चौबीस अक्षरों की यात्रा — ऋचा से वेदमाता तक
ऋचा — सविता से बुद्धि माँगने वाली प्रार्थना
आरम्भ मूल से: "तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ॥" (ऋग्वेद 3.62.10) — उस सविता देव का वरणीय तेज हम धारण करें; जो हमारी बुद्धियों को प्रेरित करे। जप-परंपरा में इसके आगे महाव्याहृतियाँ (भूर्भुवः स्वः) और ॐ जुड़ते हैं — वह त्रि-स्तरीय पूर्ण-रूप जो संध्या-विधि का प्राण है। अब इस छोटी-सी ऋचा का शिल्प तौलिए — क्योंकि उसी शिल्प में उसका सहस्राब्दी-जीवन छिपा है। पहला: यह प्रार्थना कुछ माँगती नहीं — न धन, न आयु, न विजय; माँगती है केवल धी — बुद्धि की प्रेरणा। भारतीय प्रार्थना-साहित्य का यह विलक्षण क्षण है: सूर्य के सम्मुख खड़ा वैदिक मनुष्य कह रहा है — मुझे वस्तुएँ मत दो, वह बुद्धि दो जो सब वस्तुओं का मूल है; परंपरा ने इसीलिए इसे सब मंत्रों का सार कहा — जो बुद्धि माँग ले, उसने सब माँग लिया। दूसरा: "नः" — हमारी बुद्धियों को: प्रार्थना बहुवचन है, एकवचन नहीं — वैदिक ऋषि अकेले अपने लिए नहीं माँगता; गायत्री जन्म से सामूहिक प्रार्थना है। तीसरा: देवता सविता हैं — सूर्य का वह विशिष्ट पद जो प्रेरक-उदय का है (सू-धातु: प्रसव करना, गति देना — D043-मंडल): ठहरा हुआ प्रकाश नहीं, जगाने वाला प्रकाश; इसीलिए गायत्री संध्याओं की — दिन के संधि-क्षणों की — विद्या है: जब आकाश जग रहा हो, तब भीतर की धी को जगाना।
उपनिषदों से स्मृतियों तक — "सार का सार"
वैदिक-उत्तर साहित्य में इस ऋचा का पद असाधारण गति से चढ़ा। बृहदारण्यक उपनिषद् गायत्री-मीमांसा में उसके पादों को लोकों-वेदों-प्राणों पर व्याप्त करता है और घोषणा करता है कि गायत्री गयों (प्राणों) की त्राता है; छांदोग्य कहता है — "गायत्री वा इदं सर्वं भूतम्" — जो कुछ है, वह गायत्री ही है (3.12.1): एक छंद को सृष्टि-व्यापी कहने का यह साहस उपनिषद्-युग में ही हो चुका था। स्मृति-युग ने उसे विधि-केंद्र बनाया — मनुस्मृति (2.83) ने एकाक्षर ॐ, व्याहृतियों और सावित्री (गायत्री) को परम-पवित्र त्रय कहा और द्विज की नित्य-संध्या का प्राण ठहराया; उपनयन-संस्कार का हृदय ही गायत्री-दीक्षा है — आचार्य कान में यही मंत्र देता है, और "द्विज" (दूसरा जन्म) की परिभाषा परंपरा में यही रही: जिसका गायत्री-जन्म हो चुका। भगवद्गीता में स्वयं भगवान की विभूति-घोषणा है — "गायत्री छन्दसामहम्" (10.35): छंदों में मैं गायत्री हूँ। और लोक-निरुक्त ने नाम का हृदय खोल दिया: "गायन्तं त्रायते" — जो जपने वाले की रक्षा करे, वह गायत्री। एक ऋचा — जिसे श्रुति ने सर्व कहा, स्मृति ने नित्य, गीता ने विभूति: देवी-पद अब केवल औपचारिकता-भर दूर था।
पुष्कर — ग्वालिन जो देवी हो गई
देवी-रूप की पुराण-कथा पुष्कर (D001-मुख्य) से आती है, और उसका देवी-पक्ष यहाँ पढ़ने योग्य है (पद्म पुराण धारा — ग्रेड B): ब्रह्मा का महायज्ञ मुहूर्त पर अटका — पत्नी सावित्री गृह-कार्य में विलम्बित थीं, और यज्ञ-विधि पत्नी-सहित ही पूर्ण होती। मुहूर्त टल न जाए, इसलिए तत्काल-विवाह का निर्णय हुआ — और चुनी गईं एक गोप-कन्या (धाराओं में ग्वालिन/गुर्जर-कन्या), जिन्हें गायत्री नाम-दीक्षा देकर ब्रह्मा-वाम में बिठाया गया; यज्ञ पूर्ण हुआ — और फिर सावित्री का वह शाप-प्रकरण घटा जिसकी पूरी नीति-मीमांसा D001 पर है। यहाँ देवी-कोण देखिए: कथा में गायत्री लोक की बेटी हैं — राजकन्या नहीं, ऋषि-कन्या नहीं: