कैलास का संवाद — जिस प्रश्नोत्तर से पुराण बहे
विरोधों का विवाह — पहले उसका स्मरण
कथा-भूमि का स्मरण-मात्र (मुख्य-रेखाएँ D003/D006 पर): यह विवाह देव-इतिहास का सबसे असम्भव प्रस्ताव था। एक ओर महेश्वर — श्मशान-भस्म, व्याघ्र-चर्म, भिक्षा-पात्र; सम्पत्ति के नाम पर नंदी और गण; समय की चिंता से मुक्त योगी। दूसरी ओर उमा — पर्वत-सम्राट की दुलारी, राज-वैभव में पली गौरी। मैना का हृदय बैठ गया था — वर देखो! पर उमा ने वह तप किया जिसने "अपर्णा" नाम रचा (D006/D062), और विवाह हुआ — विश्व-साहित्य का सबसे विचित्र बारात-वर्णन उसी का है। यहाँ से यह पृष्ठ अपना प्रश्न उठाता है: विवाह तो हो गया — घर कैसे चला? वैरागी और राजकुमारी का गार्हस्थ्य किस धुरी पर टिका? पुराणों का उत्तर एक शब्द का है, और वही इस युगल की महाकथा है: संवाद।
संवाद-फ्रेम — देवी का प्रश्न, जगत् का लाभ
भारतीय ज्ञान-साहित्य का एक विलक्षण तथ्य गिनिए: शिव पुराण के महाखंड, स्कंद-पुराण की विशाल कथाएँ, देवी-भागवत के प्रकरण, आगम-तंत्र के ग्रंथ-के-ग्रंथ, योग-प्रकरण (विज्ञान-भैरव जैसी धाराएँ), यहाँ तक कि लोक-प्रचलित व्रत-कथाएँ — इन सबका फ्रेम एक ही दृश्य है: कैलास पर उमा-महेश्वर बैठे हैं; देवी प्रश्न पूछती हैं; देव उत्तर देते हैं — "उमा-महेश्वर संवाद"। गीता-प्रेस की किताबों से तंत्र-पोथियों तक, यह प्रश्नोत्तर-युग्म भारतीय ज्ञान का सबसे बड़ा "प्रकाशन-गृह" है। इस फ्रेम का दर्शन-पाठ गहरा है। पहला: ज्ञान एकालाप नहीं — महेश्वर सर्वज्ञ हैं, पर उनका ज्ञान तभी बहता है जब उमा पूछती हैं; प्रश्न के बिना उत्तर जन्मता ही नहीं — पार्वती इस अर्थ में समस्त शास्त्रों की सह-लेखिका हैं: पूछने वाली। दूसरा: प्रश्न का अधिकार — देवी संकोचहीन पूछती हैं: मृत्यु क्या है? मुक्ति क्या? व्रतों का फल क्यों? कभी-कभी वे उत्तर से असहमत भी होती हैं, दुबारा पूछती हैं — और योगेश्वर झुँझलाते नहीं: कैलास के गार्हस्थ्य की धुरी यही है — वह घर जहाँ पत्नी कुछ भी पूछ सकती है। तीसरा: श्रोता-भाव का चक्र — कई कथाओं में क्रम पलट भी जाता है: तप-विद्या में देवी उपदेष्टा हो जाती हैं (केन-उपनिषद् की उमा हैमवती स्मरणीय — D059: जहाँ देवताओं को ब्रह्म-रहस्य देवी ने बताया — श्रुति-स्तर प्रमाण कि इस युगल में ज्ञान दोनों दिशा बहता है)। दाम्पत्य-शास्त्र इससे बड़ा सूत्र नहीं जानता: जिस विवाह में संवाद जीवित है, वह विवाह जीवित है।
गार्हस्थ्य-चित्र — शिल्प और लोक का हर-गौरी
अब वह चित्र-परंपरा जो इस युगल को भारतीय आँख का स्थायी दृश्य बना गई। उमा-महेश्वर-मूर्ति (उमासहित-महेश्वर) शिल्प-शास्त्र का स्वतंत्र विग्रह-वर्ग है: कैलास-आसन पर युगल — महेश्वर का वाम-हस्त उमा के स्कंध/कटि पर, उमा का सहज-विश्वस्त झुकाव देव की ओर; प्रायः गोद-समीप बाल-गणेश और स्कंद, नीचे नंदी — पूरा परिवार एक शिला में; एलोरा-गुफाओं से पाल-चोल कांस्यों तक यह "शिव-कुटुम्ब" चित्र सहस्र वर्ष से दोहराया जा रहा है (कला-इतिहास — ग्रेड A)। रावण-अनुग्रह मूर्तियों में भी यही युगल है — कैलास हिलाता रावण, और महेश्वर का एक अँगूठा; पर शिल्पी सदा उमा का चौंककर पति की बाँह थामना भी उकेरता है: शक्ति-सम्राज्ञी का वह सहज मानवीय क्षण ही