मल्हारी खंडोबा

Khandoba · मल्हारी मार्तंड · जेजुरी-नाथ · मैलार

दक्खन के पठार का लोक-महादेव: घोड़े पर सवार, हाथ में खड्ग (खंडा), संग म्हाळसा — और चारों ओर उड़ता भंडारा: हल्दी का सुनहरा मेघ, जिसने जेजुरी को "सोनयाची जेजुरी" — सोने की जेजुरी — बना दिया। किसान, धनगर, शिकारी, सैनिक — मेहनतकश दक्खन का यह अपना देव है: शिव का लोक-अवतार मल्हारी मार्तंड।

श्रेणी: लोक-देवता (N) — शिव-अवतार धारा धाम: जेजुरी-गड (पुणे) · मैलार-क्षेत्र महापर्व: चंपाषष्ठी — षड्-रात्रोत्सव घोष: येळकोट येळकोट जय मल्हार!
प्रमुख कथा पढ़ें
मार्तंड-भैरवशिव का दैत्य-दमन लोक-अवतार
खड्ग-राज"खंडा" धारण करने वाला — नाम का मूल
भंडारा-वर्षीहल्दी-मेघ का सुनहरा उत्सव-दरबार
श्रमजीवी-देवकिसान-धनगर-सैनिक संस्कृति का नायक

परिचय एवं दिव्य स्वरूप

Introduction

खंडोबा — खंडा (खड्ग) + बा (पिता): खड्गधारी बाबा — महाराष्ट्र-उत्तर कर्नाटक (मैलार/मैलारलिंग नाम से) का सर्वप्रिय लोक-महादेव; परंपरा उन्हें शिव (D003) का मार्तंड-भैरव अवतार कहती है — मार्तंड (सूर्य-तेज, D043-सूत्र) + भैरव (उग्र-रक्षक, D026-सूत्र): तेज और रक्षा का लोक-संगम। स्वरूप: श्वेत/नील अश्व पर आरूढ़ योद्धा-देव, हाथ में चमकता खंडा, ललाट पर भंडारा (हल्दी) का पीला टीका, संग पत्नी म्हाळसा — और सेवक-श्वान।

उनका भक्त-संसार ही उनका परिचय है: वे कुलदेवत हैं — महाराष्ट्र के असंख्य परिवारों (किसान, धनगर-गड़रिये, माळी, कोळी, सुनार, मराठा-सरदार घराने — होळकर वंश के आराध्य) के कुल-देवता; नवरात्र जैसी घट-स्थापना उनके चंपाषष्ठी-षड्रात्र में होती है, विवाह के बाद नव-दम्पती जेजुरी-दर्शन करते हैं, और हर मंगल-प्रसंग पर गूँजता है वह घोष जो दक्खन की धड़कन है — "येळकोट येळकोट जय मल्हार!" (सदा-विजयी मल्हार की जय — घोष-अर्थ लोक-व्याख्या)।

परिवार एवं संबंध

Family
  • तत्त्व-मूलशिव (D003) — मार्तंड-भैरव लोक-अवतार; भैरव-सूत्र (D026)
  • पत्नी-द्वयम्हाळसा (पार्वती/मोहिनी-अंश धारा — D006/D029) एवं बाणाई (धनगर-कन्या — गंगा-अंश धारा D056)
  • सहचरहेगड़ी-प्रधान, श्वान; अश्व — वायु-वेग वाहन
  • कर्नाटक-रूपमैलार/मल्लय्या — खंडोबा-धारा का कन्नड़ मुख
  • पर्व-सेतुचंपाषष्ठी — स्कंद-षष्ठी संगति (D005-सूत्र): षष्ठी-योद्धा परंपरा

