ब्रह्म-कपाल से काशी-कोतवाली — दंड जो अनुग्रह बन गया
पृष्ठभूमि — पाँचवें मुख का दर्प
कथा का बीज वही प्रश्न है जो पुराणों में बार-बार लौटता है — श्रेष्ठ कौन? एक सभा में ब्रह्मा (D001) और विष्णु (D002) के मध्य परत्व-विवाद छिड़ा; वेदों और प्रणव से साक्ष्य माँगे गए, और साक्ष्य शिव-परत्व की ओर गए। तब ब्रह्मा के उस पाँचवें, ऊर्ध्व मुख ने — जो तप से अर्जित था और जिसके तेज का उन्हें गर्व था — शिव के प्रति अपमान-वचन कहे: कटाक्ष, आत्म-श्रेष्ठता और वह स्वर जो सृष्टिकर्ता को शोभा नहीं देता था। शिव-तेज से उसी क्षण एक ज्वालामय पुरुष प्रकट हुआ — काल-सा श्याम, भय का भी भय: भैरव। शिव ने उसे आदेश-रूप दृष्टि दी, और भैरव ने वाम-हस्त के नख-मात्र से ब्रह्मा का वह पंचम मुख छेद दिया। ब्रह्मा का दर्प उसी क्षण गला — वे चतुर्मुख रह गए (यही कारण-परंपरा D001 पृष्ठ पर पंचम-मुख प्रसंग में पूर्व-दर्ज है — दोनों पृष्ठ एक ही कथा के दो कोण हैं)। पर कथा यहाँ समाप्त नहीं होती — यहीं से उसका वास्तविक, गहरा अध्याय खुलता है: दंड देने वाले को भी दंड-विधि से गुज़रना पड़ा।
कपाल जो हाथ से नहीं छूटा — ब्रह्महत्या का पीछा
ब्रह्मा का कटा कपाल भैरव की हथेली से चिपक गया — छूटता ही नहीं था; और उनके पीछे लग गई ब्रह्महत्या — पुराण उसे मूर्तिमती रौद्र-स्त्री रूप में चित्रित करते हैं, जो छाया की तरह साथ चलती थी। यह विलक्षण न्याय-दर्शन है: भैरव ने जो किया, वह शिव-आदेश था — दर्प-दमन का धर्म-कार्य; फिर भी ब्रह्म-वध का विधान-दोष लगा, और स्वयं शिव ने उन्हें उससे छूट नहीं दी — प्रायश्चित-यात्रा का आदेश दिया: कपाल-पात्र लिए भिक्षाटन करो, तीर्थ-तीर्थ भटको, जब तक पात्र स्वयं न गिर जाए। यों काल का नियंता स्वयं कालयापन करता भिक्षु बना — "कपाली" और "भिक्षाटन" शिव-भैरव मूर्ति-परंपरा के ये करुण-सुंदर रूप इसी यात्रा की देन हैं (दक्षिण के मंदिरों में भिक्षाटन-मूर्ति का अपना विधान है)। मार्ग में विष्णु-लोक भी आया — विष्णु ने सम्मान दिया और यह सत्य भी कहा कि दोषी दर्प था, दंड-कर्ता नहीं; पर विधि पूरी होनी थी। वर्षों की यह भ्रमण-कथा हर तीर्थ पर एक ही परिणाम पाती रही — पाप घटता, पर मिटता नहीं; कपाल ढीला होता, पर गिरता नहीं। संकेत स्पष्ट था: कोई एक क्षेत्र है जहाँ यह ग्रंथि खुलनी लिखी है।
काशी-प्रवेश — कपालमोचन
और वह क्षेत्र था काशी — शिव की नित्य-नगरी, जहाँ के विषय में परंपरा कहती है कि वहाँ मृत्यु भी मंगल है (तारक-मंत्र प्रसंग D013)। ज्यों ही भैरव ने काशी-सीमा में पग रखा, हथेली से कपाल छूटकर गिर पड़ा — ब्रह्महत्या वहीं ठिठकी और विलीन हुई: जिस स्थल पर यह हुआ वह "कपालमोचन तीर्थ" हुआ (काशी खंड का प्रसिद्ध आख्यान)। शिव प्रकट हुए और वह नियुक्ति दी जिसने भैरव को काशी का शाश्वत अधिकारी बना दिया: अब से तुम इस क्षेत्र के कोतवाल हो — दंडपाणि; काशी में प्रवेश-निर्गम तुम्हारी दृष्टि से होगा, क्षेत्र के अपराधों का लेखा तुम्हारा, और जो काशीवास या काशी-मरण का पुण्य चाहे, उसे पहले तुम्हारा अनुशासन स्वीकारना होगा। इसीलिए आज भी काशी-यात्रा की विधि-परंपरा कहती है कि विश्वनाथ-दर्शन से पूर्व (या यात्रा-पूर्ण होने पर) काल भैरव का दर्शन अनिवार्य है — बिना कोतवाल की अनुमति नगर-सेठ से भेंट कैसी! भक्त वहाँ काले धागे (भैरव-रक्षा सूत्र) बँधवाते हैं — काशी के कोतवाल की "अनुमति-मुद्रा"। दंड से आरंभ हुई कथा नियुक्ति पर पूरी हुई — भारतीय कथा-न्याय की यह विशिष्ट भंगिमा है: जो अपने कर्म का विधि-फल पूरा भोग ले, उसे व्यवस्था बहिष्कृत नहीं करती, अधिकारी बना लेती है।
