परशु का न्याय — सहस्रार्जुन से महेंद्र-तप तक
पृष्ठभूमि — आश्रम और सम्राट
नर्मदा-क्षेत्र में माहिष्मती का सम्राट था कार्तवीर्य अर्जुन — "सहस्रार्जुन", जिसे दत्तात्रेय की आराधना से सहस्र भुजाओं का वर मिला था। बल ऐसा कि रावण तक को उसने खेल-खेल में बंदी बना लिया था (उत्तरकांड-प्रसंग — जिस रावण से त्रिलोक काँपता था, उसे सहस्रार्जुन ने नर्मदा-क्रीड़ा में पकड़कर कारागार में डाल दिया; पुलस्त्य ऋषि छुड़ाने आए)। पर वर-बल का पुराना रोग उसे भी लगा — दर्प। दूसरी ओर था जमदग्नि का आश्रम: तप, वेद और एक अलौकिक संपदा — कामधेनु-कोटि की सुरभि गौ (भागवत में "कामधेनु" शब्द-परंपरा), जो संकल्प-मात्र से सहस्रों का आतिथ्य रच देती थी। एक आखेट-यात्रा में सम्राट ससैन्य आश्रम आया; ऋषि ने गौ-प्रसाद से पूरी सेना को राजभोग करा दिया। और यहीं लोभ जागा — जिस गौ के रहते वन का ऋषि सम्राट से बड़ा "दाता" हो, वह गौ राजकोष में होनी चाहिए। विनती ठुकराई गई तो बल चला — सैनिक बछड़े-समेत सुरभि को हाँक ले गए; आश्रम रौंदा गया। यह केवल एक गाय की चोरी नहीं थी — यह उस युग का चित्र था जिसमें राजदंड ऋषि-संपदा को अपना चारागाह समझने लगा था; भागवत कहता है कि पृथ्वी क्षत्रिय-भार से आर्त होकर पुकार रही थी — अवतार-प्रयोजन तैयार था।
प्रथम संग्राम — सहस्र भुजाओं का उत्तर एक परशु
परशुराम आश्रम लौटे तो विध्वंस देखा। जिस तेज ने कैलास पर शिव को प्रसन्न कर परशु, अक्षय तूणीर और दिव्यास्त्र दिलाए थे (शिव-शिष्यत्व की यह पूर्व-कथा पुराण-परंपरा में विस्तृत है — कठोर सेवा-तप से वरदान तक), वह अब न्याय-यात्रा पर निकला। माहिष्मती के द्वार पर एक अकेला भार्गव — सामने सहस्रबाहु सम्राट और अक्षौहिणी-दल। भागवत का युद्ध-वर्णन तीव्र और निर्णायक है: सत्रह अक्षौहिणियों का संहार करते हुए परशुराम ने सम्राट तक पहुँचकर उसकी सहस्र भुजाएँ वृक्ष-शाखाओं की तरह काट डालीं और शीश-च्छेद किया। सुरभि आश्रम लौटी। पर पिता की प्रतिक्रिया इस कथा का पहला नीति-शिखर है — जमदग्नि ने पुत्र को बधाई नहीं दी, प्रायश्चित बताया: राजा का वध ब्रह्महत्या से भी भारी है, वत्स; तूने क्रोध को न्याय की सीमा से आगे जाने दिया — तीर्थ-सेवन कर। पुत्र गया भी। धर्म-कथा की यह ईमानदारी ध्यान देने योग्य है: अवतार का कर्म भी संस्कार-तुला पर तुलता है, और ऋषि-कुल विजय से अधिक विवेक को पूजता है।
मातृ-प्रसंग — आज्ञा की कठोरतम कसौटी
इसी बीच वह प्रसंग आया जो परशुराम-चरित का सबसे कठिन पृष्ठ है। रेणुका जल लेने गईं; गंधर्वराज चित्ररथ की जल-क्रीड़ा देख एक क्षण को मन विचलित हुआ — लौटीं तो तप-दृष्टि वाले जमदग्नि ने वह क्षण पढ़ लिया। दंड-आदेश हुआ — पुत्रों से माता का वध। चार अग्रज काँपकर मना कर गए (शापित हुए); परशुराम ने — जो जानते थे कि पिता का तप क्या कर सकता है और यह भी कि आज्ञा-पालन ही एकमात्र द्वार है — परशु उठाया और माता का शीश उतार दिया। प्रसन्न पिता ने वर माँगने को कहा; और यहाँ पुत्र की बुद्धि प्रकट हुई: पहला वर — माता जीवित हों और उन्हें मृत्यु-स्मृति न रहे; शेष वर — भाइयों का शाप-मोचन। रेणुका उठीं, जैसे नींद से। परंपरा ने इस प्रसंग को कभी सरल नहीं होने दिया — यह अंध-आज्ञाकारिता का महिमामंडन नहीं, धर्म-संकट की पराकाष्ठा है: परशुराम ने वह मार्ग चुना जिसमें आज्ञा भी रहे और माता भी — तत्क्षण-मृत्यु से तत्क्षण-जीवन तक की यह योजना उसी क्षण मन में थी, तभी हाथ उठा था। दक्षिण भारत की लोक-धारा में रेणुका इसी प्रसंग-वृत्त से देवी येल्लम्मा रूप में पूजित हुईं (ग्रेड D — जीवित लोक-परंपरा, सौंदत्ति आदि पीठ)।
इक्कीस अभियान — और समंतपंचक का विराम
