पाँचवीं दिशा का स्वामी — ईशान क्यों "देव-कोण" है
प्रश्न से आरम्भ — दिशा को देवता क्यों चाहिए
यह पृष्ठ एक कथा से नहीं, एक प्रश्न से खुलता है — क्योंकि ईशान का "चरित्र" घटनाओं में नहीं, व्यवस्था में जीता है। प्रश्न यह: भारतीय परंपरा ने दिशाओं को देवता क्यों दिए? उत्तर वैदिक यज्ञ-भूमि में है। यज्ञ करने वाले को अनंत-विस्तृत जगत् में अपना स्थान "स्थापित" करना होता था — दिशाओं को नमन करके, हर दिशा के अधिपति को साक्षी बनाकर वेदी के चारों ओर एक व्यवस्थित ब्रह्मांड रचा जाता था; दिक्पाल उसी रचना के स्तंभ हैं। आठ दिशाओं के आठ स्वामी नियुक्त हुए — पर एक कोण विशेष निकला: उत्तर और पूर्व का संधि-कोण। पूर्व उदय की दिशा है — इन्द्र (D039) का द्वार; उत्तर स्थिरता और निधियों की — कुबेर (D053) का घर; दोनों की संधि वह बिंदु ठहरी जहाँ उदय और स्थिरता मिलते हैं — जहाँ से हिमालय-शिखरों के पार देव-लोक की कल्पना बसी, जहाँ से गंगा-यमुना (D056/D057) के जल उतरते दिखे। परंपरा ने उस संधि-कोण का स्वामित्व किसी लोकपाल को नहीं सौंपा — परम-तत्त्व को ही वहाँ बिठा दिया: शिव, अपने ईशान-पद पर। "ईशान" शब्द स्वयं "ईश्" धातु से है — शासन करने वाला, स्वामी; ईश्वर का ही ज्येष्ठ-रूप पद। दिशाओं की सभा में आठवाँ आसन इसलिए सबसे ऊँचा है कि वहाँ दिक्पाल नहीं — दिक्पालों का ईश्वर बैठा है।
वैदिक स्तर — "ईशानः सर्वविद्यानाम्" का उद्घोष
ईशान-पद की वैदिक जड़ तैत्तिरीय आरण्यक (महानारायण-उपनिषद धारा) का वह मंत्र है जो आज भी रुद्राभिषेक और शिव-पूजन के पंचब्रह्म-न्यास में गूँजता है — "ईशानः सर्वविद्यानाम् ईश्वरः सर्वभूतानाम् ब्रह्माधिपतिर् ब्रह्मणोऽधिपतिर् ब्रह्मा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम्" — ईशान समस्त विद्याओं का स्वामी है, समस्त भूतों (प्राणियों) का ईश्वर है, ब्रह्म (वेद/विराट्) का अधिपति है — वह ब्रह्म-रूप शिव मेरे लिए सदाशिव हो। ध्यान दीजिए इस मंत्र की पहली घोषणा पर — ईशान का प्रथम परिचय शक्ति नहीं, शासन नहीं — विद्या है। जो दिशा ईशान की है, वह ज्ञान की दिशा है; इसीलिए परंपरा विद्यार्थी को ईशान-मुख अध्ययन की सलाह देती आई, इसीलिए गुरु-पीठ और ग्रंथ-भंडार मंदिरों के ईशान-खंड में रखे गए। शतरुद्रीय (यजुर्वेद रुद्राध्याय) की व्यापक रुद्र-दृष्टि — जो रुद्र को जल, अन्न, वृक्ष, पथ, चोर-साधु सब में देखती है — उसी की परिणति है कि रुद्र का शिखर-नाम "ईशान" समस्त सत्ता के स्वामित्व का पद बन गया। वैदिक स्तर यहीं तक कहता है — ईशान एक परम-पद है; उसे "कोण का देवता" पुराण-वास्तु युग बनाएगा। दोनों स्तर अलग हैं, और दोनों का यहाँ अपना-अपना चिह्न है।
आगम-स्तर — पाँच मुखों की पाँचवीं दिशा: ऊपर
शैव आगमों ने ईशान को उसकी सबसे गहन व्याख्या दी। सदाशिव-दर्शन में परम शिव पाँच कृत्यों (पंचकृत्य) से जगत् चलाते हैं — सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव (आवरण) और अनुग्रह (मोक्ष); और इन पाँच कृत्यों के पाँच मुख हैं — पंचब्रह्म। सद्योजात पश्चिम-मुख है (सृष्टि), वामदेव उत्तर (स्थिति-पालन), अघोर दक्षिण (संहार), तत्पुरुष पूर्व (तिरोभाव) — और ईशान? आगम कहते हैं — ऊर्ध्व: ऊपर की ओर। चार मुख क्षितिज की चार दिशाओं में संसार-चक्र चलाते हैं; पाँचवाँ मुख किसी सांसारिक दिशा में नहीं देखता — वह