मूर्ति की जान है। लोक ने इस युगल को हर-गौरी / गौरी-शंकर कहा — और घर-घर उतारा: विवाह में गौरी-पूजन (वधू गौरी से माँगती है — "हर जैसा वर"), मंगल-गीतों की शिव-बारात, तीज-गणगौर के उत्सव (D006-मंडल), और गौरी-शंकर रुद्राक्ष — वह विरल द्वि-एकीभूत रुद्राक्ष जिसमें दो मनके प्राकृतिक रूप से जुड़े होते हैं: परंपरा उसे दाम्पत्य-सौहार्द का चिह्न मानकर पूजा-घर में रखती है — वनस्पति तक में लोक ने इस युगल का दर्शन कर लिया। और तिथि-चक्र में उनका दिन है सोमवार — सोलह-सोमवार व्रत की प्रसिद्ध कथा-परंपरा में व्रती को अंततः "उमा-महेश्वर सा योग" मिलता है; प्रदोष-व्रत भी युगल-सांध्य ही है: गोधूलि में जब महादेव नृत्य करते हैं और गौरी रत्न-सिंहासन से निहारती हैं — व्रत-साहित्य का यह चित्र कैलास-गार्हस्थ्य की संध्या-आरती है।
अपरिग्रह की गृहस्थी — कैलास का अर्थशास्त्र
कैलास-गार्हस्थ्य का एक और पाठ आधुनिक घरों के लिए विशेष है — उसका अर्थशास्त्र। देव-लोक के हर धाम में वैभव है: वैकुंठ में शेष-शय्या और श्री (D084), अलकापुरी में कुबेर-निधियाँ (D053), अमरावती में ऐरावत-ऐश्वर्य (D039)। कैलास के पास क्या है? बर्फ़, बाघम्बर, एक बैल, चंद्रमा-भर का आभूषण — और फिर भी पुराण एकमत हैं कि जगत् का सबसे तृप्त घर वही है। स्वयं कुबेर उसी द्वार के सेवक हैं — निधियों का स्वामी उस घर का द्वारपाल जिसके पास कोई निधि नहीं: परंपरा का यह व्यंग्य-मधुर चित्र अपरिग्रह-दर्शन का शिखर है। और घर की स्वामिनी को देखिए — वही उमा, जिनका एक रूप अन्नपूर्णा (D080) है: जिस घर में अपने लिए संग्रह शून्य है, वहीं से जगत्-भर की रसोई चलती है। गृहस्थ-पाठ सीधा है: घर की समृद्धि संचय से नहीं — सम्बन्ध से मापी जाती है; जिस छत के नीचे संवाद, सम्मान और साझा-हास्य है, वह कैलास है — चाहे उसमें दो ही कमरे हों; और जहाँ ये नहीं, वह महल भी हिम-शून्य पहाड़ है।
विरोधों की एक छत — युगल-चतुष्टय की पूर्ति
समापन-दर्शन: उमा-महेश्वर उस प्रश्न का उत्तर हैं जो हर विवाह के भीतर बैठा है — दो भिन्न लोकों के व्यक्ति एक घर कैसे बनाएँ? यह युगल विरोधों की प्रदर्शनी है: वे विष-कण्ठ, वे अन्नपूर्णा (D080); वे श्मशान-वासी, वे शैल-राजकुमारी; वे दिगम्बर, वे सोलह-शृंगार; उनका गण-मंडल भूत-प्रेत, उनका मंडल सखियाँ। पुराण इन विरोधों पर पर्दा नहीं डालते — उन्हीं से लीला रचते हैं: चौपड़ की वे प्रसिद्ध क्रीड़ाएँ जिनमें देवी जीत जाती हैं और रूठना-मनाना चलता है; भिक्षाटन पर टिप्पणियाँ; कभी देवी का मान, कभी देव का मौन। और फिर भी — घर अटूट: क्योंकि धुरी स्वामित्व नहीं, संवाद और सम्मान है; न उमा ने महेश्वर का वैराग्य छीना, न महेश्वर ने उमा का शृंगार — दोनों पूरे रहे, और पूरे रहकर एक हुए (अभेद का वह चरम-पाठ D027 पर)। चारों युगल-पृष्ठ अब एक पंक्ति में रखिए — माधुर्य (राधा-कृष्ण), मर्यादा (सीता-राम), ऐश्वर्य-धर्म (लक्ष्मी-नारायण), और संवाद-सम्मान (उमा-महेश्वर): भारतीय परंपरा ने दाम्पत्य के चारों स्तम्भ चार दिव्य-युगलों में मूर्त कर दिए; जिस विवाह में चारों हों — रस भी, नियम भी, साझा-धर्म भी, संवाद भी — वह विवाह स्वयं देवालय है। ॥ जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ ॥