नवमी सिद्धिदात्री

Siddhidatri · नवदुर्गा-9 · अष्टसिद्धि-दायिनी · कमलासना

नौ रातों की यात्रा का अंतिम आसन — सिद्धिदात्री: समस्त सिद्धियों की दात्री। वह देवी जिससे परंपरा कहती है कि स्वयं महादेव ने सिद्धियाँ पाईं; जिसकी सेवा में देव-असुर-यक्ष-गंधर्व सब पंक्तिबद्ध हैं; और जिसके दर्शन के साथ नवदुर्गा-मंडल पूर्ण होकर विजयादशमी का द्वार खुलता है।

क्रम: नवदुर्गा-नवमी (महानवमी) दान: अष्ट-सिद्धियाँ (अणिमा आदि) आसन: विकसित कमल · वाहन: सिंह विशेष: शिव को सिद्धि-दान सूत्र
प्रमुख कथा पढ़ें
सिद्धि-दात्रीअणिमा से वशित्व तक — अष्ट-सिद्धि दान
कमलासनापूर्ण-विकसित कमल — यात्रा की परिणति
सर्व-सेव्यादेव-असुर-सिद्ध-गंधर्व — सबकी उपास्या
मंडल-पूर्तिनौवाँ आसन — जिस पर यात्रा पूरी होती है

परिचय एवं दिव्य स्वरूप

Introduction

सिद्धिदात्री नवदुर्गा-मंडल की नवमी — और समापन — देवी हैं: "नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः" — देवी कवच का क्रम-श्लोक इसी नाम पर पूर्ण होता है। स्वरूप-ध्यान में वे पूर्ण-विकसित कमल पर आसीन (कहीं सिंह-वाहिनी) चतुर्भुजा हैं — शंख, चक्र, गदा, कमल; मुद्रा शांत-प्रसन्न — क्योंकि यह रूप युद्ध का नहीं, फल-वितरण का है: आठ रातों की साधना जिस नौवीं भोर पर पहुँचती है, उसका नाम सिद्धिदात्री है।

उनका दान-क्षेत्र परंपरा स्पष्ट गिनाती है — अष्ट-सिद्धियाँ: अणिमा (सूक्ष्मतम हो जाना), महिमा (विराट), गरिमा (भारी), लघिमा (हल्का), प्राप्ति (सर्वत्र पहुँच), प्राकाम्य (इच्छा-पूर्ति), ईशित्व (नियंत्रण-सामर्थ्य), वशित्व (वशीकरण-सामर्थ्य) — योग-परंपरा की वही सूची जिसे पातंजल विभूति-पाद अपने ढंग से गिनाता और सावधान भी करता है। और उनकी महिमा का शिखर-सूत्र यह परंपरा-वचन है कि स्वयं महादेव ने इन्हीं की आराधना से सिद्धियाँ पाईं — जिस क्षण से अर्धनारीश्वर-दर्शन (D027) का नवदुर्गा-वाचन जुड़ता है। नौवीं रात इसी देवी की है — महानवमी: हवन, कन्या-पूजन की पूर्ति, और विजयादशमी की देहरी।

परिवार एवं संबंध

Family
  • तत्त्व-अभिन्नतापार्वती/महाशक्ति (D006/D009) — फल-दात्री पद
  • सिद्धि-सम्बन्धशिव (D003) — परंपरा-वचन: महादेव की सिद्धियाँ इन्हीं से; अर्धनारीश्वर-सूत्र (D027)
  • पूर्व-क्रममहागौरी (D068) — अष्टमी की शुद्धि जिसकी पूर्व-शर्त
  • मंडलनवदुर्गा D061-D069 — इस पृष्ठ से पूर्ण
  • सेवक-मंडलसिद्ध, गंधर्व, यक्ष, असुर, अमर — ध्यान-श्लोक की सर्व-सेव्या पंक्ति

प्रमुख कथा

Major Story — न्यूनतम 1,000 शब्दों में
प्रमुख कथा / तत्त्व-कथा

नौवीं रात की पूर्ति — जिससे महादेव ने सिद्धियाँ पाईं

सिद्धि क्या है — वरदान या परीक्षा?

