आठ पड़ावों की परिक्रमा — क्षेत्र-कथाओं का माला-सूत्र
मोरगाँव — मयूरेश्वर: यात्रा का आदि-बिंदु
कऱ्हा-तट का मोरगाँव अष्टविनायक-मंडल की राजधानी है — यात्रा यहीं से उठती है और परिपाटी में यहीं लौटकर पूर्ण होती है। क्षेत्र-कथा सिंधु (सिंधुरासुर-धारा) नामक महादैत्य की है, जिसके त्रास से देव-ऋषि त्राहि कर उठे; गणेश ने मयूर-वाहन पर आरूढ़ होकर उसका संहार किया — इसीलिए यहाँ के स्वामी "मयूरेश्वर/मोरेश्वर" हैं। मयूर-वाहन गणेश-प्रतिमा शास्त्र में विरल है (मयूर तो कार्तिकेय D005 का चिह्न है) — परंपरा इसे दोनों भाइयों के वाहन-विनिमय की कथा से भी जोड़ती है: क्षेत्र का यह विशिष्ट-चिह्न ही उसका हस्ताक्षर है। श्याम-मुखी, वाम-सूंड, नागयज्ञोपवीत विग्रह के सम्मुख विशाल नंदी बैठा है — शिव-मंदिरों का नंदी गणेश-द्वार पर! स्थल-कथा कहती है कि नंदी शिव-मंदिर हेतु ले जाया जा रहा था, यहीं रम गया — पिता का गण पुत्र का द्वारपाल हो गया: मोरगाँव का यह दृश्य-विनोद यात्रियों की पहली स्मृति बनता है।
सिद्धटेक और पाली — सिद्धि का शिखर, भक्ति का शिखर
भीमा-तट का सिद्धटेक (सिद्धिविनायक) वह क्षेत्र है जहाँ परंपरा के अनुसार स्वयं विष्णु (D002) ने सिद्धि पाई — मधु-कैटभ महादैत्यों से युद्ध जब निर्णय-हीन खिंचता गया, तब हरि ने इसी टीले पर गणेश-आराधना की और विघ्न-ग्रंथि खुली (आदि-सृष्टि का वह प्रसंग D001-D002 की कथाओं से जुड़ा है)। दायीं-सूंड का यह एकमात्र अष्टविनायक-विग्रह है — दक्षिण-सूंड परंपरा में विशेष कठोर शुचिता-विधान की मान्यता रखती है; सिद्धि-कामी साधक टीले की प्रदक्षिणा को ही व्रत बनाते हैं। इसके विपरीत रायगढ़ के पाली (बल्लाळेश्वर) की कथा सत्ता या सिद्धि की नहीं — एक बालक की है: वैश्य-पुत्र बल्लाळ गणेश-भक्ति में ऐसा लीन रहता कि खेल-व्यापार सब भूल जाता; क्रुद्ध पिता ने पूजा-पाषाण फेंक दिए और बालक को पीटकर वन में वृक्ष से बाँध दिया — "देखूँ तेरा गणेश कैसे छुड़ाता है!" रक्त-रंजित, क्षुधार्त बालक ने बंधन में भी नाम-जप नहीं छोड़ा; विघ्नहर्ता ब्राह्मण-रूप में प्रकट हुए, बंधन गले, और वर माँगने पर बालक ने वही माँगा जो भक्त-शिरोमणि माँगते हैं — "आप यहीं रहिए, मेरे नाम से।" प्रभु ने पाषाण में प्रवेश किया और "बल्लाळेश्वर" हुए — देव-इतिहास का विरल क्षण: भगवान ने भक्त का नाम धारण किया। आठों में केवल यही पीठ भक्त-नामांकित है, और यही अष्टविनायक-दर्शन की आत्मा भी: यात्रा सिद्धि से आरंभ होकर भक्ति पर विश्राम पाती है।
महड और थेऊर — वरदान और चिंता-हरण
महड (वरदविनायक) की कथा गृत्समद ऋषि-धारा से जुड़ी है — शाप-संतप्त ऋषि ने इसी वन में तप कर गणेश से वर पाया और जिस मूर्ति की आराधना की, वह समीप के सरोवर से स्वयं प्रकट होकर पीठ बनी; "वरद" नाम इसी वरदान-स्वभाव से है। यहाँ की विशिष्ट परंपरा नंदादीप है — गर्भगृह का अखंड दीप, जो परंपरा-स्मृति में एक शताब्दी से अधिक से अविच्छिन्न जल रहा है (स्थल-मान्यता — ग्रेड D), और यहीं भक्तों को गर्भगृह तक जाकर स्वयं पूजा का दुर्लभ अधिकार भी मिलता है। पुणे-निकट मुळा-मुठा संगम का थेऊर (चिंतामणि) चिंता-ग्रंथि खोलने वाला क्षेत्र है: कथा में कपिला ऋषि की चिंतामणि (चिंतित का चिंतन पूरा करने वाला रत्न) उद्धत राजकुमार गुण (गणासुर-धारा) छीन ले गया; ऋषि की पुकार पर गणेश ने रत्न लौटाया, पर ऋषि ने रत्न प्रभु के ही कंठ में बाँध दिया — "मेरी चिंतामणि अब आप ही हैं।" कदंब-वृक्ष तले वह विग्रह "चिंतामणि" हुआ। इतिहास ने इस कथा पर मुहर लगाई — पेशवा माधवराव (प्रथम) का यह इष्ट-क्षेत्र था; अपनी अंतिम श्वासें वे इसी प्रांगण में लेने आए, और उनकी साध्वी पत्नी रमाबाई की समाधि यहीं है: राज-चिंताओं से थका मराठा-शिखर पुरुष अंत में चिंतामणि की गोद ही चुनता है — क्षेत्र-नाम की इससे बड़ी पुष्टि क्या हो।