प्रमुख कथा

Major Story — न्यूनतम 1,000 शब्दों में
प्रमुख कथा / लोक-माहात्म्य

मणि-मल्ल का वध — छह दिन का देव-युद्ध और हल्दी का राज्य

मणि-मल्ल — ऋषियों की पुकार

मल्हारी-माहात्म्य की केंद्र-कथा दक्खन की धरती पर उतरा देवासुर-संग्राम है: मणि और मल्ल — दो महादैत्य भाई — ब्रह्म-वर के मद में पृथ्वी रौंदते फिरे; उनका विशेष कोप ऋषि-आश्रमों पर था — यज्ञ-विध्वंस, तप-भंग। त्रस्त सप्तर्षि-मंडल शिव की शरण गया, और महादेव ने वह रूप धरा जो लोक का अपना रूप था — मार्तंड-भैरव: कोटि-सूर्य तेज, श्वेत अश्व, हाथ में खंडा; संग सात करोड़ (लोक-गणना "येळकोटि") गण-सेना। युद्ध छह दिन चला — मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा से षष्ठी तक (यही षड्रात्र आज चंपाषष्ठी-उत्सव है)। पहले मणि गिरा — और गिरते-गिरते वह हुआ जो लोक-कथाओं का विलक्षण न्याय है: मरणासन्न मणि ने अपना श्वेत अश्व देव को अर्पित किया और वर माँगा — मेरा मस्तक आपके चरणों में सदा रहे; आज हर खंडोबा-मंदिर के गर्भ-द्वार पर मणि का मुण्ड-विग्रह है — पराजित को भी देवालय में स्थान: शत्रुता वध तक थी, अपमान तक नहीं। फिर मल्ल — अंतिम द्वंद्व में देव ने उसे खंडा से खंडित किया; मल्ल का वर था कि उसका नाम देव-नाम से जुड़े — वर पूरा हुआ: मल्ल-अरि (मल्ल का शत्रु) = मल्हारी; दैत्य अपने विजेता के नाम में अमर हो गया। युद्ध-भूमि जेजुरी-गड (और कर्नाटक-धारा में मैलार-क्षेत्र) कहलाई — पर कथा का असली चमत्कार युद्ध नहीं, उसके बाद की वर्षा है।

भंडारा — हल्दी क्यों बरसी

विजय-क्षण पर देवताओं ने पुष्प-वर्षा नहीं की — लोक-स्मृति कहती है: उस दिन जेजुरी पर हल्दी बरसी — भंडारा; और तबसे बरसती ही रही। जेजुरी-दर्शन आज भी वही दृश्य है: सीढ़ी-दर-सीढ़ी चढ़ता यात्री-प्रवाह मुट्ठियों से भंडारा उछालता चलता है — "येळकोट येळकोट जय मल्हार!" — गड़ की हवा सुनहरी हो जाती है, पत्थर पीले, वस्त्र पीले, दाढ़ियाँ-केश पीले: "सोनयाची जेजुरी" — सोने की जेजुरी। इस पीत-वर्षा का अर्थ-कोश खोलिए तो लोक-धर्म की पूरी अर्थ-व्यवस्था मिलती है। हल्दी दक्खन के किसान की नक़द-फ़सल और घर की औषधि है (D077-बगला के हरिद्रा-शास्त्र की सजातीय धारा) — यानी भक्त अपने देव पर वही न्योछावर करता है जो उसके श्रम का सर्वोत्तम है; सोना नहीं है तो क्या — हल्दी ही हमारा सोना है: भंडारा ग़रीब के वैभव की घोषणा है। हल्दी विवाह-द्रव्य भी है — और खंडोबा-म्हाळसा के वार्षिक विवाह-उत्सव (पौष-पूर्णिमा धारा) में यही भंडारा मंगल-द्रव्य बनता है। और गहरे में वह मार्तंड-सूत्र: पीत सूर्य-तेज का वर्ण है — भंडारे में डूबा जेजुरी-गड़ मानो प्रतिदिन अपने देव के सूर्य-रूप का रंग-अभिषेक करता है। जोड़ में वारी-जैसी पद-परंपराएँ, बैल-गाड़ियों के मेले, और वाघ्या-मुरळी (देव को अर्पित गायक-गायिका सेवक-परंपरा) के गीत — जिन पर आधुनिक सुधार-दृष्टि की टिप्पणी नीचे ईमानदारी से दर्ज है।