सिद्धिदात्री की कथा कहने से पहले उस शब्द को खोलना होगा जो उनके नाम की धुरी है — सिद्धि। "सिध्" धातु का अर्थ है पूर्ण होना, फलित होना; सिद्धि वह बिंदु है जहाँ साधना फल में बदलती है। भारतीय योग-परंपरा ने इस फल के दो चेहरे सदा साथ-साथ रखे — आकर्षक भी, ख़तरनाक भी। अष्ट-सिद्धियों की सूची सुनने में वरदान-कथा लगती है: अणु-सा सूक्ष्म हो जाना, पर्वत-सा विराट, वायु-सा हल्का; जहाँ चाहो पहुँचना, जो चाहो पाना, जिसे चाहो अनुशासित करना। पर स्वयं पातंजल योग-सूत्र — सिद्धि-शास्त्र का सबसे व्यवस्थित ग्रंथ — विभूति-पाद में इन शक्तियों को गिनाकर वह वाक्य कहता है जो इस पूरे पृष्ठ की कुंजी है: "ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः" (3.37) — ये सिद्धियाँ बहिर्मुख चित्त के लिए उपलब्धियाँ हैं, पर समाधि के लिए विघ्न। अर्थात् शक्तियाँ मार्ग का फल हैं, मंज़िल नहीं — जो इन्हें मंज़िल मान बैठा, उसकी यात्रा वहीं रुक गई। अब समझ में आता है कि नवदुर्गा-विधान ने सिद्धि-दान को नौवीं रात क्यों रखा — पहली नहीं। आठ रातों की सीढ़ियाँ याद कीजिए: संकल्प (D061), तप (D062), निर्भयता (D063), सृजन (D064), सेवा-वात्सल्य (D065), भक्ति-शौर्य (D066), तम-विजय (D067), शुद्धि (D068) — और तब सिद्धि। परंपरा का गणित स्पष्ट है: शक्ति उसी को सौंपी जाती है जो आठ परीक्षाएँ पार कर चुका हो; बिना शुद्धि (अष्टमी) के सिद्धि (नवमी) वरदान नहीं — दुर्घटना है। भस्मासुर-प्रसंग (D029) इस कोश में पहले ही खड़ा है — बिना पात्रता की सिद्धि का वह चिर-उदाहरण, जिसने वर पाते ही वरदाता पर हाथ उठाया।

परंपरा-वचन — महादेव की सिद्धियाँ

सिद्धिदात्री-महिमा का शिखर वह परंपरा-वचन है जो नवदुर्गा व्रत-साहित्य पीढ़ियों से दोहराता है (स्तर: व्रत-परंपरा — ग्रेड B; भाव-सूत्र देवी-भागवत के शक्ति-प्राथम्य दर्शन से संगत): सृष्टि के आदि-काल में स्वयं महादेव ने इसी देवी की आराधना से अष्ट-सिद्धियाँ प्राप्त कीं — और देवी की कृपा से ही उनका आधा अंग देवी-रूप हुआ: अर्धनारीश्वर (D027)। इस वचन का दार्शनिक भार तौलिए। शिव योगेश्वर हैं — योग जिनसे निकला, सिद्धियाँ जिनके स्वभाव में हैं; उनके विषय में यह कहना कि सिद्धियाँ उन्होंने शक्ति से पाईं — शाक्त-दर्शन की केंद्रीय घोषणा है: चेतना (शिव) कितनी भी परम हो, क्रिया-सामर्थ्य शक्ति से आता है — "शिव भी शक्ति-हीन होकर स्पन्दन नहीं कर सकते" (सौन्दर्यलहरी की प्रसिद्ध आदि-ध्वनि: "शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुम्" — शंकर-परंपरा, ग्रेड B)। और अर्धनारीश्वर-सूत्र इस दान की परिणति है — सिद्धि पाकर शिव ने दात्री को आधा अंग दे दिया: लेने वाले ने देने वाली को स्वयं में स्थान दिया — कृतज्ञता का इससे ऊँचा रूप देव-दर्शन में नहीं। यह वचन साधक के लिए दोहरा पाठ है: पहला — शक्ति-स्रोत का सम्मान (जिससे पाया, उसे अपना अंग बनाओ — उपकरण मत समझो); दूसरा — सिद्धि का शुद्धतम उपयोग वही है जो शिव ने किया: उसे सम्बन्ध में बदल देना, संग्रह में नहीं। देव-असुर-यक्ष-गंधर्व सबकी सेव्या होने का ध्यान-पद भी यहीं अर्थ पाता है — सिद्धि की भूख पक्ष नहीं देखती, सब पंक्ति में हैं; पर दात्री देती उसी को है जिसकी पात्रता आठ रातों ने गढ़ी हो।

