मृत्यु ने जिसे विद्या दी — नचिकेता के तीन वर
क्रोध से निकला प्रश्न — "मुझे किसे दोगे?"
कथा का आरम्भ एक अधूरे यज्ञ से होता है। वाजश्रवा (औद्दालकि-धारा) ने "सर्वस्व-दान" का विश्वजित् यज्ञ ठाना — पर दान में जो गौएँ दी जा रही थीं, वे जर्जर थीं: दूध दे चुकीं, घास चबा चुकीं, जिनका दान पुण्य नहीं, दिखावा था। यज्ञ-मंडप में बैठा किशोर पुत्र नचिकेता यह देखता रहा — और उसके भीतर वह प्रश्न उठा जो उपनिषद के अनुसार श्रद्धा का प्रवेश था: ऐसे दान से पिता को कौन-से लोक मिलेंगे? बालक ने पिता से पूछा — "पिताजी, मैं भी तो आपकी संपत्ति हूँ; मुझे किसे दोगे?" एक बार, दो बार, तीसरी बार — और खीझे हुए पिता के मुख से निकल गया: "मृत्युवे त्वा ददामि — जा, तुझे मृत्यु को देता हूँ!" शब्द लौट नहीं सकता था। पर नचिकेता का उत्तर देखिए — न रोया, न क्षमा माँगी; उसने कहा: बहुतों में मैं प्रथम चलता हूँ, बहुतों में मध्यम — यम का ऐसा क्या काम है जो मुझसे सधेगा? पीढ़ियाँ जैसे बोईं, वैसे काटती हैं; मर्त्य पकता है और फिर जन्मता है — चलो, देख आऊँ। सत्य-वचन की रक्षा को पिता ने भेजा; किशोर यम-लोक पहुँचा — और द्वार पर तीन दिन-रात भूखा-प्यासा बैठा रहा, क्योंकि यम घर पर नहीं थे। लौटे तो परिजनों ने चेताया — ब्राह्मण अतिथि अग्नि-रूप होता है; तीन रात जो द्वार पर उपवासा बैठा रहा, उसका ऋण चुकाओ। धर्मराज ने — मृत्यु ने — किशोर से क्षमा माँगी, और तीन रातों के बदले तीन वर देने का वचन दिया। यह दृश्य ही कथा की पहली शिक्षा है: धर्म का अधिपति भी अतिथि-धर्म चूकने पर क्षमा माँगता है — नियम सबसे ऊपर है, नियामक से भी।
तीन वर — और वह प्रलोभन-परीक्षा जो हार गई
पहला वर नचिकेता ने पिता के लिए माँगा — मेरे पिता का क्रोध शांत हो; लौटूँ तो वे मुझे पहचानें, अपनाएँ, चैन से सोएँ। (जिस पिता ने मृत्यु को सौंप दिया, उसके लिए पहला वर — किशोर का हृदय देखिए।) दूसरे वर में उसने स्वर्ग-साधक अग्नि-विद्या पूछी — यम ने विस्तार से सिखाई, ईंट-संख्या और विधि-क्रम तक; और प्रसन्न होकर घोषित किया कि यह अग्नि अब "नाचिकेत-अग्नि" कहलाएगी — विद्यार्थी के नाम पर विद्या का नामकरण, गुरु-परंपरा का दुर्लभतम सम्मान। फिर तीसरा वर आया — और उपनिषद का इतिहास बदल गया। नचिकेता ने पूछा: "मनुष्य के मरने पर 'यह रहता है' — कुछ कहते हैं; 'नहीं रहता' — कुछ कहते हैं। सत्य क्या है? यह मुझे आप से — स्वयं मृत्यु से — जानना है।" यम ठिठक गए। बोले — यह प्रश्न देवताओं तक के लिए सूक्ष्म है; कुछ और माँग लो: सौ वर्ष के पुत्र-पौत्र, हाथी-घोड़े-स्वर्ण, पृथ्वी का राज्य, जितनी आयु चाहो, जो भोग मर्त्य-लोक में दुर्लभ हों — वे रमणियाँ, वे वाद्य, वे रथ — सब लो, पर मरण-रहस्य मत पूछो। और किशोर का उत्तर भारतीय वाङ्मय के शिखर-वाक्यों में है: ये सब कल तक की चीज़ें हैं (श्वोभावाः); इंद्रियों का तेज घिस जाता है, जीवन — छोटा हो या लंबा — बीत ही जाता है; रथ और गीत आपके पास ही रहें। जिस धन से तृप्ति कभी नहीं होती, वह लेकर क्या करूँगा — जब आपको देख ही लिया है? वर वही — जो पूछा है। यम की प्रलोभन-परीक्षा हार गई — और हारकर प्रसन्न हुई: ऐसा अधिकारी शिष्य मिले तो मृत्यु भी पढ़ाने बैठ जाती है।
