बलि की ओर से — हारकर जीतने वाले की गाथा
पृष्ठभूमि — प्रह्लाद का पौत्र स्वर्ग के सिंहासन पर
मंथन-पर्व (D002/D017) के बाद देव-दानव संघर्ष में एक बार दैत्य-पक्ष का पलड़ा ऐसा चढ़ा जैसा पहले कभी नहीं — कारण था नया सम्राट: विरोचन-पुत्र, प्रह्लाद-पौत्र बलि। यह दैत्य हिरण्यकशिपु का प्रतिलोम था — पितामह की भक्ति-धारा उसकी धमनियों में थी; शुक्राचार्य के विश्वजित यज्ञ से उसे दिव्य रथ-धनुष मिले, और उसने इंद्रलोक जीता तो अधर्म से नहीं — शौर्य और यज्ञ-बल से। भागवत स्वयं कहता है कि बलि के राज्य में प्रजा सुखी थी; वह दानी ऐसा कि "बलि-सा दानी" मुहावरा बन गया। यही धर्म-संकट कथा की धुरी है — देवताओं का पक्ष लेना था, पर प्रतिपक्षी अधर्मी नहीं था। अदिति ने पुत्रों (देवताओं) की दुर्दशा पर कश्यप से व्यथा कही; पयोव्रत-अनुष्ठान हुआ, और स्वयं विष्णु ने अदिति-गर्भ से भाद्रपद शुक्ल द्वादशी (श्रवण-द्वादशी) को जन्म लिया — वामन: देवताओं का काम करना था, पर बलि को दंड नहीं, गौरव देकर — इस दुहरी शर्त का उत्तर केवल "याचना" हो सकती थी, युद्ध नहीं।
नर्मदा-तट का यज्ञ और नन्हे पग
बलि नर्मदा-तट (भृगुकच्छ) पर अश्वमेध-शृंखला कर रहा था — सौवें यज्ञ की पूर्णता उसे इंद्र-पद पर स्थायी करने वाली थी। तभी यज्ञशाला की ओर वह दृश्य आया जिसे भागवत ने अद्भुत कोमलता से लिखा है — छत्र-दंड-कमंडलुधारी नन्हा वटु, जिसके तेज से यज्ञ-वेदी की अग्नियाँ फीकी लगने लगीं; ऋत्विज उठ खड़े हुए, बलि ने पाद्य-अर्घ्य से पूजा की और वह वाक्य कहा जो भारतीय आतिथ्य-शास्त्र का शिखर है: "माँगिए — गौ, स्वर्ण, ग्राम, हाथी-घोड़े, पृथ्वी — जो चाहिए।" उत्तर में याचक ने जो माँगा, उस पर सभा हँस पड़ी होगी — अपने पग से तीन पग भूमि। बलि ने आग्रह किया — कुछ बड़ा माँगो, द्वीप माँगो! वामन का उत्तर वैराग्य-शास्त्र का सूत्र-वाक्य है: जिसे तीन पग से संतोष नहीं, उसे त्रिलोक भी तृप्त नहीं करेगा — असंतोषी के लिए द्वीपों की सूची भी छोटी है, संतोषी के लिए तीन पग भी पर्याप्त (भागवत 8.19)। संकल्प-जल छोड़ने को बलि ने कमंडलु उठाया — और यहीं कथा का सबसे नुकीला मोड़ आया।
गुरु का निषेध — और शिष्य की अवज्ञा जो धर्म बनी
शुक्राचार्य ने पहचान लिया था — यह वटु अदिति-पुत्र विष्णु है; तीन पग में तेरा सर्वस्व जाएगा। गुरु का तर्क लौकिक दृष्टि से अकाट्य था: राज्य गया तो यज्ञ भी गए, दान भी गए — अपना मूल नष्ट कर देने वाला दान शास्त्र-सम्मत नहीं; आपत्ति-काल में वचन से हटना दोष नहीं। पर बलि का उत्तर भक्ति-इतिहास का स्वर्ण-पृष्ठ है — जिस वंश में प्रह्लाद हुए, उसका पौत्र वचन कैसे लौटाए? पृथ्वी झूठ का भार सह लेती है, वचन-भंग का नहीं; और यदि यह स्वयं विष्णु हैं, तब तो देने से बड़ा सौभाग्य ही क्या — जो माँगने वाला सब देने वाला है, उसे देने का अवसर किस पुण्य से मिलता है! क्रुद्ध गुरु ने शाप दिया — "श्रीहीन हो जाएगा" (शुक्राचार्य के कमंडलु-नाल में तिनका डालकर जल रोकने और नेत्र-क्षति के प्रसिद्ध प्रसंग परवर्ती/लोक-पुराण धारा के हैं — भागवत-मूल में शाप-वचन है, नेत्र-कथा नहीं: भेद चिह्नित, ग्रेड B/D)। बलि ने शाप सिर पर लिया और जल छोड़ दिया — गुरु-आज्ञा और सत्य-व्रत के द्वंद्व में उसने वह चुना जो चिरकालिक था। परंपरा ने दोनों को सही ठहराया है: शुक्र नीति के आचार्य थे, बलि श्रद्धा का; नीति हार गई, इसीलिए अमर हो गई श्रद्धा।
त्रिविक्रम — दो पग में ब्रह्मांड, तीसरे के लिए मस्तक
