सियाराम — एक विवाह जो दर्शन बन गया
मंडप में दो वंश — विवाह से पहले की भूमिका
धनुष टूट चुका था — वह कथा इस कोश में राम के पृष्ठ (D013) पर विस्तार से खड़ी है। पर धनुष-भंग विवाह नहीं था; वह केवल पात्रता थी। वाल्मीकि रामायण का बालकांड यहाँ से जो प्रसंग खोलता है, वह भारतीय संस्कृति के सबसे विस्तृत विवाह-वर्णनों में है — और उसका हर ब्योरा जान-बूझकर विधि-पूर्वक है। जनक सन्देश भेजते हैं अयोध्या; दशरथ वसिष्ठ-वामदेव और पूरी बारात के साथ मिथिला आते हैं — बिना निमंत्रण की जल्दबाज़ी नहीं, दो कुलों की सहमति का पूरा शास्त्र। और तब जनक वह प्रस्ताव रखते हैं जिसने एक विवाह को चार में बदल दिया: सीता राम को, उर्मिला लक्ष्मण को, और भाई कुशध्वज की पुत्रियाँ मांडवी-श्रुतकीर्ति भरत-शत्रुघ्न को — चार भाइयों का सामूहिक पाणिग्रहण, एक ही मंडप, एक ही लग्न। मिथिला-दर्शन यहाँ चुपचाप एक बात कह जाता है: विवाह दो व्यक्तियों का नहीं — दो परिवारों का मंगल है; रघुकुल और विदेह-कुल उस दिन ऐसे जुड़े कि आज तीन सहस्राब्दियों बाद भी अयोध्या और जनकपुर एक-दूसरे को "समधी" कहते हैं — शाब्दिक अर्थ में, जैसा आगे दिखेगा। कन्यादान के क्षण जनक का वाक्य वाल्मीकि ने अमर कर दिया — "इयं सीता मम सुता सहधर्मचरी तव": यह सीता, मेरी पुत्री, अब तुम्हारी सह-धर्मचारिणी है — पत्नी की परिभाषा "अनुगामिनी" नहीं, धर्म में बराबर की सहयात्री; हाथ थामो और कल्याण हो — "पाणिं गृह्णीष्व पाणिना"। भारतीय विवाह-दर्शन का यह आदि-सूत्र इसी मंडप से चला।
सह-धर्मचारिणी — शब्द जो जीवन बना
जनक का वह एक शब्द — सहधर्मचरी — आगे की पूरी रामकथा की कुंजी निकला। परीक्षा तुरंत आई: राजतिलक की जगह चौदह वर्ष का वनवास। राम ने सीता को रोकने के सारे तर्क दिए — महल का सुख, वन का भय; सीता का उत्तर परंपरा में अमर है: जहाँ रघुनाथ, वहीं अयोध्या — पति से अलग स्वर्ग भी वन है, पति के साथ वन भी स्वर्ग (भाव वाल्मीकि/मानस दोनों धाराओं में; D015 पर विस्तृत)। ध्यान से देखिए — यह आज्ञाकारिता नहीं, अनुबंध की याद दिलाना है: मंडप में तुमने मुझे सह-धर्मचारिणी स्वीकारा था; धर्म वन जा रहा है, तो चारिणी भी जाएगी। युगल-तत्त्व यहीं कसौटी पर खरा उतरता है: राम ने भी उस अनुबंध को अपनी ओर से वैसे ही निभाया — चौदह वर्ष क्या, जीवन-भर एक-पत्नी-व्रत; अश्वमेध-यज्ञ तक में, जब शास्त्र-विधि को पत्नी की उपस्थिति चाहिए थी और सीता निर्वासित थीं, राम ने दूसरा विवाह नहीं किया — स्वर्ण की सीता-प्रतिमा बगल में बिठाई (वाल्मीकि उत्तरकांड धारा — ग्रेड A/B): सिंहासन पर पत्नी का स्थान रिक्त रह सकता है, प्रतिस्थापित नहीं। भारतीय दांपत्य-चेतना में इससे बड़ा वाक्य कभी नहीं लिखा गया। इसी निष्ठा-युग्म से "सीता-राम जैसी जोड़ी" आशीर्वाद बना — दोनों ओर व्रत, दोनों ओर गरिमा; जहाँ अग्नि-परीक्षा जैसे कठिन प्रसंग भी आए (उनका ईमानदार, प्रश्न-सहित विवेचन D015 पर है — यह कोश उन्हें युगल-चित्र से पोंछता नहीं), वहाँ भी कथा का अंतिम स्वर दोनों की अ-खंडित मर्यादा ही है।
विवाह-पंचमी — तीन सहस्राब्दी पुरानी बारात आज भी चलती है
