बहू की कथा और एक देवी का जन्म — व्रत से सिनेमा तक
व्रत-कथा — सताई हुई बहू और सोलह शुक्रवार
हर व्रत की आत्मा उसकी कथा है, और संतोषी-व्रत की कथा बीसवीं सदी के भारतीय घर के आँगन से उठी है — इसीलिए वह पुराणों की राजकुमारियों की नहीं, एक साधारण बहू की कथा है। प्रचलित पाठ का सार यों है (व्रत-पुस्तिका परंपरा — ग्रेड C; पाठ-भेद अनेक): एक बुढ़िया के सात बेटे थे; छह कमाते, सातवाँ — सबसे छोटा — निकम्मा कहलाता। माँ छहों को ताज़ा भोजन परोसती और छोटे को उनका झूठन। भोली पत्नी को जब यह भेद पता चला, तो पति से कहा; पति ने परदेस की राह ली — कमाकर लौटने की प्रतिज्ञा के साथ। पीछे रह गई बहू पर सास-जिठानियों का पहाड़ टूटा — घर-भर का काम, भूसी की रोटी, नारियल की खोपड़ी में पानी; और परदेस गया पति वहाँ धन-वैभव में पत्नी को भूल बैठा। एक दिन बहू ने मंदिर में स्त्रियों से संतोषी माता के शुक्रवार-व्रत की महिमा सुनी: सवा आने का गुड़-चना, कथा-श्रवण, खटाई का त्याग — और सोलह शुक्रवार का नियम। उसने व्रत उठाया। माता की कृपा-लीला दो स्तरों पर चली — परदेस में पति को स्वप्न-स्मरण और कारोबार में ऐसा उछाल कि वह धन लेकर लौट आया; घर में बहू के दिन फिरे — अलग चूल्हा, मान-सम्मान। पर कथा का असली काँटा उद्यापन में है: बहू ने व्रत-पूर्ति का भोज रखा, जिठानियों ने ईर्ष्या-वश अपने बच्चों को सिखाकर भेजा — उन्होंने भोजन के साथ खटाई माँगी-खाई; नियम भंग होते ही माता का कोप उतरा — पति पर राज-दंड का संकट आ गिरा। बहू ने दोष बाहर नहीं — विधि-भंग में खोजा, क्षमा माँगी, पुनः विधिवत् उद्यापन किया — तब कल्याण पूर्ण हुआ: पुत्र-जन्म, और स्वयं माता का गृह-आगमन। कथा का पाठ स्पष्ट है: व्रत की शक्ति श्रद्धा-सातत्य में है; और खटाई — खटास — केवल स्वाद नहीं, सम्बन्धों की कड़वाहट का रूपक है: संतोष की देवी के घर में खटास वर्जित है, थाली में भी, वाणी में भी।
1975 — जब देवी सिनेमा के परदे से घर-घर उतरी
अब कथा के दूसरे स्तर पर चलिए — वह स्तर जो इस देवी को धर्म-इतिहास की अद्वितीय केस-स्टडी बनाता है। 1975 में विजय शर्मा-निर्देशित, अल्प-बजट पौराणिक फ़िल्म जय संतोषी माँ (अनीता गुहा — संतोषी; कानन कौशल — सत्यवती-बहू; संगीत सी. अर्जुन, स्वर उषा मंगेशकर — "मैं तो आरती उतारूँ रे...") प्रदर्शित हुई — उसी वर्ष जब शोले और दीवार परदे पर थीं; और बॉक्स-ऑफ़िस इतिहास साक्षी है कि वह छोटी-सी पौराणिक उस वर्ष की सबसे बड़ी व्यावसायिक सफलताओं में जा खड़ी हुई (फ़िल्म-इतिहास — ग्रेड A)। पर जो हुआ वह व्यवसाय से बड़ा था — सिनेमाघर मंदिर बन गए: दर्शक (बहुसंख्य स्त्रियाँ) चप्पल बाहर उतारतीं, परदे पर आरती के समय हॉल में थालियाँ घूमतीं, सिक्के-फूल परदे पर चढ़ते; गाँव-कस्बों में फ़िल्म देखना ही व्रत-दर्शन गिना गया। समाज-वैज्ञानिकों ने बाद में इसे आधुनिक भक्ति-इतिहास का निर्णायक क्षण कहा — पहली बार कोई देवी जन-माध्यम से अखिल-भारतीय हुई: जो काम कभी शंकराचार्यों की पदयात्राएँ और मंगल-काव्य करते थे, वह 35-मिमी रील ने कर दिखाया। फ़िल्म के बाद देश-भर में संतोषी-मंदिर उठे, कलैंडर-पोस्टरों में उनका चित्र-व्याकरण जमा, और सोलह-शुक्रवार व्रत उत्तर से दक्षिण तक फैला। ध्यान देने योग्य ईमानदार तथ्य: फ़िल्म से पहले भी देवी उपस्थित थीं — 1960 के दशक की व्रत-पुस्तिकाएँ, पोस्टर और कहीं-कहीं मंदिर (जोधपुर की लाल सागर-परंपरा आदि) मिलते हैं — फ़िल्म ने देवी गढ़ी नहीं, राष्ट्रीय की; बीज लोक में था, सिनेमा वर्षा बना।