महानवमी — हवन, कन्या और पूर्णाहुति

नवमी तिथि नवरात्र-विधान की फल-तिथि है — महानवमी। इस दिन की तीन प्रधान विधियाँ तीनों सिद्धिदात्री-तत्त्व की भाषा हैं। पहली — हवन/पूर्णाहुति: नौ रातों के जप-पाठ की समाप्ति अग्नि-मुख में आहुति से होती है; दुर्गा-सप्तशती के पाठ की पूर्णाहुति, नवाक्षरी-हवन — साधना जो भीतर जली, उसकी साक्षी बाहर की अग्नि (D040-सूत्र) बनती है; "पूर्णाहुति" शब्द स्वयं उपदेश है — अधूरी साधना की आहुति नहीं होती। दूसरी — कन्या-पूजन की पूर्ति: अष्टमी-नवमी की कुमारी-पूजा (D068-विधि) नवमी पर शिखर पाती है — नौ कन्याएँ, नौ रूप, और नौवीं कन्या सिद्धिदात्री-स्वरूपा; जिस घर ने नौ दिन देवी को घट में पूजा, वह अंतिम दिन उसे जीवित रूप में भोजन कराता है — मूर्त से जीवंत तक की यह यात्रा ही व्रत का फल है। तीसरी — आयुध/शस्त्र-पूजा और सरस्वती-पूजन की दक्षिण-परंपरा: नवमी को अपने जीवन-उपकरणों (शस्त्र, ग्रंथ, यंत्र, वाद्य, बही, आज के वाहन-कम्प्यूटर तक) की पूजा — आयुध-पूजा; अर्थ पारदर्शी है: सिद्धि अमूर्त नहीं रहती — वह उपकरणों से होकर संसार में उतरती है, इसलिए फल-तिथि पर उपकरण पूज्य हैं: जो हाथ के औज़ार का आदर करता है, सिद्धि उसी हाथ में टिकती है। और नवमी की संध्या ढलते ही विजयादशमी है — रावण-दहन, शमी-पूजन, सीमोल्लंघन: नवदुर्गा-यात्रा का अंतिम पाठ यही संधि है — पूर्णता विश्राम नहीं, विजय-प्रस्थान है; नौ रातें भीतर की थीं, दसवाँ दिन बाहर का है — साधा हुआ साधक अब संसार के रावण से लड़ने निकलता है (राम का अकाल-बोधन सूत्र — D009/D013)।