तीर्थ-यात्रा से लौटे परशुराम की अनुपस्थिति में सहस्रार्जुन-पुत्रों ने प्रतिशोध लिया — तपस्यारत वृद्ध जमदग्नि का शीश काट ले गए। रेणुका ने इक्कीस बार छाती पीटी ("एक-विंशति" की यह लोक-व्युत्पत्ति पुराण-पाठों में मिलती है) — और पुत्र ने प्रतिज्ञा की। फिर वह अभियान-शृंखला चली जिसने युग का नक्शा बदला: इक्कीस बार पृथ्वी को उन्मत्त-क्षत्रिय-वंशों से रिक्त करना। महाभारत-पुराण स्पष्ट कहते हैं कि यह जाति-संहार नहीं, दर्प-संहार था — धर्मनिष्ठ क्षत्रिय-कुल (जैसे इक्ष्वाकु-वंश, जनक-वंश) अछूते रहे; लक्ष्य वे थे जो हैहय-मार्ग पर राजदंड को लूट-यंत्र बना चुके थे। कुरुक्षेत्र-क्षेत्र के पाँच रक्त-सरोवर (समंतपंचक) इस अभियान की स्मृति बने — वहीं पितृ-तर्पण हुआ, और वहीं ऋचीक-पितरों ने प्रकट होकर विराम कहा: वत्स, बस। परशुराम ने अश्वमेध कर समस्त विजित पृथ्वी कश्यप ऋषि को दान कर दी — विजेता के पास अपनी जीती धरती की एक मुट्ठी भी नहीं बची; दक्षिण-पश्चिम में रहने को समुद्र से नई भूमि माँगी (शूर्प/परशु-क्षेपण से कोंकण-केरल उद्धार की तट-परंपरा — ग्रेड B/D), और शस्त्र धोकर तप को मुड़े। यही "विराम" परशुराम-तत्व की कुंजी है — क्रोध जो आदेश से उठे और आदेश से थमे, वही धर्म-क्रोध है; जो थम न सके, वह मात्र हिंसा।
अवतार से अवतार तक — सेतु-चरित
इसके बाद का परशुराम-चरित अवतार-संधियों की कथा है। त्रेता में सीता-स्वयंवर के बाद मार्ग रोककर उन्होंने उस "राम" की परीक्षा ली जो उनके तेज का अगला वाहक था — शारंग-धनुष चढ़वाया, और चढ़ते ही पहचान लिया कि भार्गव-तेज अब रघुकुल में प्रवाहित हो चुका है; अपना तप-पुण्य बाण को समर्पित कर महेंद्राचल लौट गए (विस्तृत प्रसंग D013 कथा 1 पर — यहाँ दोहराया नहीं गया)। द्वापर में वे शस्त्र-विद्या के महाकुलपति हैं: भीष्म को अस्त्र-शिक्षा दी — और फिर अंबा-प्रकरण में उसी शिष्य से तेईस दिन का वह महायुद्ध लड़ा जो अनिर्णीत रहा (महाभारत उद्योग पर्व — गुरु-शिष्य द्वंद्व का विरल अध्याय); द्रोण को धनुर्वेद-दान किया; और कर्ण-प्रसंग सबसे मार्मिक है — ब्राह्मण-वेश में विद्या लेने आए कर्ण की जंघा पर कीट-वेधन की पीड़ा सहते देख गुरु ने क्षत्रिय-सत्य पहचान लिया: शाप दिया कि अंत-काल में विद्या विस्मृत होगी — पर साथ ही (परंपरा जोड़ती है) अपना विजय-धनुष और यश-आशीष भी दिया; शाप में भी शिष्य-वात्सल्य की यह गाँठ परशुराम-हृदय का परिचय है। कलियुग के लिए कल्कि पुराण उन्हें भावी कल्कि-अवतार का शस्त्र-गुरु नियुक्त करता है (D023) — छठा अवतार दसवें को दीक्षा देगा: चिरंजीविता का इससे बड़ा प्रयोजन-पत्र क्या होगा। इसीलिए भारतीय स्मृति में वे "गए" नहीं — महेंद्र पर्वत पर आज भी उस युग-संध्या की प्रतीक्षा करते तपस्वी हैं, और अक्षय तृतीया (वैशाख शुक्ल तृतीया) की संध्या उनका जन्म-दीप जलाती है।
आध्यात्मिक अर्थ — फरसा और वेद
परशुराम-चरित के पाठ कठोर पर स्पष्ट हैं। पहला — शक्ति का प्रयोजन-बद्ध होना: उनका परशु न स्थायी सत्ता बना, न साम्राज्य; इक्कीस अभियानों का विजेता अंत में भूमिहीन तपस्वी है — शक्ति जो पद न माँगे, वही अवतार-शक्ति है। दूसरा — "अग्रतः चतुरो वेदाः, पृष्ठतः सशरं धनुः": आगे चार वेद, पीठ पर धनुष-बाण — ज्ञान आगे रहे, शस्त्र पीछे; आवश्यकता पड़े तो शाप से भी, शर से भी — यह भार्गव-उद्घोष शस्त्र-शास्त्र संतुलन का भारतीय सूत्र-वाक्य बना। तीसरा — क्रोध का व्याकरण: पिता के आदेश से उठना, पितरों के आदेश से थमना — साधक के लिए संकेत कि आवेग भी अनुशासन के भीतर ही तेज है, बाहर केवल ताप। और चौथा, सबसे भीतरी — मातृ-प्रसंग का: धर्म-संकटों में बुद्धि वही श्रेष्ठ जो कठोरतम आज्ञा के भीतर से करुणा का मार्ग निकाल ले; परशु उठाने वाला ही वर माँगते समय माता का जीवन माँगता है। फरसा और वरदान एक ही हाथ में — यही परशुराम हैं: धर्म का वह रूप जो कोमल होने से पहले न्यायी होना अनिवार्य मानता है।