म्हाळसा और बाणाई — दो पत्नियों का समाज-शास्त्र

खंडोबा-परिवार की रचना दक्खन के समाज का दर्पण है। प्रथम पत्नी म्हाळसा — नेवासे के व्यापारी-कुल (लिंगायत-वैश्य धारा) की कन्या, विधिवत् विवाहिता; परंपरा उन्हें पार्वती/मोहिनी-अंश कहती है (D006/D029)। द्वितीय — बाणाई (बानू): धनगर (गड़रिया) कन्या, जिसे देव वन में मिले; प्रेम हुआ, और लोक-गाथा का सबसे प्रिय अध्याय रचा गया — बाणाई को पाने के लिए खंडोबा स्वयं धनगर-सेवक बनकर उसके पिता की भेड़ें चराते रहे! विवाह हुआ — पर म्हाळसा-बाणाई की सौत-नोंक-झोंक लोक-गीतों की स्थायी रसधारा बनी; जेजुरी-गड़ पर म्हाळसा साथ विराजती हैं, बाणाई का मंदिर नीचे — और वर्ष के उत्सवों में दोनों का मान-विधान सधा हुआ है। इस कथा-रचना का समाज-पाठ पढ़िए: व्यापारी-कुल की म्हाळसा और गड़रिया-कन्या बाणाई — बसे हुए समाज और घुमंतू समाज, दोनों देव-परिवार में ब्याहे गए; खंडोबा-भक्ति का विशाल छाता इसी रचना से बना, जिसके नीचे किसान भी है, धनगर भी, वाणी भी, सरदार भी — यहाँ तक कि मुस्लिम घरानों तक में खंडोबा-मान्यता की धाराएँ इतिहास में मिलती हैं (मल्लू-खान लोक-नाम धारा) (समाज-इतिहास — ग्रेड B; क्षेत्र-विद्वानों का अध्ययन-क्षेत्र)। देव ने भेड़ें चराईं — इसलिए चरवाहा उसे अपना कह सका: लोक-देवता की महिमा यही "अपनापन" है।

दीपमाळा और होळकर — इतिहास में उतरा मल्हार

जेजुरी-गड़ की पहचान उसकी दीपमाळा-पंक्तियाँ हैं — पत्थर के वे ऊँचे दीप-स्तम्भ जो पर्व-रात्रियों में सैकड़ों ज्योतियों से जल उठते हैं: गड़-कोट शैली का यह मंदिर मराठा-स्थापत्य का रत्न है। और इस देव का इतिहास-प्रवेश भी उतना ही ठोस है: 18वीं शती के मराठा-साम्राज्य का एक स्तम्भ-वंश — इंदौर के होळकर — खंडोबा के ही नाम पर चला: वंश-संस्थापक मल्हारराव होळकर का नाम ही "मल्हारी" से था (धनगर-कुल से उठकर सूबेदार बने — देव और भक्त-समाज का वही धनगर-सूत्र); उनकी पुत्रवधू — पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होळकर — भारतीय मंदिर-पुनर्निर्माण इतिहास की महानायिका — के दान-अभिलेख जेजुरी में भी अंकित हैं (इतिहास — ग्रेड A)। लोक-देवता की यह ऐतिहासिक छाप बताती है कि खंडोबा केवल आस्था नहीं — दक्खन की राजनीतिक-सांस्कृतिक स्मृति भी हैं: जिस देव के नाम पर वंश चले और सेनाएँ "जय मल्हार" गरजीं, वह इतिहास की धड़कन में दर्ज है। मराठी साहित्य-आधुनिकता तक में जेजुरी की गूँज पहुँची — अरुण कोलटकर का अंग्रेज़ी काव्य-संग्रह "जेजुरी" (1976, राष्ट्रकुल-पुरस्कृत) इसी गड़ की तीर्थ-अनुभूति पर है: लोक-देव आधुनिक कविता का विषय बना — यह भी मल्हार-महिमा का ही एक मुख है।