स्त्री-लोक की देवी — व्रत का समाजशास्त्र
संतोषी-परिघटना की एक परत और खोलनी चाहिए — यह देवी किसने गढ़ी? उत्तर: भारतीय घरों के स्त्री-लोक ने। व्रत-कथा को दुबारा पढ़िए — उसमें राजा-ऋषि-असुर कोई नहीं: सास है, जिठानियाँ हैं, परदेस गया पति है, झूठन की थाली है — यह बीसवीं सदी की संयुक्त-गृहस्थी में सबसे नीचे खड़ी बहू का अपना संसार है, और कथा उसी की आँख से लिखी गई है। संतोषी-व्रत की पूरी विधि स्त्री-अनुकूल है: न पुरोहित की आवश्यकता, न संस्कृत-पाठ, न व्यय — सवा आने का प्रसाद, सहेलियों के साथ कथा-मंडली, और फल भी वही जो उस जीवन की सच्ची पुकारें थीं: पति की सुध, घर में मान, कलह से मुक्ति। समाज-वैज्ञानिक इसे "व्रत-लोकतंत्र" कहते हैं — जिस उपासना-तंत्र में शास्त्र-अधिकार की सीढ़ियाँ स्त्रियों के लिए ऊँची थीं, वहाँ उन्होंने अपनी देवी, अपनी कथा, अपनी विधि स्वयं रच ली — मौखिक परंपरा से, पुस्तिका-छापेखानों से, और अंततः सिनेमा से। संतोषी माता इस अर्थ में केवल उपास्या नहीं — भारतीय स्त्री-लोक की सामूहिक रचनाशक्ति का स्मारक हैं।
संतोष-तत्त्व — नाम का शास्त्र
देवी युवा हैं, पर उनका तत्त्व उपनिषद्-युग जितना प्राचीन है। "संतोष" भारतीय साधना-शास्त्र में कोई भावुक शब्द नहीं — पारिभाषिक पद है: पातंजल योग-सूत्र के पाँच नियमों में दूसरा — शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान; और सूत्रकार फल भी घोषित करता है: "संतोषादनुत्तमः सुखलाभः" (2.42) — संतोष से सर्वोत्तम सुख की प्राप्ति। मनु-धारा का प्रसिद्ध सूत्र "संतोषं परमास्थाय सुखार्थी संयतो भवेत्" और लोक-कण्ठ का "संतोषः परमं सुखम्" इसी की प्रतिध्वनियाँ हैं; गीता का "संतुष्टः सततं योगी" (12.14) संतोष को भक्त के लक्षणों में गिनाता है। अब देखिए बीसवीं सदी ने इस प्राचीन नियम को देवी क्यों बनाया: वह सदी भारतीय गृहस्थ के लिए अभाव और आकांक्षा के बीच पिसने की सदी थी — संयुक्त परिवारों के भीतर बहुओं का श्रम-संघर्ष (व्रत-कथा ठीक यही चित्र है), शहरों की ओर पलायन, विज्ञापन-युग की पहली किरणें। ऐसे समय लोक ने अपने सबसे ज़रूरी मूल्य — तृप्ति — को माँ का चेहरा दे दिया: जो देवी सवा आने के गुड़-चने से प्रसन्न हो जाए, वह स्वयं अपने विधान से उपदेश है — प्रसन्नता का मूल्य बाज़ार तय नहीं करता। खटाई-वर्जना उसी की दूसरी पंक्ति: घर की असली दरिद्रता धन की नहीं, कटुता की होती है। और सोलह शुक्रवारों का सातत्य तीसरी: संतोष एक क्षण का भाव नहीं — अभ्यास है, सप्ताह-दर-सप्ताह साधा जाने वाला। इस त्रिसूत्री को आज के उपभोग-युग के सामने रखिए — "और चाहिए" के विज्ञापन-मंत्र के विरुद्ध "जो है, वह पर्याप्त है" की देवी — तो समझ आता है कि देव-मंडल की सबसे युवा माता सबसे समकालीन भी क्यों है। ॥ जय संतोषी माता ॥