श्री परशुराम

Parashurama · दशावतार-षष्ठ · भार्गव राम · चिरंजीवी

विष्णु के छठे अवतार — जमदग्नि-रेणुका के पुत्र, शिव से परशु पाने वाले भार्गव। एकमात्र अवतार जो अगले अवतारों से मिलता रहा: राम से धनुष-संवाद, कृष्ण-युग में गुरु-पद, और कल्कि-काल की प्रतीक्षा में आज भी तपरत — परंपरा ऐसा कहती है।

श्रेणी: विष्णु-अवतार (दशावतार-6) परंपरा: वैष्णव / पैन-हिंदू विशेष: सप्त-चिरंजीवियों में पर्व: परशुराम जयंती (अक्षय तृतीया)
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परशुराम — गुंटूर श्री वेंकटेश्वर-मंदिर दशावतार-शिल्प (Commons छायाचित्र)
भार्गवभृगु-वंश का तेज
परशुधरशिव-प्रदत्त कुठार के स्वामी
शस्त्र-शास्त्र संगमवेद भी, धनुष भी
चिरंजीवी गुरुभीष्म-द्रोण-कर्ण के आचार्य

परिचय एवं दिव्य स्वरूप

Introduction

परशुराम विष्णु के छठे अवतार हैं — और दशावतार-शृंखला का सबसे विलक्षण विरोधाभास: ब्राह्मण-कुल में जन्मे किंतु क्षात्र-तेज के शिखर; ऋषि भी, योद्धा भी। "राम" उनका मूल नाम है, शिव से प्राप्त परशु (कुठार/फरसा) ने उसे "परशु-राम" किया; भृगु-वंश (जमदग्नि-पुत्र) होने से भार्गव और जामदग्न्य कहलाते हैं। दशावतार-क्रम की दृष्टि से वे "आवेश-अवतार" की कोटि में गिने जाते हैं (पूर्ण-अवतार राम-कृष्ण से भिन्न — विष्णु-तेज का विशेष-प्रयोजन आवेश), और उनका प्रयोजन था उस युग के उन्मत्त क्षत्रिय-दर्प का दमन जिसने धर्म-मर्यादा निगल ली थी।

वे सप्त-चिरंजीवियों में हैं — परंपरा के अनुसार आज भी महेंद्र पर्वत पर तपरत। इसी चिरंजीविता ने उन्हें अवतार-इतिहास की अनूठी "सेतु-भूमिका" दी: त्रेता में राम से भेंट (D013), द्वापर में भीष्म-द्रोण-कर्ण के शस्त्र-गुरु, और कलियुग-अंत में कल्कि (D023) के भावी आचार्य — एक अवतार जो अगले अवतारों का समकालीन बना रहता है। पश्चिमी तट की परंपरा उन्हें "भूमि-निर्माता" भी कहती है — समुद्र से कोंकण-केरल की धरती माँगने वाले; इसीलिए केरल-गोवा-कोंकण पट्टी आज भी "परशुराम-क्षेत्र" कहलाती है।

परिवार एवं संबंध

Family
  • पितामहर्षि जमदग्नि — भृगु-वंशी सप्तर्षि-कोटि ऋषि
  • मातारेणुका — प्रसेनजित/रेणु राजा की कन्या; दक्षिण में देवी-रूप में पूजित (येल्लम्मा-परंपरा)
  • भाईचार अग्रज (रुमण्वान, सुषेण, वसु, विश्वावसु — पाठ-भेद सहित); परशुराम कनिष्ठ
  • गुरुभगवान शिव (परशु एवं दिव्यास्त्र-दीक्षा); पितामह-परंपरा से भृगु-ऋचीक वंश-विद्या
  • शिष्यभीष्म, द्रोण, कर्ण (महाभारत); भावी शिष्य — कल्कि (D023 परंपरा)
  • मूल-स्वरूपविष्णु के छठे (आवेश) अवतार