आध्यात्मिक अर्थ — देने वाली का नाम

समापन-देवी का नाम एक क्रिया पर टिका है — दात्री: देने वाली। नवदुर्गा-मंडल के आठ नाम देवी के अपने स्वरूप कहते हैं (पर्वत की बेटी, तप-चारिणी, घंटा-धारिणी...); नौवाँ नाम उनके हाथ की मुद्रा कहता है — जो अंत में बचता है, वह दान है। यह क्रम-शिल्प साधना-जीवन का अंतिम सूत्र है: यात्रा की परिणति संग्रह नहीं — वितरण है; जो नौ रातें चढ़कर शिखर पर पहुँचा, उसकी पहचान अब यह नहीं कि उसके पास क्या है — यह है कि वह क्या देता है। विद्या पाकर पढ़ाने वाला, धन पाकर बाँटने वाला, बल पाकर रक्षा करने वाला — हर क्षेत्र का सिद्ध अंततः दात्री-पद पर ही सिद्ध कहलाता है; और जो शिखर पर पहुँचकर भी केवल लेता रहे, उसने नौवीं देवी का दर्शन नहीं पाया — आठ ही रातें जी। दूसरा पाठ — सिद्धि-विनय: पातंजल-चेतावनी और भस्मासुर-स्मृति इस पृष्ठ पर साथ खड़ी हैं; इस कोश की स्थायी नीति यहाँ भी दोहरा दें — "सिद्धि" के नाम पर चमत्कार-व्यापार (गारंटीड वशीकरण, तांत्रिक-समाधान विज्ञापन) शास्त्र नहीं, शोषण है: शास्त्र की सिद्धि आठ रातों की पात्रता माँगती है और नौवीं रात विनय। और अंतिम — मंडल-दृष्टि: शैलपुत्री से सिद्धिदात्री तक की माला अब पूर्ण है; प्रतिपदा का वह मिट्टी-कलश याद कीजिए (D061) — नौ दिन में उसके जौ ज्वारे बन चुके हैं: विसर्जन के दिन वही अंकुर देवी-प्रसाद रूप में बँटते हैं — मिट्टी में बोया संकल्प हरा होकर हाथों-हाथ बँट गया। यही नवदुर्गा है — और यही सिद्धि। ॥ नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः ॥ — मंडल पूर्ण ॥

स्रोत टिप्पणी: क्रम-श्लोक — देवी कवच "नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः" (ग्रेड A/B); ध्यान-श्लोक "सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैः..." — प्रचलित पूजा-पाठ (ग्रेड B — सप्तशती-मूल में नहीं, चिह्नित); अष्ट-सिद्धि सूची — योग/पुराण-सामान्य (ग्रेड A/B; क्रम-भेद धाराओं में); "ते समाधावुपसर्गाः..." — पातंजल योग-सूत्र 3.37 (ग्रेड A — शब्दशः); शिव-सिद्धि एवं अर्धनारीश्वर-सूत्र — नवदुर्गा व्रत-परंपरा वचन (ग्रेड B — स्पष्ट चिह्नित; देवी-भागवत शक्ति-प्राथम्य से संगत); "शिवः शक्त्या युक्तो..." — सौन्दर्यलहरी 1 शंकर-परंपरा (ग्रेड B — आदि-पंक्ति); महानवमी हवन/आयुध-पूजा/कन्या-पूर्ति — पूजा-विधान परंपरा (ग्रेड B); भस्मासुर-सूत्र D029-पूर्व-प्रकाशित। चमत्कार-व्यापार नीति-नोट संपादकीय स्वर। नवदुर्गा-शृंखला D061-D069 इस पृष्ठ से पूर्ण — शृंखला-समीक्षा व्याख्या-स्तर।

नाम एवं अर्थ

Names
सिद्धिदात्री
सिद्धि + दात्री — समस्त सिद्धियाँ देने वाली; मंडल की फल-देवी।
सिद्धिदा / सिद्धिदायिनी
ध्यान-श्लोक के युग्म-पद — दान-क्रिया के नाम।
कमलासना
विकसित कमल पर आसीन — परिणति-आसन।
सर्व-सेव्या
देव-असुर-यक्ष-गंधर्व सबकी उपास्या — पक्ष-निरपेक्ष दात्री।
नवदुर्गा-नवमी
क्रम-पूर्ति पद — "नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः" का समापन-नाम।

