुके: आचार्य से दीक्षा ली, अहंकार (मैं ब्रह्मर्षि हूँ, मेरी विधि ही विधि है) का बलिदान किया — और तारा तत्क्षण प्रसन्न हुईं। कथा का दार्शनिक भार तौलिए: यह वैदिक-बनाम-तांत्रिक विवाद का तंत्र-पक्षीय आत्म-कथन है (स्तर स्पष्ट: यह तंत्र-परंपरा की अपनी कथा है, वैदिक संहिताओं की नहीं) — पर इसका सार्वभौम पाठ विवाद से ऊपर है: विद्या पात्रता माँगती है, पद्धति-अभिमान नहीं; जो साधक "मेरी ही रीति सही" पर अड़ा है, वह सहस्र वर्ष तपे तो भी द्वार बंद है — और जो झुककर सीखने को तैयार है, उसके लिए देवी एक क्षण दूर हैं। तारने वाली की पहली शर्त यही है: डूबता हुआ अपनी अकड़ छोड़े, तभी हाथ पकड़ा जा सकता है।
नील-कंठ की सहचरी — नील वर्ण का रहस्य
तारा का नील वर्ण एक और कथा-धारा से जुड़ता है, जो उन्हें समुद्र-मंथन के महाचक्र (D002/D017) में पिरोती है (शाक्त-लोक धारा — ग्रेड B/C, चिह्नित): जब शिव ने हलाहल पिया और विष कंठ में धारण किया (नीलकंठ-प्रसंग, D003), तब विष की दाह से मूर्च्छित शिव को जिस शक्ति ने माता-रूप धरकर सँभाला, वह तारा थीं — धारा कहती है कि उन्होंने शिशु-रूपी शिव को स्तन्य-पान कराया, जिसकी शीतलता ने विष-ताप शांत किया; तारापीठ की मूल प्रतिमा-भावना यही है — शिव को गोद में लिए तारा। नील वर्ण उसी विष-प्रसंग की छाया है — जो देवता के कंठ में नीलिमा बनकर ठहरा, वही करुणा देवी के अंग में नील हो गई। प्रतीक-पाठ गहरा है: तारने वाली वह है जो विष के क्षण में उपस्थित हो — अमृत बँटते समय तो सब साथ थे (D029-मोहिनी प्रसंग); हलाहल के समय जो गोद बनी, वह तारा। इसीलिए परंपरा तारा को "तत्काल-कृपा" की देवी कहती है — उनकी करुणा विद्युत-वेग है, विधि-प्रतीक्षा नहीं करती; डूबते के लिए कल की नाव किस काम की?
तारापीठ — श्मशान जहाँ माँ रहती है
बंगाल के बीरभूम में द्वारका नदी के तट पर तारा का महापीठ है — तारापीठ: शक्तिपीठ-परंपरा में सती के नेत्र-तारा (आँख की पुतली) के पतन की स्थल-मान्यता (पीठ-सूचियों में स्थान-भेद — चिह्नित), और व्यवहार में भारत का सबसे जीवित तंत्र-क्षेत्र। यहीं वशिष्ठ-साधना की स्थल-स्मृति है, और यहीं का महाश्मशान वह विरल स्थान है जहाँ श्मशान-वैराग्य और मातृ-भक्ति एक हो गए हैं। इस पीठ का आधुनिक इतिहास एक नाम से आलोकित है — बामाखेपा (1837-1911; "खेपा" = पागल — माँ का पागल): वह अवधूत जो मंदिर-मर्यादाओं के पार माँ से बालक की तरह लड़ता, रूठता, भोग स्वयं चखकर माँ को खिलाता था; लोक-स्मृति कहती है कि रानी के स्वप्न में देवी ने स्वयं कहा — "पहले मेरे बामा को खिलाओ, तब मैं खाऊँगी" (परंपरा-अभिलेख — ग्रेड B)। बामाखेपा का पाठ तारा-तत्त्व की कुंजी है: तारने वाली को शुद्धता के प्रमाणपत्र नहीं चाहिए — पुकार चाहिए; श्मशान का अवधूत और घर की गृहिणी उसकी दृष्टि में एक हैं, क्योंकि नाविका यह नहीं पूछती कि डूबने वाला किस घाट से गिरा। आज भी तारापीठ में गृहस्थ-यात्री और कापालिक-साधक एक ही पंक्ति में खड़े मिलते हैं — भारतीय धर्म की समावेश-क्षमता का जीवित चित्र।