प्रमुख कथा

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प्रमुख कथा

परशु का न्याय — सहस्रार्जुन से महेंद्र-तप तक

पृष्ठभूमि — आश्रम और सम्राट

नर्मदा-क्षेत्र में माहिष्मती का सम्राट था कार्तवीर्य अर्जुन — "सहस्रार्जुन", जिसे दत्तात्रेय की आराधना से सहस्र भुजाओं का वर मिला था। बल ऐसा कि रावण तक को उसने खेल-खेल में बंदी बना लिया था (उत्तरकांड-प्रसंग — जिस रावण से त्रिलोक काँपता था, उसे सहस्रार्जुन ने नर्मदा-क्रीड़ा में पकड़कर कारागार में डाल दिया; पुलस्त्य ऋषि छुड़ाने आए)। पर वर-बल का पुराना रोग उसे भी लगा — दर्प। दूसरी ओर था जमदग्नि का आश्रम: तप, वेद और एक अलौकिक संपदा — कामधेनु-कोटि की सुरभि गौ (भागवत में "कामधेनु" शब्द-परंपरा), जो संकल्प-मात्र से सहस्रों का आतिथ्य रच देती थी। एक आखेट-यात्रा में सम्राट ससैन्य आश्रम आया; ऋषि ने गौ-प्रसाद से पूरी सेना को राजभोग करा दिया। और यहीं लोभ जागा — जिस गौ के रहते वन का ऋषि सम्राट से बड़ा "दाता" हो, वह गौ राजकोष में होनी चाहिए। विनती ठुकराई गई तो बल चला — सैनिक बछड़े-समेत सुरभि को हाँक ले गए; आश्रम रौंदा गया। यह केवल एक गाय की चोरी नहीं थी — यह उस युग का चित्र था जिसमें राजदंड ऋषि-संपदा को अपना चारागाह समझने लगा था; भागवत कहता है कि पृथ्वी क्षत्रिय-भार से आर्त होकर पुकार रही थी — अवतार-प्रयोजन तैयार था।

प्रथम संग्राम — सहस्र भुजाओं का उत्तर एक परशु

परशुराम आश्रम लौटे तो विध्वंस देखा। जिस तेज ने कैलास पर शिव को प्रसन्न कर परशु, अक्षय तूणीर और दिव्यास्त्र दिलाए थे (शिव-शिष्यत्व की यह पूर्व-कथा पुराण-परंपरा में विस्तृत है — कठोर सेवा-तप से वरदान तक), वह अब न्याय-यात्रा पर निकला। माहिष्मती के द्वार पर एक अकेला भार्गव — सामने सहस्रबाहु सम्राट और अक्षौहिणी-दल। भागवत का युद्ध-वर्णन तीव्र और निर्णायक है: सत्रह अक्षौहिणियों का संहार करते हुए परशुराम ने सम्राट तक पहुँचकर उसकी सहस्र भुजाएँ वृक्ष-शाखाओं की तरह काट डालीं और शीश-च्छेद किया। सुरभि आश्रम लौटी। पर पिता की प्रतिक्रिया इस कथा का पहला नीति-शिखर है — जमदग्नि ने पुत्र को बधाई नहीं दी, प्रायश्चित बताया: राजा का वध ब्रह्महत्या से भी भारी है, वत्स; तूने क्रोध को न्याय की सीमा से आगे जाने दिया — तीर्थ-सेवन कर। पुत्र गया भी। धर्म-कथा की यह ईमानदारी ध्यान देने योग्य है: अवतार का कर्म भी संस्कार-तुला पर तुलता है, और ऋषि-कुल विजय से अधिक विवेक को पूजता है।