मंत्र एवं पाठ

Mantras

नाम मंत्र

ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः ॥

ध्यान-श्लोक (नवदुर्गा पूजा-परंपरा — ग्रेड B)

सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि ।
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी ॥

अर्थ: सिद्ध, गंधर्व, यक्ष आदि से, असुरों से और अमरों (देवों) से भी सदा सेवित होने वाली सिद्धिदा — सिद्धि देने वाली देवी — (मुझ पर प्रसन्न) हों।

देवी कवच — पूर्ति-पद

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः ॥

महानवमी हवन-विधि मंत्र एवं नवाक्षरी-क्रम शब्दशः सत्यापन के साथ भावी मंत्र-सूचकांक विस्तार में — यहाँ नियम-अनुसार असत्यापित पूर्ण-पाठ नहीं छापे गए।

पर्व एवं व्रत

Festivals
महानवमी
नवरात्र की फल-तिथि — सिद्धिदात्री-पूजन; सप्तशती-पूर्णाहुति हवन।
कन्या-पूजन पूर्ति
नवमी-कंजक — नौ कन्याएँ नौ रूप; व्रत-पारण विधियाँ।
आयुध-पूजा (दक्षिण)
शस्त्र-ग्रंथ-यंत्र पूजन — सिद्धि के उपकरण-सम्मान की जीवित विधि।
विजयादशमी-संधि
नवमी-संध्या से दशहरा-प्रस्थान — पूर्णता से विजय का द्वार।

मंदिर एवं तीर्थ

Temples
सिद्धिदात्री मंदिर, वाराणसी
सिद्धमाता गली (गोलघर क्षेत्र-परंपरा) — काशी नवदुर्गा-यात्रा का नवम-दिवस मंदिर।
नवदुर्गा-यात्रा पूर्ति
काशी की नौ-मंदिर परिक्रमा इसी दर्शन पर पूर्ण — जीवित नगर-विधान।
नवदुर्गा-मंडप सर्वत्र
नवमी-हवन एवं विसर्जन-पूर्व महाआरती का पंडाल-जाल।

बच्चों के लिए ज्ञान

For Children

सरल परिचय: नवरात्रि के आख़िरी — नौवें — दिन की देवी हैं सिद्धिदात्री: सारी सिद्धियाँ (ख़ास शक्तियाँ) देने वाली! कहते हैं, ख़ुद शिव जी ने भी अपनी शक्तियाँ इन्हीं देवी से पाई थीं। ये कमल के फूल पर बैठती हैं और इनके दिन हवन होता है, कन्याओं को भोजन कराया जाता है — और अगले ही दिन आता है दशहरा!

रोचक तथ्य:

  • आठ सिद्धियाँ होती हैं — जैसे अणिमा (चींटी से भी छोटा बनना) और महिमा (पहाड़ से भी बड़ा)!
  • पहले दिन बोए गए जौ नौवें दिन तक हरे-भरे ज्वारे बन जाते हैं — यही साधना का सबूत है।
  • दक्षिण भारत में इस दिन किताबों और औज़ारों की पूजा होती है — आयुध-पूजा।
  • नौ देवियों के नाम याद रखने का मंत्र: "प्रथमं शैलपुत्री च..." — देवी कवच में है!

सीख: शक्ति मिलने पर सबसे अच्छा काम क्या है? — बाँटना! देवी का नाम ही "दात्री" है — देने वाली। जो सीखा है, दूसरों को सिखाओ — तभी सीखना पूरा होता है।

मिनी क्विज़:

  1. सिद्धिदात्री किस दिन पूजी जाती हैं?
  2. कितनी सिद्धियाँ मानी जाती हैं?
  3. किन्होंने इस देवी से सिद्धियाँ पाईं?
  4. नवमी के अगले दिन कौन-सा पर्व है?