नौवीं रात की पूर्ति — जिससे महादेव ने सिद्धियाँ पाईं
सिद्धि क्या है — वरदान या परीक्षा?
सिद्धिदात्री की कथा कहने से पहले उस शब्द को खोलना होगा जो उनके नाम की धुरी है — सिद्धि। "सिध्" धातु का अर्थ है पूर्ण होना, फलित होना; सिद्धि वह बिंदु है जहाँ साधना फल में बदलती है। भारतीय योग-परंपरा ने इस फल के दो चेहरे सदा साथ-साथ रखे — आकर्षक भी, ख़तरनाक भी। अष्ट-सिद्धियों की सूची सुनने में वरदान-कथा लगती है: अणु-सा सूक्ष्म हो जाना, पर्वत-सा विराट, वायु-सा हल्का; जहाँ चाहो पहुँचना, जो चाहो पाना, जिसे चाहो अनुशासित करना। पर स्वयं पातंजल योग-सूत्र — सिद्धि-शास्त्र का सबसे व्यवस्थित ग्रंथ — विभूति-पाद में इन शक्तियों को गिनाकर वह वाक्य कहता है जो इस पूरे पृष्ठ की कुंजी है: "ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः" (3.37) — ये सिद्धियाँ बहिर्मुख चित्त के लिए उपलब्धियाँ हैं, पर समाधि के लिए विघ्न। अर्थात् शक्तियाँ मार्ग का फल हैं, मंज़िल नहीं — जो इन्हें मंज़िल मान बैठा, उसकी यात्रा वहीं रुक गई। अब समझ में आता है कि नवदुर्गा-विधान ने सिद्धि-दान को नौवीं रात क्यों रखा — पहली नहीं। आठ रातों की सीढ़ियाँ याद कीजिए: संकल्प (D061), तप (D062), निर्भयता (D063), सृजन (D064), सेवा-वात्सल्य (D065), भक्ति-शौर्य (D066), तम-विजय (D067), शुद्धि (D068) — और तब सिद्धि। परंपरा का गणित स्पष्ट है: शक्ति उसी को सौंपी जाती है जो आठ परीक्षाएँ पार कर चुका हो; बिना शुद्धि (अष्टमी) के सिद्धि (नवमी) वरदान नहीं — दुर्घटना है। भस्मासुर-प्रसंग (D029) इस कोश में पहले ही खड़ा है — बिना पात्रता की सिद्धि का वह चिर-उदाहरण, जिसने वर पाते ही वरदाता पर हाथ उठाया।
परंपरा-वचन — महादेव की सिद्धियाँ
सिद्धिदात्री-महिमा का शिखर वह परंपरा-वचन है जो नवदुर्गा व्रत-साहित्य पीढ़ियों से दोहराता है (स्तर: व्रत-परंपरा — ग्रेड B; भाव-सूत्र देवी-भागवत के शक्ति-प्राथम्य दर्शन से संगत): सृष्टि के आदि-काल में स्वयं महादेव ने इसी देवी की आराधना से अष्ट-सिद्धियाँ प्राप्त कीं — और देवी की कृपा से ही उनका आधा अंग देवी-रूप हुआ: अर्धनारीश्वर (D027)। इस वचन का दार्शनिक भार तौलिए। शिव योगेश्वर हैं — योग जिनसे निकला, सिद्धियाँ जिनके स्वभाव में हैं; उनके विषय में यह कहना कि सिद्धियाँ उन्होंने शक्ति से पाईं — शाक्त-दर्शन की केंद्रीय घोषणा है: चेतना (शिव) कितनी भी परम हो, क्रिया-सामर्थ्य शक्ति से आता है — "शिव भी शक्ति-हीन होकर स्पन्दन नहीं कर सकते" (सौन्दर्यलहरी की प्रसिद्ध आदि-ध्वनि: "शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुम्" — शंकर-परंपरा, ग्रेड B)। और अर्धनारीश्वर-सूत्र इस दान की परिणति है — सिद्धि पाकर शिव ने दात्री को आधा अंग दे दिया: लेने वाले ने देने वाली को स्वयं में स्थान दिया — कृतज्ञता का इससे ऊँचा रूप देव-दर्शन में नहीं। यह वचन साधक के लिए दोहरा पाठ है: पहला — शक्ति-स्रोत का सम्मान (जिससे पाया, उसे अपना अंग बनाओ — उपकरण मत समझो); दूसरा — सिद्धि का शुद्धतम उपयोग वही है जो शिव ने किया: उसे सम्बन्ध में बदल देना, संग्रह में नहीं। देव-असुर-यक्ष-गंधर्व सबकी सेव्या होने का ध्यान-पद भी यहीं अर्थ पाता है — सिद्धि की भूख पक्ष नहीं देखती, सब पंक्ति में हैं; पर दात्री देती उसी को है जिसकी पात्रता आठ रातों ने गढ़ी हो।