चंपाषष्ठी, तळी-आरती — और एक ईमानदार सुधार-नोट

खंडोबा-वर्ष का शिखर चंपाषष्ठी है — मार्गशीर्ष शुक्ल षष्ठी: छह-दिवसीय घट-स्थापना (कुल-धर्म रूप में घर-घर), षड्रात्र-जागरण, और षष्ठी को विजय-पर्व; तळी भरणे की घर-विधि — थाल में नारियल-पान-भंडारा सजाकर "येळकोट" घोष से देव-स्तुति: दक्खन के घरों की अपनी आरती-शैली। पूरन-पोळी और भरीत (बैंगन) के नैवेद्य, रविवार का वार-विधान (मार्तंड-सूर्य सूत्र — D043), और कुल-परंपराओं का जागरण-गोंधळ गायन — यह समूचा विधान महाराष्ट्रीय गृह-धर्म की रीढ़ है। और अब वह नोट, जो इस कोश की नीति-शृंखला (D045/D076/D092) का अंग है: खंडोबा-परंपरा के इतिहास में वाघ्या-मुरळी प्रथा भी रही — बालकों-बालिकाओं को देव-सेवा में अर्पित करने की लोक-रीति, जिसका स्त्री-पक्ष (मुरळी) कालांतर में शोषण-व्यवस्था में गिरा; आधुनिक महाराष्ट्र के समाज-सुधार आंदोलनों और विधि-निषेधों ने इस अर्पण-प्रथा को समाप्त किया है — आज मुरळी-गोंधळ एक कला-परंपरा रूप में सम्मानित है, अर्पण-प्रथा रूप में नहीं; कोश-दृष्टि स्पष्ट है: देव के नाम पर किसी संतान का जीवन-दान शास्त्र नहीं — विकृति थी, और उसका अंत ही खंडोबा-धर्म का शुद्धिकरण है: जो देव स्वयं सेवक बनकर भेड़ें चराता हो, वह किसी बालिका की परतंत्रता कैसे माँगेगा? सच्चा भंडारा वही है जो सबको सुनहरा करे — किसी को पीला न पड़ने दे। ॥ येळकोट येळकोट जय मल्हार ॥

स्रोत टिप्पणी: मणि-मल्ल युद्ध, मार्तंड-भैरव अवतार, मणि-मुण्ड वर, मल्ल-अरि निरुक्त — मल्हारी-माहात्म्य क्षेत्र-ग्रंथ धारा (ग्रेड B — ब्रह्मांड-पुराण सम्बद्धता परंपरा-दावा, चिह्नित; संस्कृत-मराठी पाठ-द्वय); भंडारा/सोनयाची जेजुरी/तळी-चंपाषष्ठी/रविवार-विधान — जीवित परंपरा (ग्रेड A/B); बाणाई धनगर-सेवा गाथा — धनगर-वीरगाथा लोक-महाकाव्य (ग्रेड B/C — चिह्नित); म्हाळसा-बाणाई अंश-मान्यताएँ (ग्रेड B/C); मुस्लिम-मान्यता धाराएँ — समाज-इतिहास अध्ययन (ग्रेड B; तटस्थ-अभिलेख); वाघ्या-मुरळी सुधार-नोट — अभिलेखित समाज-इतिहास + कोश मानव-गरिमा नीति (संपादकीय स्वर स्पष्ट); येळकोट घोष-अर्थ लोक-व्याख्या (ग्रेड C)। हरिद्रा-शास्त्र D077-सूत्र; मार्तंड D043, भैरव D026, स्कंद-षष्ठी D005 सेतु।

