श्याम जल की सखी — भोजन का वचन और बाँसुरी का तट
प्रकाश के घर की श्याम बेटी
यमुना की जन्म-कथा वही संज्ञा-प्रकरण है जो सूर्य-पृष्ठ (D043) पर पूर्ण रूप में कहा गया — यहाँ उसका पुत्री-कोण। विवस्वान् का तेज संज्ञा के लिए असह्य हुआ, यह कथा का प्रसिद्ध मोड़ है; पर उससे पहले के वर्षों में संज्ञा-सूर्य के तीन संतानें जन्मी थीं — वैवस्वत मनु, यम, और यमी। यम-यमी युग्म थे — संस्कृत में "यम" शब्द का एक अर्थ ही जुड़वाँ है; भाई मृत्यु-लोक के अधिपति बने, बहन जल-धारा बनकर पृथ्वी पर बही — एक ही घर से मृत्यु और जीवन-रस, दोनों निकले। ऋग्वेद (10.10) का यम-यमी संवाद-सूक्त इस युग्म का वैदिक स्तर है — वहाँ यमी सृष्टि-विस्तार के तर्क से यम के आगे प्रणय-प्रस्ताव रखती हैं और यम मर्यादा-रेखा से अस्वीकारते हैं: "सहोदर का सम्बन्ध पाप है" — संहिता-युग का यह मर्यादा-पाठ पौराणिक भाई-बहन वात्सल्य की आधार-शिला बना; स्तर-भेद स्पष्ट रहे — वैदिक संवाद दार्शनिक-नैतिक काव्य है, पुराण-कथा पारिवारिक रस — दोनों की दिशा एक: भाई-बहन का सम्बन्ध काम से नहीं, धर्म-स्नेह से बँधा है। पृथ्वी पर उतरकर यमी "यमुना" हुईं — कालिंद-पर्वत (यमुनोत्री-क्षेत्र की बंदरपूँछ श्रेणी) से उतरने पर "कालिंदी"। श्याम-वर्ण की व्याख्याएँ परंपरा में कई हैं — कालिंद की छाया, शिव-विरह की तपन (एक धारा में यमुना ने शिव-वियोग-तप से देह श्याम की), और सबसे प्रिय व्रज-वाचन: कृष्ण-रंग में रँगा जल — नदी जो प्रेम में अपने प्रियतम का वर्ण ओढ़ ले।
यम-द्वितीया — वह भोजन जिससे पर्व जन्मा
अब वह कथा जो इस पृष्ठ की धुरी है — और जिसका अधिकार गंगा-मंडल में किसी और का नहीं: भाई-दूज का जन्म। पुराण-धाराएँ (स्कंद, पद्म, भविष्य) कहती हैं — यम और यमुना का स्नेह अटूट था, पर धर्मराज का कार्य-भार ऐसा कि बहन के बार-बार निमंत्रण पर भी भाई आ न पाते। कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन यमुना ने विशेष आग्रह भेजा — और उस दिन मृत्यु के देवता ने अवकाश लिया। यम बहन के घर आए; यमुना ने स्वयं रसोई रची, तिलक किया, आरती उतारी, प्रेम से भोजन कराया। तृप्त यम ने वर माँगने कहा — और यमुना ने जो माँगा, वह भारतीय पर्व-इतिहास की सबसे सुंदर माँगों में है: अपने लिए कुछ नहीं; माँगा — "आज के दिन जो भाई अपनी बहन के घर भोजन करे, बहन के हाथ का तिलक ले — उसे अकाल-मृत्यु का भय न हो; और जो बहन-भाई इस दिन मेरे जल में साथ स्नान करें, उन पर आपकी दंड-दृष्टि कोमल रहे।" यम ने "तथास्तु" कहा — और उस दिन से कार्तिक शुक्ल द्वितीया "यम-द्वितीया" है: भाई-दूज, भाऊ-बीज, भाई-टीका — नाम अनेक, मूल एक। मथुरा का विश्राम घाट आज भी इस कथा का जीवित रंगमंच है — यम-द्वितीया पर वहाँ भाई-बहन हाथ पकड़कर यमुना-स्नान करते हैं। ध्यान दीजिए इस पर्व के शिल्प पर — रक्षाबंधन में बहन रक्षा माँगती है; भाई-दूज में बहन रक्षा देती है: तिलक, भोजन और वचन — तीनों बहन के हाथ में हैं, और स्वयं मृत्यु उसके आतिथ्य के आगे विनम्र है। नदी-देवी के घर मृत्यु-देव का भोजन — भारतीय कल्पना ने भाई-बहन के स्नेह को इससे ऊँचा आसन कहीं नहीं दिया।