श्रेय और प्रेय — मृत्यु का पाठ्यक्रम
अब कठोपनिषद का वह ज्ञान-खंड खुलता है जिसे भारतीय परंपरा ब्रह्मविद्या के प्रवेश-द्वारों में गिनती है। यम पहला भेद सिखाते हैं — श्रेय (कल्याणकर) और प्रेय (प्रियकर) मनुष्य के सामने साथ-साथ आते हैं; धीर उन्हें अलग-अलग परखकर श्रेय चुनता है, मंद योग-क्षेम के लोभ में प्रेय। नचिकेता ने प्रेय (भोग-वर) ठुकराकर श्रेय (विद्या) चुना — इसीलिए पात्र हुआ। फिर वह वाक्य आता है जो विवेकानंद के द्वारा युग-मंत्र बना — "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान् निबोधत": उठो, जागो, श्रेष्ठों के पास जाकर जानो; क्योंकि यह मार्ग छुरे की धार-सा तीखा और दुर्गम है। आत्मा का स्वरूप-उपदेश शिखर पर पहुँचता है — न जायते म्रियते वा विपश्चित्… — यह आत्मा न जन्मता है, न मरता; न यह मारता है, न मारा जाता (वही मंत्र-मेरुदंड जो गीता 2.19-20 में गूँजा); शरीर रथ है, बुद्धि सारथी, मन लगाम, इंद्रियाँ घोड़े — और रथी है आत्मा: रथ-रूपक की यह शिक्षा विश्व-दर्शन में भारत का अमर योगदान है। अणु से सूक्ष्म, महत् से महान वह आत्मा हृदय-गुहा में बैठा है — उसे जानकर धीर शोक के पार चला जाता है। मृत्यु से मृत्यु का रहस्य पूछा गया था; उत्तर मिला — जो तू है, वह मरता ही नहीं। नचिकेता विद्या पाकर लौटा — ब्रह्म-प्राप्त, मृत्यु-भय-मुक्त; और यम इस कथा में सदा के लिए वह बन गए जो लोक-चित्र कभी नहीं दिखाता: त्रिलोक का सबसे प्रामाणिक आचार्य — जिसकी कक्षा में प्रवेश की फ़ीस भोग का त्याग है।
सावित्री-प्रकरण और स्तर-रेखाएँ — धर्म से धर्मराज हारे
यम-चरित्र की दूसरी अमर कथा महाभारत (वन पर्व) का सावित्री-उपाख्यान है — यहाँ संक्षेप-रेखा में, क्योंकि उसका पूर्ण अधिकार भावी सावित्री-प्रविष्टि का है। सत्यवान का प्राण-हरण करके लौटते यम के पीछे-पीछे सावित्री चलती रही; धर्मराज ने लौटने कहा, उसने धर्म-चर्चा शुरू कर दी — सत्पुरुषों की संगति, धर्म की गति, अनुग्रह का स्वभाव। हर सुभाषित पर प्रसन्न यम वर देते गए — श्वशुर की दृष्टि, राज्य, पुत्र... और "सत्यवान के बिना पुत्र कैसे?" — वचन-बद्ध धर्मराज को प्राण लौटाने पड़े। ध्यान रहे — सावित्री ने बल से नहीं, छल से नहीं, धर्म-ज्ञान से मृत्यु को जीता; यम हारकर भी धर्मराज ही सिद्ध हुए, क्योंकि वे अपने वचन से बँधे। मार्कण्डेय-प्रसंग (शिव-हस्तक्षेप वाला — D003) और अजामिल-प्रसंग (नाम-महिमा वाला — भागवत-धारा) यम-सीमाओं की कथाएँ हैं — वहाँ यम शिव-विष्णु के आगे नतमस्तक हैं: पुराण-दृष्टि में मृत्यु भी परम-सत्ता के अधीन एक नियुक्ति है, निरंकुश शक्ति नहीं। स्तर-रेखा अंत में फिर खींच दें — ऋग्वैदिक यम (पथ-निर्माता प्रथम मर्त्य; यमी-संवाद 10.10 जिसमें यम धर्म-मर्यादा के लिए सहोदरा का प्रणय-प्रस्ताव अस्वीकारते हैं), औपनिषदिक यम (ब्रह्मविद्या-गुरु), और पौराणिक यमराज (दंड-पाश-चित्रगुप्त-न्यायालय) — तीन युगों के तीन चित्र हैं; तीनों प्रामाणिक, तीनों इस पृष्ठ पर अपने-अपने लेबल से खड़े हैं। इनका साझा सूत्र एक ही है, और वही इस कथा का समापन-वाक्य है: यम का दंड धर्म की सेवा में है — इसलिए मृत्यु से नहीं, अधर्म से डरना चाहिए।