जल-संकल्प पूरा होते ही वटु बढ़ने लगा — और बढ़ता गया: भागवत का त्रिविक्रम-वर्णन भारतीय काव्य के विराट-दर्शनों में है — पहले पग में पृथ्वी, दूसरे में स्वर्लोक-ध्रुव तक का समस्त ऊर्ध्व; कहते हैं दूसरे पग के अँगूठे की ठोकर से ब्रह्मांड-कपाल पर छिद्र हुआ और वहीं से ब्रह्म-द्रव भीतर उतरा जो गंगा बनी — "विष्णुपदी" नाम इसी क्षण का ऋणी है (गंगा-अवतरण की समग्र धाराएँ भावी गंगा-पृष्ठ पर)। ऋग्वेद के जिस "त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुः" से यह चित्र उतरा है, वहाँ तीसरा पद "परम पद" है — वैदिक-पौराणिक संगम यहाँ प्रत्यक्ष है। अब त्रिविक्रम ने पूछा — तीसरा पग कहाँ रखूँ? दैत्य-सभा में हाहाकार था, बंधन में भी (वरुण-पाश से बँधे) बलि का मुख शांत था: उसने जो उत्तर दिया, वही इस कथा का हीरक-बिंदु है — "मेरा मस्तक शेष है, प्रभु; उस पर रखिए।" संपत्ति समाप्त हुई तो स्वयं को दे दिया — दान की पराकाष्ठा वह नहीं जो जेब से जाए, वह जो "मैं" से जाए। चरण मस्तक पर उतरा — और अभिमान की अंतिम ग्रंथि के साथ बलि का शेष भी पूर्ण हो गया। प्रह्लाद स्वयं उपस्थित हुए (भागवत 8.23) — पौत्र की इस गति पर कृतार्थ।
सुतल का सिंहासन — हार का पुरस्कार
अब वह न्याय हुआ जो केवल इसी कथा में मिलता है — विजेता ने पराजित से क्षमा-भाव नहीं, सम्मान-भाव रखा। विष्णु ने घोषणा की: बलि को सुतल लोक का अक्षय राज्य — जहाँ स्वर्ग-से अधिक ऐश्वर्य होगा; और स्वयं भगवान गदा धारण कर उसके द्वार के रक्षक बने — "द्वारपाल" प्रभु! अगले मन्वंतर में बलि को इंद्र-पद का वचन मिला (भावी इंद्र — पुराण-गणना)। यह "सर्वस्व हारकर प्रभु को द्वार पर पाने" वाला विरोधाभास भक्ति-दर्शन ने खूब मथा है — बलि ने तीन पग दिए, बदले में वह मिला जो इंद्र को भी नहीं: भगवान की नित्य-उपस्थिति। लोक-पर्वों ने इस वचन को जीवित रखा — केरल का ओणम वर्ष में एक बार "माविली" (महाबलि) के अपनी प्रिय प्रजा से मिलने आने का उत्सव है: पूक्कलम् (पुष्प-रंगोली), ओणसद्या (महाभोज), नौका-दौड़ — एक "दैत्य" के स्वागत में सजता मल्याली घर-घर, और साथ में थ्रिक्काकरा (कोच्चि-क्षेत्र) का वामनमूर्ति मंदिर — ओणम का मूल-पीठ; उधर उत्तर-पश्चिम भारत दीपावली के अगले दिन "बलि-प्रतिपदा / बलि-पड़वा" को बलि-राज्य के स्मरण से मनाता है (भविष्य में बलि-राज्य लौटने की लोक-आशा सहित)। पराजितों में केवल बलि है जिसके नाम पर विजेताओं से बड़े पर्व हैं।
आध्यात्मिक अर्थ — तीन पग और मस्तक
वामन-कथा का प्रतीक-शास्त्र सीधा हृदय पर रखा गया है। तीन पग जीव के पास जो कुछ "अपना" है उसकी पूरी सूची हैं — परंपरा उन्हें स्थूल-सूक्ष्म-कारण देह कहती है, या भोग-भाव से कहें: मेरा संसार (पृथ्वी), मेरी आकांक्षाएँ (अंतरिक्ष), मेरा अहं (मस्तक)। प्रभु याचक बनकर आते हैं — विराट रूप में आते तो बलि "भक्त" नहीं, "पराजित" भर होता; कृपा जब लेने आती है, तब छोटी होकर आती है, ताकि देने वाले का गौरव बचा रहे। शुक्र-बलि द्वंद्व सिखाता है कि विवेक (नीति) की सीमा वहाँ है जहाँ श्रद्धा का क्षेत्र शुरू होता है — हिसाब लगाने वाला दान रोक देता, इसीलिए इतिहास में हिसाबी बहुत हुए, बलि एक हुआ। और अंतिम सूत्र वही "दो पग बनाम तीसरा": संसार और स्वर्ग — जो कुछ बाहर है — प्रभु दो पग में स्वयं ले लेते हैं; तीसरे के लिए वे रुककर पूछते हैं, क्योंकि मस्तक (अहं) बलपूर्वक नहीं लिया जा सकता — वह केवल झुकाया जा सकता है। जिस दिन साधक स्वयं कह दे — "यह शेष है, इस पर रखिए" — उस दिन उसका वामन भी त्रिविक्रम हो जाता है, और हारा हुआ जीव सुतल के सिंहासन पर प्रभु को द्वारपाल पाता है।