व्रज की धमनी — बाँसुरी, कालिय और कालिंदी-विवाह
द्वापर में यमुना का दूसरा महाध्याय खुला — वे कृष्ण-लीला की जल-रंगभूमि बनीं। वसुदेव नवजात कृष्ण (D014) को लेकर जिस रात गोकुल चले, उफनती यमुना ने चरण-स्पर्श पाते ही मार्ग दिया — कृष्ण-कथा में यमुना का प्रवेश ही प्रणाम से होता है। फिर तो व्रज का समूचा रस उन्हीं के तट पर घटा — गो-चारण, माखन-टोलियाँ, वेणु-नाद जिसे सुनकर धारा ठिठक जाती (परंपरा-वचन), महारास की चाँदनी (D011 राधा-क्षेत्र), और वह कालिय-प्रकरण जिसका मुख्य-पाठ कृष्ण-पृष्ठ का है — यहाँ यमुना-कोण भर: विषधर कालिय ने जिस दह को गरल से मृत्यु-कुंड बना दिया था, वह यमुना की देह पर विष-घाव था; कृष्ण ने फणों पर नृत्य कर सर्प को रमणक भेजा और धारा को विष-मुक्त किया — भक्त-दृष्टि में यह प्रथम "नदी-शोधन" है: भगवान ने स्वयं अपनी प्रिया-धारा का प्रदूषण हरा (इस पृष्ठ के पर्यावरण-पाठ का पुराण-बीज)। और भागवत (10.58) कालिंदी को कृष्ण-जीवन में पत्नी-पद तक ले जाता है — इंद्रप्रस्थ-वास के दिनों यमुना-तट पर तपस्यारत सूर्य-कन्या कालिंदी ने अर्जुन के पूछने पर कहा: "पति रूप में विष्णु (कृष्ण) को पाने का व्रत है मेरा"; कृष्ण ने विधि-पूर्वक वरण किया — अष्टभार्या-मंडल में कालिंदी चतुर्थ-क्रम पर हैं। नदी जो सखी थी, पत्नी हुई — पुष्टिमार्ग ने इसी रस को शास्त्र दिया: वल्लभाचार्य का यमुनाष्टक ("नमामि यमुनामहं सकलसिद्धिहेतुं मुदा...") श्री यमुनाजी को ठाकुरजी की चतुर्थ पीठ-शक्ति कहता है — गंगा ज्ञान-मोक्ष की धारा हैं, यमुना भाव-प्रेम की; मोक्ष माँगने वाला गंगा जाए, कृष्ण माँगने वाला यमुना आए — सम्प्रदाय-वाणी का यह रस-भेद भारतीय भक्ति-भूगोल का सार-सूत्र है।
आध्यात्मिक अर्थ — बहन, सखी, माता
यमुना-तत्त्व तीन सम्बन्धों में खुलता है। पहला — बहन: यम-द्वितीया की देवी सिखाती है कि स्नेह का वचन मृत्यु-भय से बड़ा है; जिस संस्कृति में बहन का तिलक धर्मराज तक को कोमल कर दे, वहाँ भाई-बहन का सम्बन्ध सामाजिक नहीं — आधिदैविक संस्था है। दूसरा — सखी: व्रज-भक्ति ने भगवान से सम्बन्ध के जो भाव गिनाए (दास्य, सख्य, वात्सल्य, माधुर्य), यमुना उनमें सख्य-माधुर्य की जल-मूर्ति हैं — वह धारा जो लीला की साक्षी भी है, सहभागिनी भी; भक्त जब यमुना-जल माथे लगाता है, वह तीर्थ नहीं छूता — कृष्ण की स्मृति छूता है। तीसरा — माता: व्रज आज भी "यमुना मैया" कहता है, छठ-व्रती उनके घाटों पर अर्घ्य देते हैं, और यही माता-पद इस पृष्ठ का अंतिम — सबसे चुभता — पाठ लाता है: दिल्ली-मथुरा की आधुनिक यमुना विश्व की सर्वाधिक प्रदूषित नदी-धाराओं में गिनी जाती है; जिस जल को कृष्ण ने कालिय-विष से मुक्त किया था, उसे यह युग फिर विषाक्त कर रहा है। कथा ने मार्ग भी दिखा दिया है — विष हरना भक्ति का कर्म है, केवल सरकार का नहीं; यमुना-आरती उतारने वाले हाथ यमुना-शोधन के भी हों, तो ही आरती पूरी है। श्याम जल की सखी अपने हर उपासक से आज एक ही वर माँग रही हैं — वही जो उन्होंने यम से माँगा था: जीवन का वचन।