नाम एवं अर्थ

Names
खंडोबा
खंडा (खड्ग) + बा — खड्गधारी पिता-देव।
मल्हारी
मल्ल-अरि — मल्ल-दैत्य का शत्रु; विजय-निरुक्त नाम।
मार्तंड-भैरव
सूर्य-तेज + भैरव-रक्षा — अवतार-पद (D043/D026 सेतु)।
मैलार / मल्लय्या
कर्नाटक-आंध्र धारा के नाम — मैलारलिंगेश्वर।
जेजुरीचा राजा
जेजुरी के राजा — मराठी वात्सल्य-सम्बोधन।

मंत्र एवं घोष

Mantras

विजय-घोष

येळकोट येळकोट जय मल्हार ॥  ·  सदानंदाचा येळकोट ॥

नाम-मंत्र

ॐ श्री मार्तंड-भैरवाय नमः ॥  ·  जय मल्हारी मार्तंड ॥

टिप्पणी: खंडोबा-उपासना का प्राण मंत्र-पाठ से अधिक घोष, गोंधळ-गायन और तळी-विधि है — लोक-धर्म की श्रवण-परंपरा।

मल्हारी-माहात्म्य के स्तोत्र-अंश एवं गोंधळ-गीतों के पाठ (मराठी मूल, रचयिता-श्रेय सहित) भावी मंत्र-सूचकांक विस्तार में।

पर्व एवं विधान

Festivals
चंपाषष्ठी
मार्गशीर्ष शुक्ल षष्ठी — षड्रात्र घट-स्थापना; कुल-धर्म शिखर।
सोमवती अमावस्या स्नान
जेजुरी की विशेष यात्रा-तिथियाँ — कऱ्हा-स्नान परंपरा।
पौष-पूर्णिमा विवाह-सोहळा
खंडोबा-म्हाळसा वार्षिक विवाह — भंडारा-मंगल।
रविवार वार-विधान
मार्तंड-सूत्र का साप्ताहिक दिन — तळी-आरती।

मंदिर एवं क्षेत्र

Temples
जेजुरी-गड, पुणे
"सोनयाची जेजुरी" — सीढ़ी-दीपमाला गड-कोट मंदिर; होळकर-दान दीपमाळा।
मैलार (खानापुर-बीदर धारा), कर्नाटक
मैलारलिंगेश्वर क्षेत्र — कन्नड़ खंडोबा-भूगोल; कार्णिक-भविष्य परंपरा।
पाली-पेंबर (सातारा-धारा)
खंडोबा के प्रमुख पीठ-स्थल — कुलधर्म यात्रा-जाल।
नेवासे-म्हाळसा क्षेत्र
म्हाळसा-कुल स्मृति — विवाह-कथा भूगोल।

बच्चों के लिए ज्ञान

For Children

सरल परिचय: खंडोबा महाराष्ट्र के बहुत प्यारे देवता हैं — शिव जी का योद्धा-रूप! वे घोड़े पर चलते हैं, हाथ में तलवार (खंडा) है। उनके मंदिर जेजुरी में लोग फूल नहीं — हल्दी उड़ाते हैं! पूरा पहाड़ सुनहरा हो जाता है, इसलिए उसे "सोने की जेजुरी" कहते हैं।

रोचक तथ्य:

  • सब मिलकर बोलते हैं — "येळकोट येळकोट जय मल्हार!"
  • एक कथा में खंडोबा ने बाणाई से विवाह के लिए भेड़ें तक चराईं!
  • हारे हुए मणि दैत्य की मूर्ति भी मंदिर के द्वार पर है — हार का भी सम्मान।
  • उनका बड़ा त्योहार चंपाषष्ठी छह दिन चलता है।

सीख: जो तुम्हारे पास है, वही सच्चे मन से अर्पित करो — किसान की हल्दी भगवान के लिए सोने जैसी है। और मेहनत करने में कोई शर्म नहीं — भगवान ने भी भेड़ें चराई थीं!

मिनी क्विज़:

  1. खंडोबा किस देव के अवतार हैं?
  2. जेजुरी में क्या उड़ाया जाता है?
  3. उनका घोष-वाक्य क्या है?
  4. "मल्हारी" नाम कैसे बना?