दूध बेचने वाली सामान्या, जो यज्ञ-संकट के क्षण में देव-पत्नी पद पर बिठाई गई। पुराण-लेखकों की यह चेतना विलक्षण है — जिस मंत्र पर शताब्दियों तक अधिकार-सीमाएँ खिंचती रहीं (कौन जपे, कौन नहीं), उसी की देवी-कथा ने घोषित कर दिया कि गायत्री जन-सामान्य से उठी है; पुष्कर में आज भी ब्रह्मा-मंदिर के पीछे की पहाड़ियों पर सावित्री और गायत्री के अलग-अलग मंदिर उस द्वैध की स्मृति में खड़े हैं — विधि की रानी और लोक की बेटी, दोनों पूज्य। और आधुनिक युग ने इस लोक-द्वार को पूरा खोल दिया: 20वीं सदी के गायत्री-पुनर्जागरण आंदोलनों (हरिद्वार-शांतिकुंज धारा प्रमुख) ने गायत्री-जप को जाति-लिंग-भेद से मुक्त घोषित कर घर-घर पहुँचाया — करोड़ों स्त्री-पुरुषों की नित्य-साधना; इतिहास का चक्र पूरा हुआ: जो मंत्र कभी दीक्षित-सीमित था, उसकी देवी अब आँगन-आँगन जपी जाती है (आधुनिक इतिहास — ग्रेड A; आंदोलन-विवरण तटस्थ-अभिलेख)।
देवता-विशिष्ट गायत्रियाँ — एक छंद, अनेक द्वार
गायत्री की "छंदसां माता" पदवी का एक जीवित प्रमाण इस कोश के भीतर ही बिखरा है। परंपरा ने मूल सविता-गायत्री के ढाँचे पर — "तत्पुरुषाय विद्महे... महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्" शैली में — प्रायः हर देवता की अपनी गायत्री रची: विद्महे (हम जानें) - धीमहि (ध्यान करें) - प्रचोदयात् (वह प्रेरित करे) का त्रिपद-साँचा। तैत्तिरीय आरण्यक-धारा से चली यह पद्धति पुराण-आगम में फैलती गई — और इस ज्ञानकोश के अनेक पृष्ठ (गणेश-विष्णु-महालक्ष्मी गायत्री आदि यथा-स्थान, स्रोत-ग्रेड सहित) उसी परिवार के प्रकाशित सदस्य हैं। अर्थ ध्यान देने योग्य है: हर देवता का ध्यान अंततः उसी एक साँचे में ढलता है जिसका फल-पद सदा वही रहता है — प्रचोदयात्: प्रेरणा। यानी उपास्य कोई भी हो, वैदिक प्रार्थना-व्याकरण की माँग एक ही रही — बुद्धि की प्रेरणा; गायत्री इस अर्थ में केवल एक मंत्र नहीं — भारतीय प्रार्थना की मातृ-भाषा है, जिसमें सब देव-स्तुतियाँ बोली गईं।
चौबीस अक्षर — जीवन-विधि की देवी
गायत्री-दर्शन का समापन-पाठ उसकी विधि में है — क्योंकि यह देवी मंदिर से अधिक दिनचर्या में रहती है। संध्या-वंदन का शिल्प देखिए: दिन में तीन संधियाँ — प्रातः (उदय), मध्याह्न, सायं (अस्त) — और तीनों पर वही चौबीस अक्षर: अर्थ यह कि साधना जीवन से अलग "कार्यक्रम" नहीं — दिन की धुरी है; सूर्य जितनी नियमितता से उगता है, उतनी ही नियमितता से भीतर की धी को प्रेरित करना है। जप-विधि का हर अंग व्यावहारिक मनोविज्ञान है: उदय-सूर्य के सम्मुख (दृष्टि-लक्ष्य), जल-अर्घ्य (अहं का विसर्जन-चिह्न), नियत माला-संख्या (मन को गिनती का लंगर), और मानस-अर्थ-भावना — केवल ध्वनि नहीं, अर्थ का ध्यान: "मेरी बुद्धि प्रेरित हो।" आधुनिक विद्यार्थी के लिए यह प्राचीनतम "फोकस-अभ्यास" है — परीक्षा-भय की जगह बुद्धि-प्रार्थना; और परिवारों के लिए वह सेतु-विद्या, जो पीढ़ियों को एक ही चौबीस-अक्षरी धागे में बाँधती आई है — दादा की संध्या, पोते की स्कूल-प्रार्थना (अनेक विद्यालयों की प्रातः-सभा गायत्री से खुलती है), एक ही स्वर। वेदमाता का "माता" पद अब पूरा खुलता है: माँ वह जो भाषा सिखाती है — गायत्री ने भारत को प्रार्थना की भाषा सिखाई; वेदों की माता होना पीछे का सत्य है, जपने वालों की माता होना आज का। ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः... धियो यो नः प्रचोदयात् ॥