मणि-मल्ल का वध — छह दिन का देव-युद्ध और हल्दी का राज्य
मणि-मल्ल — ऋषियों की पुकार
मल्हारी-माहात्म्य की केंद्र-कथा दक्खन की धरती पर उतरा देवासुर-संग्राम है: मणि और मल्ल — दो महादैत्य भाई — ब्रह्म-वर के मद में पृथ्वी रौंदते फिरे; उनका विशेष कोप ऋषि-आश्रमों पर था — यज्ञ-विध्वंस, तप-भंग। त्रस्त सप्तर्षि-मंडल शिव की शरण गया, और महादेव ने वह रूप धरा जो लोक का अपना रूप था — मार्तंड-भैरव: कोटि-सूर्य तेज, श्वेत अश्व, हाथ में खंडा; संग सात करोड़ (लोक-गणना "येळकोटि") गण-सेना। युद्ध छह दिन चला — मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा से षष्ठी तक (यही षड्रात्र आज चंपाषष्ठी-उत्सव है)। पहले मणि गिरा — और गिरते-गिरते वह हुआ जो लोक-कथाओं का विलक्षण न्याय है: मरणासन्न मणि ने अपना श्वेत अश्व देव को अर्पित किया और वर माँगा — मेरा मस्तक आपके चरणों में सदा रहे; आज हर खंडोबा-मंदिर के गर्भ-द्वार पर मणि का मुण्ड-विग्रह है — पराजित को भी देवालय में स्थान: शत्रुता वध तक थी, अपमान तक नहीं। फिर मल्ल — अंतिम द्वंद्व में देव ने उसे खंडा से खंडित किया; मल्ल का वर था कि उसका नाम देव-नाम से जुड़े — वर पूरा हुआ: मल्ल-अरि (मल्ल का शत्रु) = मल्हारी; दैत्य अपने विजेता के नाम में अमर हो गया। युद्ध-भूमि जेजुरी-गड (और कर्नाटक-धारा में मैलार-क्षेत्र) कहलाई — पर कथा का असली चमत्कार युद्ध नहीं, उसके बाद की वर्षा है।
भंडारा — हल्दी क्यों बरसी
विजय-क्षण पर देवताओं ने पुष्प-वर्षा नहीं की — लोक-स्मृति कहती है: उस दिन जेजुरी पर हल्दी बरसी — भंडारा; और तबसे बरसती ही रही। जेजुरी-दर्शन आज भी वही दृश्य है: सीढ़ी-दर-सीढ़ी चढ़ता यात्री-प्रवाह मुट्ठियों से भंडारा उछालता चलता है — "येळकोट येळकोट जय मल्हार!" — गड़ की हवा सुनहरी हो जाती है, पत्थर पीले, वस्त्र पीले, दाढ़ियाँ-केश पीले: "सोनयाची जेजुरी" — सोने की जेजुरी। इस पीत-वर्षा का अर्थ-कोश खोलिए तो लोक-धर्म की पूरी अर्थ-व्यवस्था मिलती है। हल्दी दक्खन के किसान की नक़द-फ़सल और घर की औषधि है (D077-बगला के हरिद्रा-शास्त्र की सजातीय धारा) — यानी भक्त अपने देव पर वही न्योछावर करता है जो उसके श्रम का सर्वोत्तम है; सोना नहीं है तो क्या — हल्दी ही हमारा सोना है: भंडारा ग़रीब के वैभव की घोषणा है। हल्दी विवाह-द्रव्य भी है — और खंडोबा-म्हाळसा के वार्षिक विवाह-उत्सव (पौष-पूर्णिमा धारा) में यही भंडारा मंगल-द्रव्य बनता है। और गहरे में वह मार्तंड-सूत्र: पीत सूर्य-तेज का वर्ण है — भंडारे में डूबा जेजुरी-गड़ मानो प्रतिदिन अपने देव के सूर्य-रूप का रंग-अभिषेक करता है। जोड़ में वारी-जैसी पद-परंपराएँ, बैल-गाड़ियों के मेले, और वाघ्या-मुरळी (देव को अर्पित गायक-गायिका सेवक-परंपरा) के गीत — जिन पर आधुनिक सुधार-दृष्टि की टिप्पणी नीचे ईमानदारी से दर्ज है।
म्हाळसा और बाणाई — दो पत्नियों का समाज-शास्त्र
खंडोबा-परिवार की रचना दक्खन के समाज का दर्पण है। प्रथम पत्नी म्हाळसा — नेवासे के व्यापारी-कुल (लिंगायत-वैश्य धारा) की कन्या, विधिवत् विवाहिता; परंपरा उन्हें पार्वती/मोहिनी-अंश कहती है (D006/D029)। द्वितीय — बाणाई (बानू): धनगर (गड़रिया) कन्या, जिसे देव वन में मिले; प्रेम हुआ, और लोक-गाथा का सबसे प्रिय अध्याय रचा गया — बाणाई को पाने के लिए खंडोबा स्वयं धनगर-सेवक बनकर उसके पिता की भेड़ें चराते रहे! विवाह हुआ — पर म्हाळसा-बाणाई की सौत-नोंक-झोंक लोक-गीतों की स्थायी रसधारा