मातृ-प्रसंग — आज्ञा की कठोरतम कसौटी

इसी बीच वह प्रसंग आया जो परशुराम-चरित का सबसे कठिन पृष्ठ है। रेणुका जल लेने गईं; गंधर्वराज चित्ररथ की जल-क्रीड़ा देख एक क्षण को मन विचलित हुआ — लौटीं तो तप-दृष्टि वाले जमदग्नि ने वह क्षण पढ़ लिया। दंड-आदेश हुआ — पुत्रों से माता का वध। चार अग्रज काँपकर मना कर गए (शापित हुए); परशुराम ने — जो जानते थे कि पिता का तप क्या कर सकता है और यह भी कि आज्ञा-पालन ही एकमात्र द्वार है — परशु उठाया और माता का शीश उतार दिया। प्रसन्न पिता ने वर माँगने को कहा; और यहाँ पुत्र की बुद्धि प्रकट हुई: पहला वर — माता जीवित हों और उन्हें मृत्यु-स्मृति न रहे; शेष वर — भाइयों का शाप-मोचन। रेणुका उठीं, जैसे नींद से। परंपरा ने इस प्रसंग को कभी सरल नहीं होने दिया — यह अंध-आज्ञाकारिता का महिमामंडन नहीं, धर्म-संकट की पराकाष्ठा है: परशुराम ने वह मार्ग चुना जिसमें आज्ञा भी रहे और माता भी — तत्क्षण-मृत्यु से तत्क्षण-जीवन तक की यह योजना उसी क्षण मन में थी, तभी हाथ उठा था। दक्षिण भारत की लोक-धारा में रेणुका इसी प्रसंग-वृत्त से देवी येल्लम्मा रूप में पूजित हुईं (ग्रेड D — जीवित लोक-परंपरा, सौंदत्ति आदि पीठ)।

इक्कीस अभियान — और समंतपंचक का विराम

तीर्थ-यात्रा से लौटे परशुराम की अनुपस्थिति में सहस्रार्जुन-पुत्रों ने प्रतिशोध लिया — तपस्यारत वृद्ध जमदग्नि का शीश काट ले गए। रेणुका ने इक्कीस बार छाती पीटी ("एक-विंशति" की यह लोक-व्युत्पत्ति पुराण-पाठों में मिलती है) — और पुत्र ने प्रतिज्ञा की। फिर वह अभियान-शृंखला चली जिसने युग का नक्शा बदला: इक्कीस बार पृथ्वी को उन्मत्त-क्षत्रिय-वंशों से रिक्त करना। महाभारत-पुराण स्पष्ट कहते हैं कि यह जाति-संहार नहीं, दर्प-संहार था — धर्मनिष्ठ क्षत्रिय-कुल (जैसे इक्ष्वाकु-वंश, जनक-वंश) अछूते रहे; लक्ष्य वे थे जो हैहय-मार्ग पर राजदंड को लूट-यंत्र बना चुके थे। कुरुक्षेत्र-क्षेत्र के पाँच रक्त-सरोवर (समंतपंचक) इस अभियान की स्मृति बने — वहीं पितृ-तर्पण हुआ, और वहीं ऋचीक-पितरों ने प्रकट होकर विराम कहा: वत्स, बस। परशुराम ने अश्वमेध कर समस्त विजित पृथ्वी कश्यप ऋषि को दान कर दी — विजेता के पास अपनी जीती धरती की एक मुट्ठी भी नहीं बची; दक्षिण-पश्चिम में रहने को समुद्र से नई भूमि माँगी (शूर्प/परशु-क्षेपण से कोंकण-केरल उद्धार की तट-परंपरा — ग्रेड B/D), और शस्त्र धोकर तप को मुड़े। यही "विराम" परशुराम-तत्व की कुंजी है — क्रोध जो आदेश से उठे और आदेश से थमे, वही धर्म-क्रोध है; जो थम न सके, वह मात्र हिंसा।

अवतार से अवतार तक — सेतु-चरित

इसके बाद का परशुराम-चरित अवतार-संधियों की कथा है। त्रेता में सीता-स्वयंवर के बाद मार्ग रोककर उन्होंने उस "राम" की परीक्षा ली जो उनके तेज का अगला वाहक था — शारंग-धनुष चढ़वाया, और चढ़ते ही पहचान लिया कि भार्गव-तेज अब रघुकुल में प्रवाहित हो चुका है; अपना तप-पुण्य बाण को समर्पित कर महेंद्राचल लौट गए (विस्तृत प्रसंग D013 कथा 1 पर — यहाँ दोहराया नहीं गया)। द्वापर में वे शस्त्र-विद्या के महाकुलपति हैं: भीष्म को अस्त्र-शिक्षा दी — और फिर अंबा-प्रकरण में उसी शिष्य से तेईस दिन का वह महायुद्ध लड़ा जो अनिर्णीत रहा (महाभारत उद्योग पर्व — गुरु-शिष्य द्वंद्व का विरल अध्याय); द्रोण को धनुर्वेद-दान किया; और कर्ण-प्रसंग सबसे मार्मिक है — ब्राह्मण-वेश में विद्या लेने आए कर्ण की जंघा पर कीट-वेधन की पीड़ा सहते देख गुरु ने क्षत्रिय-सत्य पहचान लिया: शाप दिया कि अंत-काल में विद्या विस्मृत होगी — पर साथ ही (परंपरा जोड़ती है) अपना विजय-धनुष और यश-आशीष भी दिया; शाप में भी शिष्य-वात्सल्य की यह गाँठ परशुराम-हृदय का परिचय है। कलियुग के लिए कल्कि पुराण उन्हें भावी कल्कि-अवतार का शस्त्र-गुरु नियुक्त करता है (D023) — छठा अवतार दसवें को दीक्षा देगा: चिरंजीविता का इससे बड़ा प्रयोजन-पत्र क्या होगा। इसीलिए भारतीय स्मृति में वे "गए" नहीं — महेंद्र पर्वत पर आज भी उस युग-संध्या की प्रतीक्षा करते तपस्वी हैं, और अक्षय तृतीया (वैशाख शुक्ल तृतीया) की संध्या उनका जन्म-दीप जलाती है।

