अंजलि की मछली से प्रलय की महानौका तक
पृष्ठभूमि — कृतमाला-तट का तर्पण
द्रविड़-देश के राजर्षि सत्यव्रत — तप और सत्य-निष्ठा में विख्यात, जिन्हें अगले मन्वंतर का मनु (वैवस्वत) होना था — कृतमाला नदी में जल-तर्पण कर रहे थे। अंजलि उठाई तो जल के साथ एक नन्ही मछली हथेली में आ गई। राजा ने उसे लौटाना चाहा, पर मछली बोल उठी — "राजन्! नदी के बड़े जीव छोटों को खा जाते हैं; मुझे मत छोड़ो, मेरी रक्षा करो।" शरणागत की पुकार — और सत्यव्रत का धर्म जाग गया; वे उसे कमंडलु में घर ले आए। यह आरंभ-दृश्य ही कथा का बीज-सूत्र है: प्रलय जैसे ब्रह्मांड-स्तरीय आख्यान का द्वार एक अंजलि-भर करुणा से खुलता है। शतपथ ब्राह्मण की प्राचीनतम धारा में यही प्रसंग मनु के प्रातः जलाशय-जल में मिलता है — वहाँ मछली स्वयं प्रस्ताव रखती है: "मेरा पालन कर, मैं तुझे (आने वाली) बाढ़ से तारूँगी" — रक्षा के बदले रक्षा का यह आदिम अनुबंध वैदिक कथा-स्तर की सीधी-सरल नैतिकी है, जिस पर पुराणों ने भक्ति-भवन खड़ा किया।
वृद्धि-क्रम — जो हर पात्र से बड़ा निकला
रात बीतते-बीतते कमंडलु छोटा पड़ गया। मटके में डाला — मटका छोटा; कुएँ में — कुआँ; सरोवर में — सरोवर; फिर एक के बाद एक झील, नदी, और अंततः राजा ने उसे समुद्र में पहुँचाया। छोड़ते समय मछली मुस्कुराई — "समुद्र में मगर मुझे खा जाएँगे, फिर भी छोड़ोगे?" अब सत्यव्रत के विस्मय ने साष्टांग रूप लिया: जो एक रात्रि में योजन-विस्तार पा जाए, वह जीव नहीं — "आप कौन हैं? आप निश्चय ही वे ही हैं जिनसे यह जगत् है।" भागवत में यहीं भगवान प्रकट-वचन कहते हैं और प्रयोजन खोलते हैं: आज से सातवें दिन त्रिलोकी प्रलय-सागर में डूबेगी; तुम्हारे पास एक नौका आएगी — समस्त औषधियों के बीज, सूक्ष्म जीव-धरोहर और सप्तर्षियों सहित उस पर चढ़ना; प्रचंड झंझा में जब नौका डोलेगी, मैं शृंगधारी मत्स्य रूप में आऊँगा — वासुकि से नौका मेरे सींग में बाँध देना; प्रलय-रात्रि भर मैं तुम्हें खींचूँगा। वृद्धि-क्रम का यह रूपक भाष्यकारों का प्रिय है — ईश्वर-तत्व हर उस पात्र से बड़ा निकलता जाता है जिसमें हम उसे रखना चाहते हैं: कमंडलु (व्यक्तिगत मत), कुआँ (कुल-परंपरा), सरोवर (संप्रदाय), समुद्र (शास्त्र-समष्टि) — और अंत में पात्र नहीं, समर्पण ही उसे धारण करता है।
प्रलय-रात्रि — सींग से बँधी सृष्टि
सातवें दिन मेघों ने आकाश निगल लिया; समुद्र मर्यादा तोड़कर चढ़ आया; पृथ्वी डूबने लगी। प्रतीक्षित नौका प्रकट हुई — सत्यव्रत ने ओषधि-बीज और सप्तर्षियों (कथा-धाराओं में जीव-युग्मों की धरोहर भी) सहित आरोहण किया। और तब जल-पर्वतों के बीच वह दिव्य दृश्य उभरा — लाखों योजन का स्वर्ण-मीन, मस्तक पर अभंग शृंग। वासुकि नाग रस्सी बने; नौका सींग से बँधी; और प्रलय के उस अंधमहासागर में एकमात्र गति-रेखा वह रही जो मत्स्य खींच रहे थे। भागवत कहता है कि उस यात्रा-भर भगवान ने मनु-ऋषियों को आत्म-तत्व, भक्ति और सृष्टि-रहस्य का उपदेश दिया — यही "मत्स्य पुराण" की संवाद-भूमिका है (मत्स्य पुराण स्वयं को इसी मत्स्य-मनु संवाद रूप में प्रस्तुत करता है): प्रलय के बीचोबीच ज्ञान-सत्र — विनाश के केंद्र में भी परंपरा का सूत्र नहीं टूटने देना, यही भारतीय दृष्टि में "रक्षा" की पूर्ण परिभाषा है। जल उतरे, नई सृष्टि का प्रभात हुआ, और सत्यव्रत वैवस्वत मनु रूप में मानव-वंश के आदि-विधाता हुए — हम सबकी वंश-गाथा, पुराण-गणना में, उसी नौका से उतरी है।
वेद-उद्धार — हयग्रीव-वध