बनी; जेजुरी-गड़ पर म्हाळसा साथ विराजती हैं, बाणाई का मंदिर नीचे — और वर्ष के उत्सवों में दोनों का मान-विधान सधा हुआ है। इस कथा-रचना का समाज-पाठ पढ़िए: व्यापारी-कुल की म्हाळसा और गड़रिया-कन्या बाणाई — बसे हुए समाज और घुमंतू समाज, दोनों देव-परिवार में ब्याहे गए; खंडोबा-भक्ति का विशाल छाता इसी रचना से बना, जिसके नीचे किसान भी है, धनगर भी, वाणी भी, सरदार भी — यहाँ तक कि मुस्लिम घरानों तक में खंडोबा-मान्यता की धाराएँ इतिहास में मिलती हैं (मल्लू-खान लोक-नाम धारा) (समाज-इतिहास — ग्रेड B; क्षेत्र-विद्वानों का अध्ययन-क्षेत्र)। देव ने भेड़ें चराईं — इसलिए चरवाहा उसे अपना कह सका: लोक-देवता की महिमा यही "अपनापन" है।
दीपमाळा और होळकर — इतिहास में उतरा मल्हार
जेजुरी-गड़ की पहचान उसकी दीपमाळा-पंक्तियाँ हैं — पत्थर के वे ऊँचे दीप-स्तम्भ जो पर्व-रात्रियों में सैकड़ों ज्योतियों से जल उठते हैं: गड़-कोट शैली का यह मंदिर मराठा-स्थापत्य का रत्न है। और इस देव का इतिहास-प्रवेश भी उतना ही ठोस है: 18वीं शती के मराठा-साम्राज्य का एक स्तम्भ-वंश — इंदौर के होळकर — खंडोबा के ही नाम पर चला: वंश-संस्थापक मल्हारराव होळकर का नाम ही "मल्हारी" से था (धनगर-कुल से उठकर सूबेदार बने — देव और भक्त-समाज का वही धनगर-सूत्र); उनकी पुत्रवधू — पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होळकर — भारतीय मंदिर-पुनर्निर्माण इतिहास की महानायिका — के दान-अभिलेख जेजुरी में भी अंकित हैं (इतिहास — ग्रेड A)। लोक-देवता की यह ऐतिहासिक छाप बताती है कि खंडोबा केवल आस्था नहीं — दक्खन की राजनीतिक-सांस्कृतिक स्मृति भी हैं: जिस देव के नाम पर वंश चले और सेनाएँ "जय मल्हार" गरजीं, वह इतिहास की धड़कन में दर्ज है। मराठी साहित्य-आधुनिकता तक में जेजुरी की गूँज पहुँची — अरुण कोलटकर का अंग्रेज़ी काव्य-संग्रह "जेजुरी" (1976, राष्ट्रकुल-पुरस्कृत) इसी गड़ की तीर्थ-अनुभूति पर है: लोक-देव आधुनिक कविता का विषय बना — यह भी मल्हार-महिमा का ही एक मुख है।
चंपाषष्ठी, तळी-आरती — और एक ईमानदार सुधार-नोट
खंडोबा-वर्ष का शिखर चंपाषष्ठी है — मार्गशीर्ष शुक्ल षष्ठी: छह-दिवसीय घट-स्थापना (कुल-धर्म रूप में घर-घर), षड्रात्र-जागरण, और षष्ठी को विजय-पर्व; तळी भरणे की घर-विधि — थाल में नारियल-पान-भंडारा सजाकर "येळकोट" घोष से देव-स्तुति: दक्खन के घरों की अपनी आरती-शैली। पूरन-पोळी और भरीत (बैंगन) के नैवेद्य, रविवार का वार-विधान (मार्तंड-सूर्य सूत्र — D043), और कुल-परंपराओं का जागरण-गोंधळ गायन — यह समूचा विधान महाराष्ट्रीय गृह-धर्म की रीढ़ है। और अब वह नोट, जो इस कोश की नीति-शृंखला (D045/D076/D092) का अंग है: खंडोबा-परंपरा के इतिहास में वाघ्या-मुरळी प्रथा भी रही — बालकों-बालिकाओं को देव-सेवा में अर्पित करने की लोक-रीति, जिसका स्त्री-पक्ष (मुरळी) कालांतर में शोषण-व्यवस्था में गिरा; आधुनिक महाराष्ट्र के समाज-सुधार आंदोलनों और विधि-निषेधों ने इस अर्पण-प्रथा को समाप्त किया है — आज मुरळी-गोंधळ एक कला-परंपरा रूप में सम्मानित है, अर्पण-प्रथा रूप में नहीं; कोश-दृष्टि स्पष्ट है: देव के नाम पर किसी संतान का जीवन-दान शास्त्र नहीं — विकृति थी, और उसका अंत ही खंडोबा-धर्म का शुद्धिकरण है: जो देव स्वयं सेवक बनकर भेड़ें चराता हो, वह किसी बालिका की परतंत्रता कैसे माँगेगा? सच्चा भंडारा वही है जो सबको सुनहरा करे — किसी को पीला न पड़ने दे। ॥ येळकोट येळकोट जय मल्हार ॥