आध्यात्मिक अर्थ — फरसा और वेद

परशुराम-चरित के पाठ कठोर पर स्पष्ट हैं। पहला — शक्ति का प्रयोजन-बद्ध होना: उनका परशु न स्थायी सत्ता बना, न साम्राज्य; इक्कीस अभियानों का विजेता अंत में भूमिहीन तपस्वी है — शक्ति जो पद न माँगे, वही अवतार-शक्ति है। दूसरा — "अग्रतः चतुरो वेदाः, पृष्ठतः सशरं धनुः": आगे चार वेद, पीठ पर धनुष-बाण — ज्ञान आगे रहे, शस्त्र पीछे; आवश्यकता पड़े तो शाप से भी, शर से भी — यह भार्गव-उद्घोष शस्त्र-शास्त्र संतुलन का भारतीय सूत्र-वाक्य बना। तीसरा — क्रोध का व्याकरण: पिता के आदेश से उठना, पितरों के आदेश से थमना — साधक के लिए संकेत कि आवेग भी अनुशासन के भीतर ही तेज है, बाहर केवल ताप। और चौथा, सबसे भीतरी — मातृ-प्रसंग का: धर्म-संकटों में बुद्धि वही श्रेष्ठ जो कठोरतम आज्ञा के भीतर से करुणा का मार्ग निकाल ले; परशु उठाने वाला ही वर माँगते समय माता का जीवन माँगता है। फरसा और वरदान एक ही हाथ में — यही परशुराम हैं: धर्म का वह रूप जो कोमल होने से पहले न्यायी होना अनिवार्य मानता है।

स्रोत टिप्पणी: सुरभि-हरण, माहिष्मती-युद्ध, मातृ-प्रसंग, इक्कीस अभियान, कश्यप-भूदान, समंतपंचक — भागवत 9.15-9.16 एवं महाभारत वन पर्व (ग्रेड A); शिव-परशु दीक्षा पुराण-परंपरा (ग्रेड B); रावण-बंदी प्रसंग वाल्मीकि उत्तरकांड (ग्रेड A — पाठ-स्तर टिप्पणी D013-सम); राम-भेंट बालकांड 74-76 (ग्रेड A, विस्तार D013 पर); भीष्म-युद्ध उद्योग पर्व, कर्ण-शाप शांति/लोक-पाठ (ग्रेड A/B); कोंकण-केरल भूमि-परंपरा एवं येल्लम्मा-धारा स्थल/लोक (ग्रेड B/D); कल्कि-गुरु कल्कि पुराण (ग्रेड B)।

नाम एवं अर्थ

Names
परशुराम
परशु (कुठार) धारण करने वाले राम — शिव-प्रसाद से मिला नाम।
भार्गव
भृगु-वंशज — भृगु→ऋचीक→जमदग्नि की तेजस्वी ऋषि-परंपरा।
जामदग्न्य
जमदग्नि-पुत्र — वैदिक-शैली का पितृ-नाम।
रेणुका-नंदन
रेणुका के पुत्र — मातृ-प्रसंग की स्मृति सहित।
वीरराम / भृगुपति
रामत्रय (परशुराम-राम-बलराम) में ज्येष्ठ; भृगु-कुल के स्वामी।