कथा का दूसरा कार्य-भार ज्ञान-रक्षा है। भागवत-धारा में ब्रह्मा की कल्पांत-निद्रा के क्षण उनके मुख से नि:सृत वेदों को हयग्रीव (अश्व-ग्रीव) दैत्य चुराकर समुद्र-तल में जा छिपा। वेद अर्थात् सृष्टि का "स्रोत-कोड" — उनके बिना अगला कल्प अंधा आरंभ होता। मत्स्य-रूपधारी विष्णु ने प्रलय-जल में ही उस दैत्य का वध कर वेद ब्रह्मा को लौटाए — इसीलिए दशावतार-स्तोत्र की पहली वंदना यही गाती है: "प्रलयपयोधिजले धृतवानसि वेदम्" — प्रलय-सागर में तुमने वेद धारण किए। यहाँ एक पाठ-सावधानी इस ज्ञानकोश का धर्म है: "हयग्रीव" नाम परंपरा में दो सर्वथा भिन्न व्यक्तित्वों का है — यह वेद-चोर दैत्य, और स्वयं विष्णु का अश्वमुख ज्ञान-अवतार हयग्रीव (जिनकी उपासना ज्ञान-देवता रूप में जीवित है); दोनों में भ्रम न हो, इसलिए धाराएँ पृथक् दर्ज हैं। मत्स्य पुराण की अपनी धारा में प्रलय-प्रयोजन केंद्र में है और दैत्य-वध गौण/अनुपस्थित — पुराणों के भीतर का यह बल-भेद (एक ही अवतार के दो कार्यों में से किसे मुख्य कहा जाए) पाठ-परंपराओं की स्वस्थ विविधता है, विरोध नहीं।
मत्स्य पुराण — नौका पर लिखा ग्रंथ
इस अवतार की एक धरोहर आज भी पुस्तक-रूप में हमारे पास है — अठारह महापुराणों में गिना जाने वाला मत्स्य पुराण, जो स्वयं को उसी प्रलय-यात्रा का प्रतिलेख कहता है: मत्स्य-भगवान बोलते गए, मनु पूछते गए। चौदह हज़ार श्लोकों की यह संहिता केवल अवतार-कथा नहीं — इसमें राजधर्म के अध्याय हैं (राजा कैसा हो, मंत्री-परीक्षा कैसे हो), तीर्थ-माहात्म्य (प्रयाग-वाराणसी-नर्मदा के प्राचीनतम वर्णनों में गिने जाते हैं), वास्तु और मूर्ति-निर्माण के शिल्प-शास्त्र, व्रत-दान विधियाँ और वंश-वर्णन। अर्थात् नौका पर जो सौंपा गया, वह अगली सृष्टि की पूरी "सभ्यता-पोटली" थी — बीज खेतों के लिए, और यह ज्ञान-कोश समाज के लिए। परंपरा की दृष्टि से यही मत्स्यावतार का स्थायी प्रसाद है: हर युग-संधि पर संस्कृति को नाव चाहिए — कभी वह नाव लकड़ी की होती है, कभी ग्रंथ की। कला-परंपरा में भी मत्स्य की उपस्थिति इसी दायित्व-भाव से अंकित हुई — दशावतार-पट्टिकाओं में प्रथम स्थान, राजस्थानी-पहाड़ी लघुचित्रों में शंख-चक्रधारी मीन-पुरुष जो चारों वेदों को शिशु-रूप या पोथी-रूप में थामे तैरता है, और ओडिशा-बंगाल की पट-चित्र शैलियों में नौका-दृश्य; हर चित्र का व्याकरण एक ही है — जल चाहे कितना भी चढ़े, ज्ञान की पोथी उससे ऊपर रहनी चाहिए।
आध्यात्मिक अर्थ — नौका, रस्सी और सींग
मत्स्य-कथा साधना-प्रतीकों का सघन कोश है। प्रलय मन का वह महाक्षोभ है जब समस्त आधार डूबते दिखें — वहाँ "नौका" शरीर/साधना-तंत्र है, "बीज" वे संस्कार-मूल्य जो अगले जीवन-चक्र में बोने हैं, "सप्तर्षि" विवेक-वृत्तियाँ, और "वासुकि-रज्जु" वह भक्ति-डोर जो जीव-नौका को प्रभु-शृंग से बाँधती है — रस्सी बाँधने का काम मनु को स्वयं करना पड़ता है: कृपा सींग तक आती है, गाँठ पुरुषार्थ लगाता है। वृद्धि-क्रम सिखाता है कि जो आज अंजलि-भर लगता है (नाम-जप, छोटा सत्संग), वही कल प्रलय-तारक निकलेगा — बीज-रूप श्रद्धा की उपेक्षा मत करो। और हयग्रीव-प्रसंग का सूत्र: संकट-काल में सबसे पहले ज्ञान चुराया जाता है — अफवाह और अंधकार प्रलय के सगे भाई हैं; इसीलिए रक्षक का पहला युद्ध अन्न या भूमि के लिए नहीं, वेद (सत्य-ज्ञान) के लिए होता है। मछली जल में रहकर भी जल से गीली नहीं होती — कहते हैं इसीलिए प्रथम अवतार मीन है: संसार-जल में रहो, भीगो मत — दशावतार की पूरी पाठशाला का यह पहला ही पाठ सबसे गहरा है।