अब वह अध्याय जो इस युगल को जीवित सिद्ध करता है। मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी — परंपरा-मान्य विवाह-तिथि — आज भी विवाह-पंचमी के नाम से मनाई जाती है, और उसका सबसे विलक्षण रूप नेपाल के जनकपुरधाम में है: हर वर्ष अयोध्या से सचमुच की बारात जनकपुर जाती है — साधु-संत, राम-विग्रह पालकी में, सीमा पार, सैकड़ों किलोमीटर; जनकपुर उसका स्वागत कन्या-पक्ष की तरह करता है — परिछावन, मिथिला-गीत, और जानकी-मंदिर (राणा-कालीन वह विशाल संगमरमरी परिसर जिसे लोक "नौलखा मंदिर" कहता है) में राम-जानकी विग्रहों का पूरा वैवाहिक विधान: तिलक, मटकोर, स्वयंवर-झाँकी, कन्यादान, फेरे। दो देशों के बीच बहती यह बारात केवल उत्सव नहीं — भारत-नेपाल की साझी सांस्कृतिक धमनी है ("रोटी-बेटी का रिश्ता" इसी सम्बन्ध का लोक-नाम)। और मिथिला की ओर से इस युगल को मिला उसका सबसे कोमल उपहार — गीत: मिथिला-परंपरा में राम "पाहुन" हैं (दामाद), और सास-सालियों के छेड़ने वाले विवाह-गीतों से लेकर विदाई के करुण "समदाउन" तक एक पूरा लोक-साहित्य सीता की बेटी-विदाई पर रचा गया — "राम जैसे वर को भी मिथिला की बेटियाँ गीतों में छेड़ सकती हैं" — देवता को परिवार बना लेने की यह घरेलू ढिठाई भक्ति का सबसे अंतरंग रूप है (लोक-साहित्य स्तर — ग्रेड B/C, चिह्नित)। मिथिला-चित्रकला (मधुबनी) का तो केंद्रीय विषय ही सीता-विवाह है — कोहबर की दीवारों पर आज भी वही मंडप हर विवाह में दुहराया जाता है।
सियाराम-दृष्टि — नाम से दर्शन तक
और अंत में वह चौपाई, जिसने युगल-नाम को विश्व-दृष्टि बना दिया। तुलसीदास मानस के बालकांड में प्रणाम-प्रकरण के भीतर लिखते हैं: "सीयराममय सब जग जानी । करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी ॥" — सारे जगत् को सीताराम-मय जानकर मैं दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ। तौलिए इस वाक्य को: तुलसी यह नहीं कहते कि "सीताराम जगत् में व्याप्त हैं" — वे कहते हैं जगत् ही सीताराम-मय है; अद्वैत की जो ऊँचाई उपनिषद् "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" में छूते हैं, भक्त-कवि उसे युगल-नाम में उतार देता है — और परिणाम व्यावहारिक है: जो जगत् को सियाराम-मय जान ले, वह किससे द्वेष करे? किसका अनादर करे? हर मिलने वाला सियाराम का रूप है — इसीलिए उत्तर भारत के गाँवों का पुराना अभिवादन "जय सियाराम" या "सीताराम" रहा: दो मनुष्यों का मिलना दो बार युगल-स्मरण बन जाता था। नाम-जप की दृष्टि से भी यह युगल अनुपम है — "सीताराम-सीताराम" अखंड-जप की रामानंदी और संत-परंपराएँ (समर्थ रामदास का त्रयोदशाक्षरी "श्रीराम जय राम जय जय राम" जिसकी पड़ोसी-धारा है) इसे सर्व-सुलभ महामंत्र मानती आई हैं: न दीक्षा की अनिवार्यता, न विधि का भार — साँस की लय पर दो नाम। हनुमान (D012) इस जप के आदि-आचार्य हैं — परंपरा उन्हीं के कण्ठ से "सीताराम" की अखंड धुन सुनती आई है; और जहाँ यह नाम है, वहाँ वे स्वयं उपस्थित माने जाते हैं। युगल-तत्त्व का समापन-सूत्र यही है: राधा-कृष्ण ने प्रेम को उपास्य बनाया (D082), सीता-राम ने गृहस्थी को उपास्य बना दिया — चूल्हे-चौके, वचन-निर्वाह और विदाई-गीतों समेत पूरा पारिवारिक जीवन ही जहाँ मंदिर हो जाए, वहीं सियाराम हैं। ॥ जय सियाराम ॥