मंत्र एवं पाठ

Mantras

नाम मंत्र

ॐ परशुरामाय नमः ॥ · ॐ जामदग्न्याय नमः ॥

भार्गव-उद्घोष

अग्रतः चतुरो वेदाः पृष्ठतः सशरं धनुः ।
इदं ब्राह्मम् इदं क्षात्रं शापादपि शरादपि ॥

अर्थ: आगे चारों वेद, पीठ पर बाण-सहित धनुष — यह ब्राह्म-तेज भी है, क्षात्र-बल भी: (उत्तर मिलेगा) शाप से भी, बाण से भी। — भार्गव-परंपरा का बहु-उद्धृत उद्घोष (ग्रेड B — परवर्ती संस्कृत सूक्ति-परंपरा)।

दशावतार-स्तोत्र — भार्गव-वंदना (जयदेव)

क्षत्रियरुधिरमये जगदपगतपापं
स्नपयसि पयसि शमितभवतापम् ।
केशव धृतभृगुपतिरूप जय जगदीश हरे ॥

परशुराम-गायत्री एवं जामदग्न्य-स्तोत्र शब्दशः सत्यापन के साथ भावी मंत्र-सूचकांक विस्तार में — यहाँ नियम-अनुसार असत्यापित पूर्ण-पाठ नहीं छापा गया।

पर्व एवं व्रत

Festivals
परशुराम जयंती
वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया) — प्रदोष-व्यापिनी तिथि में जन्मोत्सव; ब्राह्मण-समाजों का प्रमुख पर्व।
अक्षय तृतीया-संगम
जयंती का अक्षय-मुहूर्त से युग्म — चिरंजीवी के जन्म का "अक्षय" दिन होना परंपरा को सार्थक-संयोग प्रिय है।
रेणुका/येल्लम्मा जात्राएँ
सौंदत्ति आदि पीठों की मातृ-पर्व परंपराएँ — परशुराम-कथा से जुड़ी जीवित लोक-धारा (ग्रेड D)।

मंदिर एवं तीर्थ

Temples
परशुराम मंदिर, चिपळूण (महाराष्ट्र)
कोंकण के "परशुराम-क्षेत्र" की प्रधान पीठ — काल-काम-परशुराम त्रिमूर्ति विग्रह।
परशुराम कुंड (अरुणाचल)
लोहित-तट का तीर्थ — मकर संक्रांति स्नान-मेला; परशु-मोचन की स्थल-परंपरा।
तिरुवल्लम (केरल)
केरल का विरल परशुराम-मंदिर — "केरल-निर्माता" परंपरा का पीठ।
महेंद्रगिरि (ओडिशा-आंध्र सीमा)
चिरंजीवी-तपस्थली की जीवित परंपरा — पर्वत-तीर्थ।

बच्चों के लिए ज्ञान

For Children

सरल परिचय: परशुराम जी विष्णु भगवान के छठे अवतार हैं। वे ऋषि जमदग्नि के बेटे थे और शिवजी से उन्हें फरसा (परशु) मिला था। जब घमंडी राजा अत्याचार करने लगे, तो उन्होंने सबको सबक सिखाया — और फिर सारी जीती हुई धरती दान कर दी!

रोचक तथ्य:

  • वे चिरंजीवी हैं — कहते हैं वे आज भी महेंद्र पर्वत पर तपस्या कर रहे हैं।
  • उन्होंने श्रीराम से भी भेंट की और महाभारत के भीष्म-द्रोण-कर्ण उनके शिष्य थे।
  • केरल और कोंकण की धरती को "परशुराम-क्षेत्र" कहा जाता है।
  • उनका जन्मदिन अक्षय तृतीया के दिन मनाया जाता है।

सीख: ताकत का इस्तेमाल सिर्फ अन्याय रोकने के लिए करो — और काम पूरा होते ही उसे रख दो।

मिनी क्विज़:

  1. परशुराम जी को परशु किसने दिया?
  2. उनके पिता कौन थे?
  3. उन्होंने जीती हुई पृथ्वी किसे दान की?
  4. महाभारत के कौन-कौन उनके शिष्य थे?