उज्जैन, नेपाल और बटुक — जीवित भैरव-भूगोल
काशी के बाद भैरव-भूगोल का दूसरा ध्रुव उज्जैन है — महाकाल-नगरी (काल भैरव और महाकाल का तत्त्व-सामीप्य स्वयंसिद्ध है) के काल भैरव मंदिर की वह विश्व-विख्यात विस्मय-परंपरा, जिसमें विग्रह को मदिरा अर्पित होती है और पात्र का द्रव्य सबके सम्मुख न्यून होता जाता है — श्रद्धालु इसे प्रत्यक्ष-स्वीकार मानते हैं; यह तांत्रिक वाम-परंपरा (पंचमकार) का लोक-स्वीकृत अवशेष-रूप है, जो इस क्षेत्र में सात्विक-विधि से समरस हो गया (ग्रेड B/D — जीवित विधि; इस ज्ञानकोश की नीति अनुसार तांत्रिक-विधियों का विवरण-विस्तार नहीं, केवल अभिलेख)। तीसरा ध्रुव नेपाल है — काठमांडू के हनुमान-ढोका प्रांगण का विराट काल भैरव, जिसके सम्मुख झूठी शपथ को प्राण-घातक माना जाता रहा — न्याय-देवता रूप में भैरव का यह हिमालयी विस्तार नेवार-संस्कृति में गहरा है (आकाश-भैरव, स्वेत-भैरव आदि रूप-मंडल सहित)। और लोक-गृहों के लिए द्वार है बटुक भैरव — पाँच-वर्षीय बाल-रूप: आपद्-उद्धारक, जिनकी उपासना सौम्य-विधि (दीप, उड़द, सरसों-तेल, श्वान-सेवा) से होती है; दिल्ली-जयपुर से काशी तक बटुक-पीठ गृहस्थ-भक्ति के केंद्र हैं। शनि-राहु-केतु आदि ग्रह-भय, अकाल-भय, वाद-विवाद और रक्षा-प्रयोजनों में भैरव-स्मरण की लोक-विधि पूरे उपमहाद्वीप में एक-सी मिलती है — कोतवाल की छाप हर थाने में चलती है। श्वान-वाहन का प्रतीक भी यहीं खुलता है: कुत्ता निष्ठा और सतर्कता का प्राणी है — द्वार पर जागता पहरेदार, जो अपने और पराए को गंध से पहचान लेता है; कोतवाल-देवता का वाहन वही हो सकता था। इसीलिए भैरव-भक्ति में श्वान-सेवा (कालाष्टमी पर रोटी-भोग) साक्षात् वाहन-पूजा है — और लोक-दृष्टि में उपेक्षित जीवों तक करुणा पहुँचाने की विधि भी: देवता ने अपनी सवारी चुनकर बता दिया कि उसके दरबार में कौन उपेक्षित नहीं है।
आध्यात्मिक अर्थ — काल से मैत्री
भैरव-कथा के पाठ उतने ही धारदार हैं जितना उनका नख। पहला — दर्प का शल्य-चिकित्सक: ब्रह्मा का पंचम मुख "अतिरिक्त" उपलब्धि थी — तप से अर्जित, पर अहं से दूषित; भैरव-नख ने मुख नहीं, वह अहं काटा। साधक-सूत्र: उपलब्धियों में से जो अहंकार बन जाए, उसे काल स्वयं काट देता है — भैरव उसी शल्य का नाम है। दूसरा — दंड की जवाबदेही: धर्म-कार्य का कर्ता भी विधि से ऊपर नहीं; भैरव की भिक्षाटन-यात्रा घोषणा है कि न्याय करने वाले को भी न्याय-प्रक्रिया से गुज़रना होता है — शक्ति और उन्मुक्तता पर्याय नहीं। तीसरा — काशी-तत्त्व: पाप की ग्रंथि आत्म-ग्लानि के भ्रमण से नहीं, चैतन्य-क्षेत्र (काशी = प्रकाश) में प्रवेश से खुलती है; जहाँ बोध है, वहाँ कपाल अपने-आप गिरता है। और चौथा — काल से मैत्री: मनुष्य का आदिम भय समय है — बीतता समय, आती मृत्यु; भैरव-उपासना उस भय का मनोविज्ञान उलट देती है: काल को शत्रु नहीं, कोतवाल जानो — अनुशासन कठोर, पर पक्ष तुम्हारा; जो काल का सम्मान करता है (समय पर कर्तव्य, समय पर विराम), काल उसका रक्षक हो जाता है। "काल-काल" का यही अर्थ है — भैरव के भक्त के लिए मृत्यु भी द्वारपाल भर है, बाधा नहीं।