नील-सरस्वती — वाणी जो बिजली बनकर उतरती है
तारा का नील-सरस्वती मुख अलग टिप्पणी माँगता है, क्योंकि वह भारतीय विद्या-दर्शन का एक सूक्ष्म भेद खोलता है। श्वेत सरस्वती (D008) क्रम की विद्या हैं — अभ्यास, रियाज़, वर्ष-दर-वर्ष सधता स्वर; नील-सरस्वती कौंध की विद्या हैं — वह क्षण जब अटकी वाणी अकस्मात् खुल जाए, जब कवि पर पंक्ति उतर आए, जब शास्त्रार्थ में उत्तर बिजली-सा सूझे। बंगाल-मिथिला-असम की शाक्त कवि-परंपरा इसीलिए तारा-उपासक रही — लोक-स्मृति रामप्रसाद और कमलाकांत जैसे श्यामा-संगीत कवियों की प्रतिभा को देवी-कृपा की कौंध ही कहती है; और परंपरा में हकलाहट, वाक्-भय या सभा-संकोच से पीड़ितों के लिए तारा-स्मरण की विशेष धारा मिलती है — तारने वाली उन्हें भी तारती है जो अपने ही कण्ठ में डूबे हों। साधना-दृष्टि से दोनों सरस्वतियाँ पूरक हैं: नील की कौंध बिना श्वेत के अभ्यास-पात्र के टिकती नहीं — बिजली गिरने के लिए भी खड़ा वृक्ष चाहिए।
दो परंपराओं की एक देवी — बौद्ध-तारा का ईमानदार नोट
तारा-अध्ययन एक तुलनात्मक तथ्य के बिना अधूरा है, और यह कोश उसे छिपाने की जगह दर्ज करता है: तारा बौद्ध वज्रयान परंपरा की भी महादेवी हैं — तिब्बत-नेपाल-मंगोलिया के करोड़ों बौद्धों की करुणा-माता (हरित-तारा, श्वेत-तारा आदि इक्कीस रूप), अवलोकितेश्वर के करुणा-अश्रु से जन्मी मानी जातीं। धर्म-इतिहासकार मानते हैं कि हिंदू-तांत्रिक तारा और बौद्ध तारा की धाराएँ मध्यकालीन पूर्वी भारत (बंगाल-बिहार के पाल-युग) में गहरे संपर्क में विकसित हुईं — "महाचीन-आचार" की वशिष्ठ-कथा स्वयं इस संपर्क की पुराण-स्मृति मानी जाती है (तुलनात्मक धर्म-इतिहास — ग्रेड B; दोनों परंपराएँ अपनी-अपनी दृष्टि में स्वतंत्र और पूर्ण हैं — यह कोश किसी को किसी का "स्रोत" घोषित नहीं करता)। साधक के लिए इसका अर्थ विवाद नहीं, विस्मय होना चाहिए: एक ही तारक-करुणा दो महाधर्मों में बही और दोनों ने उसे माँ कहा — एशिया के आधे भूभाग में, हिमालय के दोनों ओर, संकट में पुकारा जाने वाला नाम एक ही है: तारा। मंडल-यात्रा में उनका स्थान अब स्पष्ट है: काली ने काल का भय काटा (D070) — पर भय कटने के बाद भी भव-सागर तैरना शेष रहता है; तारा वह नौका हैं। अगला द्वार सौंदर्य का है — त्रिपुरसुन्दरी (D072)। ॥ तारा तारयतु सदा ॥