महानवमी — हवन, कन्या और पूर्णाहुति
नवमी तिथि नवरात्र-विधान की फल-तिथि है — महानवमी। इस दिन की तीन प्रधान विधियाँ तीनों सिद्धिदात्री-तत्त्व की भाषा हैं। पहली — हवन/पूर्णाहुति: नौ रातों के जप-पाठ की समाप्ति अग्नि-मुख में आहुति से होती है; दुर्गा-सप्तशती के पाठ की पूर्णाहुति, नवाक्षरी-हवन — साधना जो भीतर जली, उसकी साक्षी बाहर की अग्नि (D040-सूत्र) बनती है; "पूर्णाहुति" शब्द स्वयं उपदेश है — अधूरी साधना की आहुति नहीं होती। दूसरी — कन्या-पूजन की पूर्ति: अष्टमी-नवमी की कुमारी-पूजा (D068-विधि) नवमी पर शिखर पाती है — नौ कन्याएँ, नौ रूप, और नौवीं कन्या सिद्धिदात्री-स्वरूपा; जिस घर ने नौ दिन देवी को घट में पूजा, वह अंतिम दिन उसे जीवित रूप में भोजन कराता है — मूर्त से जीवंत तक की यह यात्रा ही व्रत का फल है। तीसरी — आयुध/शस्त्र-पूजा और सरस्वती-पूजन की दक्षिण-परंपरा: नवमी को अपने जीवन-उपकरणों (शस्त्र, ग्रंथ, यंत्र, वाद्य, बही, आज के वाहन-कम्प्यूटर तक) की पूजा — आयुध-पूजा; अर्थ पारदर्शी है: सिद्धि अमूर्त नहीं रहती — वह उपकरणों से होकर संसार में उतरती है, इसलिए फल-तिथि पर उपकरण पूज्य हैं: जो हाथ के औज़ार का आदर करता है, सिद्धि उसी हाथ में टिकती है। और नवमी की संध्या ढलते ही विजयादशमी है — रावण-दहन, शमी-पूजन, सीमोल्लंघन: नवदुर्गा-यात्रा का अंतिम पाठ यही संधि है — पूर्णता विश्राम नहीं, विजय-प्रस्थान है; नौ रातें भीतर की थीं, दसवाँ दिन बाहर का है — साधा हुआ साधक अब संसार के रावण से लड़ने निकलता है (राम का अकाल-बोधन सूत्र — D009/D013)।
आध्यात्मिक अर्थ — देने वाली का नाम
समापन-देवी का नाम एक क्रिया पर टिका है — दात्री: देने वाली। नवदुर्गा-मंडल के आठ नाम देवी के अपने स्वरूप कहते हैं (पर्वत की बेटी, तप-चारिणी, घंटा-धारिणी...); नौवाँ नाम उनके हाथ की मुद्रा कहता है — जो अंत में बचता है, वह दान है। यह क्रम-शिल्प साधना-जीवन का अंतिम सूत्र है: यात्रा की परिणति संग्रह नहीं — वितरण है; जो नौ रातें चढ़कर शिखर पर पहुँचा, उसकी पहचान अब यह नहीं कि उसके पास क्या है — यह है कि वह क्या देता है। विद्या पाकर पढ़ाने वाला, धन पाकर बाँटने वाला, बल पाकर रक्षा करने वाला — हर क्षेत्र का सिद्ध अंततः दात्री-पद पर ही सिद्ध कहलाता है; और जो शिखर पर पहुँचकर भी केवल लेता रहे, उसने नौवीं देवी का दर्शन नहीं पाया — आठ ही रातें जी। दूसरा पाठ — सिद्धि-विनय: पातंजल-चेतावनी और भस्मासुर-स्मृति इस पृष्ठ पर साथ खड़ी हैं; इस कोश की स्थायी नीति यहाँ भी दोहरा दें — "सिद्धि" के नाम पर चमत्कार-व्यापार (गारंटीड वशीकरण, तांत्रिक-समाधान विज्ञापन) शास्त्र नहीं, शोषण है: शास्त्र की सिद्धि आठ रातों की पात्रता माँगती है और नौवीं रात विनय। और अंतिम — मंडल-दृष्टि: शैलपुत्री से सिद्धिदात्री तक की माला अब पूर्ण है; प्रतिपदा का वह मिट्टी-कलश याद कीजिए (D061) — नौ दिन में उसके जौ ज्वारे बन चुके हैं: विसर्जन के दिन वही अंकुर देवी-प्रसाद रूप में बँटते हैं — मिट्टी में बोया संकल्प हरा होकर हाथों-हाथ बँट गया। यही नवदुर्गा है — और यही सिद्धि। ॥ नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः ॥ — मंडल पूर्ण ॥