लेण्याद्री, ओझर, रांजणगाँव — जन्म, विघ्न-विजय और महारूप
लेण्याद्री (गिरिजात्मज) आठों में सर्वथा अनूठा है — जुन्नर की पहाड़ी में कटी प्राचीन शैल-गुहा (बौद्ध-लेणी शृंखला की गुहा-परंपरा में) के भीतर विराजा एकमात्र पर्वत-पीठ, जहाँ तीन सौ से अधिक सीढ़ियाँ चढ़कर दर्शन होते हैं। नाम ही कथा है — "गिरिजा-आत्मज" अर्थात पार्वती-पुत्र: परंपरा के अनुसार देवी (D006) ने पुत्र-कामना का तप इसी पर्वत पर किया और बाल-गणेश की प्रथम लीलाओं की भूमि यही रही — अष्टविनायक-मंडल का "जन्म-कक्ष"। ओझर (विघ्नहर/विघ्नेश्वर) की कथा स्वयं "विघ्न" नामक दैत्य की है — राजा अभिनंदन के यज्ञ-ध्वंस हेतु प्रेषित विघ्नासुर ने त्रिलोक के अनुष्ठान रोक दिए; गणेश से पराभूत होकर उसने शरण माँगी, और प्रभु ने अद्भुत संधि दी — तू वहाँ नहीं जाएगा जहाँ मेरा स्मरण है; दैत्य ने विनती की कि आपका नाम मेरे साथ जुड़े — यों "विघ्नहर/विघ्नेश्वर" पीठ बना: विघ्न स्वयं जिनका विरुद बनकर बँध गया। स्वर्ण-कलश शिखर वाला यह क्षेत्र समृद्ध-विधान के लिए प्रसिद्ध है। समापन-पड़ाव रांजणगाँव (महागणपति) गणेश का "महा"-रूप है — कथा त्रिपुरासुर-संग्राम की: शिव (D003) त्रिपुर-वध में तब तक सफल न हुए जब तक पुत्र-स्मरण न किया; गणेश-स्तवन के बाद ही त्रिपुरांतक-बाण चला (यह क्षेत्र-धारा "आदौ पूजा विघ्नहर्ता की" विधि का पुराण-मूल है)। यहाँ के स्वामी दस-भुज तेजस्वी महागणपति हैं; स्थल-परंपरा गर्भ-विग्रह के नीचे गुप्त "महोत्कट" मूल-मूर्ति की मान्यता भी रखती है (ग्रेड D)। यात्री यहाँ से मोरगाँव लौटकर माला की गाँठ बाँधता है — आठ कथाएँ, एक सूत्र: हर क्षेत्र गणेश-तत्त्व का एक पक्ष है — वाहन-विजय (मोरगाँव), सिद्धि (सिद्धटेक), भक्त-वात्सल्य (पाली), वरद-स्वभाव (महड), चिंता-हरण (थेऊर), मातृ-लीला (लेण्याद्री), विघ्न-नियंत्रण (ओझर) और देवाधिदेव-पूज्यता (रांजणगाँव)।
आध्यात्मिक अर्थ — आठ बाहर, एक भीतर
अष्टविनायक-यात्रा का दर्शन-पक्ष उसकी संरचना में ही लिखा है। आठ की संख्या अष्ट-दिशाओं का मंडल है — विघ्नहर्ता को आठों दिशाओं में प्रणाम कर साधक अपने जीवन-क्षेत्र की पूरी परिधि सौंप देता है; इसीलिए हर मंगल-आरंभ से पहले यह परिक्रमा "दिग्बंधन" जैसी मानी गई। स्वयंभू-तत्त्व दूसरा पाठ है — आठों विग्रह अनगढ़ हैं: न अनुपात-शास्त्र, न शिल्प-चमक; श्रद्धा सिखाती है कि प्रभु गढ़े हुए सौंदर्य में नहीं, प्रकट हुए सान्निध्य में पूजनीय है — और साधक के लिए संकेत कि अपने भीतर का देवत्व भी तराशा नहीं, उघाड़ा जाता है। कथाओं की विविधता तीसरा सूत्र है — कोई क्षेत्र देवताओं की सिद्धि का है, कोई पिटे हुए बालक की पुकार का: विघ्नहर्ता का द्वार हर स्तर के आर्त के लिए एक-सा खुला है, और माला में विष्णु-शिव-पार्वती (D002-D003-D006) तक याचक-पंक्ति में खड़े दिखते हैं — गणपति-प्रथम-पूज्यता का यह जीवित भूगोल है। अंतिम पाठ यात्रा-रूप स्वयं है: आठ पड़ाव वस्तुतः साधक-जीवन के पड़ाव हैं — आरंभ का उत्साह, सिद्धि-लोभ, भक्ति-परीक्षा, वरदान, चिंता, जन्म-स्मृति, विघ्न-संधि और महादर्शन; मोरगाँव लौटना बताता है कि तीर्थ बाहर वृत्त पूरा करता है ताकि भीतर का वृत्त खुले — आठों विनायक अंततः एक ही विनायक हैं, जैसे आठों यात्री-रूप एक ही यात्री।