आकाश देखता है, और उसका कृत्य है अनुग्रह — बंधन से छुड़ा देना। यही कारण है कि पंचमुख-शिव प्रतिमाओं में ईशान-मुख शिखर पर, प्रायः स्फटिक-निर्मल भाव में दिखाया जाता है; यही कारण है कि पंचाक्षर-न्यास में ईशान आकाश-तत्त्व से जुड़ता है — पाँच तत्त्वों में सबसे सूक्ष्म, सर्वव्यापी, निराकार-निकट। अब संगति देखिए — भूमि पर जो कोण "ईशान" कहलाता है, वह वस्तुतः ऊर्ध्व-मुख का पार्थिव प्रक्षेप है: आकाश-तत्त्व का प्रतिनिधि-कोण, अनुग्रह-द्वार की भूमि-छाया। दिक्पाल-सूचियों में जहाँ शेष सात अधिपति अपने-अपने लोक-कार्यों के अधिकारी हैं, ईशान-कोण मोक्ष-रेखा है — घर के भीतर परमात्मा के लिए छोड़ी गई जगह। लिंग-शिवपुराण की अष्टमूर्ति-व्यवस्था (शिव की आठ मूर्तियाँ — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, यजमान, सूर्य, चंद्र) इसी दर्शन की समानांतर धारा है — वहाँ भी आकाश-मूर्ति का नाम प्रायः "ईशान" ही मिलता है।
तंत्र-योग की भीतरी दिशा — देह का ईशान
आगम-योग परंपरा इस दर्शन को एक कदम और भीतर ले जाती है — दिशाएँ केवल बाहर नहीं, देह में भी हैं। न्यास-विधियों में साधक अपने शरीर पर पंचब्रह्म-मंत्र स्थापित करता है: सद्योजात से अघोर तक चार मुख देह के चार क्षेत्रों में, और ईशान-मंत्र मूर्धा पर — सिर के शिखर पर, जहाँ योग-भाषा सहस्रार कहती है। अर्थात् साधना-शास्त्र में हर देह का अपना ईशान-कोण है — ऊर्ध्व-बिंदु, जहाँ से अनुग्रह उतरता है; शिखा-रक्षा और शिखर-वंदन की लोक-विधियाँ इसी ऊर्ध्व-स्मृति की परछाइयाँ हैं। इसीलिए ईशान-तत्त्व को केवल "वास्तु का नियम" पढ़ना उसे छोटा कर देना है — नियम की जड़ यह ध्यान-सूत्र है कि चेतना का स्वभाव ऊपर खुलना है, और व्यवस्था (घर की हो या देह की) उतनी ही जीवित है जितना उसका ऊर्ध्व-द्वार खुला है।
वास्तु और जीवन — कोना जो ख़ाली रखा जाता है
अब वह स्तर जहाँ ईशान आज भी हर भारतीय घर में उपस्थित हैं — वास्तु। मयमत-मानसार आदि वास्तु-ग्रंथों की विधि स्पष्ट है: भूखंड का उत्तर-पूर्व कोण सबसे हल्का, सबसे खुला, सबसे शुद्ध रहे — वहाँ जल-स्थान (कुआँ, जलाशय), पूजा-गृह या रिक्त आँगन हो; भारी निर्माण, अग्नि-कार्य (रसोई) और मल-स्थान वहाँ वर्जित। कारण अब पाठक के सामने खुला है — वह अनुग्रह-द्वार का कोण है: प्रकाश वहाँ से आता है (प्रातः सूर्य की पहली किरणें उत्तर-पूर्व ढलान पर सबसे पहले उतरती हैं), जल वहाँ रखा जाता है क्योंकि जल संस्कृति में ज्ञान और शुद्धि का द्रव-रूप है, और खुलापन इसलिए कि ईश्वर के लिए छोड़ी गई जगह घेरी नहीं जाती। मंदिर-वास्तु में यही नियम बड़े पैमाने पर दिखता है — देव-तीर्थ (पुष्करिणी) प्रायः ईशान में; गर्भगृह-जल का निकास (सोमसूत्र) उत्तर-ईशान रेखा से। आधुनिक पाठक के लिए स्तर-विवेक फिर स्पष्ट कर दें — वास्तु-विधियों का यह शास्त्र-दर्शन प्रतीक-व्यवस्था है, यांत्रिक भाग्य-यंत्र नहीं; ईशान-कोण "साफ़" रखने से जीवन नहीं बदलता — पर जिस दृष्टि ने घर के एक कोने को ज्ञान और ईश्वर के नाम लिख दिया, वह दृष्टि जीवन बदलती है। ईशान-तत्त्व का समापन-पाठ यही है: हर व्यवस्था में — घर में, नगर में, मन में — एक कोना ऊपर देखने के लिए छूटा रहे; जो व्यवस्था अपना ईशान-कोण भर लेती है, उसके पास दिशाएँ रह जाती हैं, दिशा नहीं रहती। ॥ अष्ट-दिक्पाल मंडल में देव-कोण पूर्ण ॥