अवतार-सूची में बुद्ध — मायामोह से करुणा-मूर्ति तक की पाठ-यात्रा
पृष्ठभूमि — सूची में एक नया नाम
अवतार-गणनाएँ भारतीय ग्रंथ-परंपरा में क्रमशः विकसित हुईं — महाभारत के नारायणीय-खंड की प्रारंभिक सूचियों से पुराणों की दस-बीस-चौबीस अवतार-मालाओं तक। इस विकास-क्रम में लगभग गुप्तोत्तर काल से एक नाम स्थिर होने लगा जो पिछली सूचियों में नहीं था — बुद्ध। भागवत महापुराण की प्रथम-स्कंध सूची घोषणा करती है: "ततः कलौ सम्प्रवृत्ते सम्मोहाय सुरद्विषाम् — बुद्धो नाम्नाञ्जनासुतः कीकटेषु भविष्यति" (1.3.24) — कलियुग आने पर, देव-द्वेषियों के सम्मोहन हेतु, कीकट-देश (मगध-क्षेत्र) में अंजना के पुत्र रूप में "बुद्ध" नाम से (भगवान) होंगे। यह भविष्य-वाणी शैली की प्रविष्टि है — पुराणों की काल-दृष्टि में कलियुग-घटनाएँ "होंगी" रूप में कही जाती हैं। यही नाम आगे भागवत 2.7.37, अग्नि, पद्म, गरुड़, वराह, मत्स्य पुराणों की सूचियों और मध्यकालीन स्तोत्र-कोशों में दोहराया गया — दशावतार अपनी आज की प्रचलित शक्ल (मत्स्य से कल्कि) में इसी युग में जमा।
धारा एक — मायामोह: व्रत-मोह का शस्त्र
सबसे पुरानी और सबसे चौंकाने वाली धारा विष्णु पुराण (3.17-18) की है। कथा-चौखट देवासुर-संग्राम की है: असुर वेद-विहित तप और यज्ञ-आचरण से इतने प्रबल हो गए कि देवता हार चले; वध का कोई मार्ग नहीं था, क्योंकि धर्माचरण ही उनका कवच था। तब विष्णु ने अपने शरीर से "मायामोह" प्रकट किया — एक मोहक उपदेशक, जिसने दिगंबर/रक्तांबर वेश में नर्मदा-तट पर असुरों को वह दर्शन सिखाया जो उन्हें वेद-मार्ग से "मुक्त" कर दे: यज्ञ-हिंसा व्यर्थ है, श्रुति-प्रामाण्य संदिग्ध है, "बुध्यत-बुध्यत" (जागो, समझो) के आवाहन से तर्क करो। कवच उतर गया — व्रत-भ्रष्ट असुर देवताओं से परास्त हुए। विष्णु पुराण इस उपदेश-वेश को स्पष्टतः बौद्ध-जैन (आर्हत) श्रमण-धाराओं की छवि में गढ़ता है, और परवर्ती पुराण इसी मायामोह-कृत्य को बुद्ध-अवतार से जोड़ते हैं: "असुरों के मोहनार्थ बुद्ध-रूप।" आधुनिक अध्येता (और स्वयं परंपरा के अनेक भाष्यकार) यहाँ इतिहास की छाया पढ़ते हैं — यह पाठ उस युग का है जब पौराणिक धर्म और श्रमण-परंपराएँ अनुयायियों के लिए स्पर्धारत थीं; "मायामोह" उस विवाद का कथा-रूपांतर है। इस ज्ञानकोश की दृष्टि से यह धारा एक ऐतिहासिक पाठ-तथ्य है — दर्ज होगी, पर अकेली नहीं: क्योंकि परंपरा स्वयं इससे आगे बढ़ी।
धारा दो — करुणावतार: "सदयहृदय" की वंदना
बारहवीं शताब्दी के जयदेव गीतगोविंद के दशावतार-स्तोत्र में बुद्ध-वंदना का स्वर बिल्कुल दूसरा है — वहाँ न माया है, न मोह; वहाँ हृदय है: "निन्दसि यज्ञविधेरहह श्रुतिजातं, सदयहृदय दर्शितपशुघातम्" — हे दयालु-हृदय! पशु-घात दिखाने वाले श्रुति-जनित यज्ञ-विधान की तुम निंदा करते हो; हे बुद्ध-शरीर-धारी केशव, जय जगदीश हरे। यहाँ बुद्ध विष्णु की करुणा का अवतार हैं — वह रूप जो हिंसा-जड़ हो चुके कर्मकांड को स्वयं भगवान की ओर से फटकार है। क्षेमेंद्र (दशावतारचरित, 11वीं सदी) और अनेक मध्यकालीन कवि-कोश इसी करुणा-धारा में चलते हैं; ओडिशा की जगन्नाथ-संस्कृति में तो बुद्ध-विष्णु समरसता और गहरी है (जगन्नाथ-बुद्ध तादात्म्य की क्षेत्रीय धाराएँ — ग्रेड C/D)। दो धाराओं का यह द्वैत भारतीय ग्रंथ-मानस की करवट दिखाता है: जो परंपरा पहले प्रतिद्वंद्वी-छवि गढ़ती है, वही शताब्दियों में उपदेशक की करुणा को आत्मसात कर उसे वंदना दे देती है — विवाद से समन्वय तक की यह यात्रा स्वयं एक भारतीय कथा है।
पाठ-विवेचन — पौराणिक बुद्ध बनाम इतिहास के गौतम
अब वह प्रश्न जो हर जिज्ञासु पूछता है — क्या पुराणों का अवतार-बुद्ध वही ऐतिहासिक गौतम बुद्ध हैं? पाठ-प्रमाण सीधा उत्तर नहीं देते, और यह ज्ञानकोश दोनों तथ्य-पंक्तियाँ आमने-सामने रखता है। भागवत का अवतार-बुद्ध "अंजना-सुत" है, "कीकट" (मगध) में प्रकट होने वाला; इतिहास के शाक्यमुनि शुद्धोदन-मायादेवी के पुत्र हैं, जन्म लुंबिनी में, बोध अवश्य मगध (बोधगया) में। कुछ भाष्यकार अंजना को माता का द्वितीय नाम या पिता-पक्ष मानकर समन्वय करते हैं; कुछ परंपरा-पाठ दो भिन्न "बुद्धों" की बात तक करते हैं (एक पौराणिक सम्मोहन-बुद्ध, एक ऐतिहासिक शाक्य-बुद्ध — यह द्वि-बुद्ध विवेचन परवर्ती/आधुनिक परंपरा-मंडलों में मिलता है, ग्रेड C)। आधुनिक शोध की मुख्य-धारा इतना कहती है: पुराणकारों के सम्मुख निस्संदेह ऐतिहासिक बुद्ध की विराट उपस्थिति थी — उसी को उन्होंने अपनी विश्व-दृष्टि (हर महाशक्ति विष्णु-तेज की अभिव्यक्ति) में स्थान दिया; ब्योरे (नाम-स्थान) उस आत्मसात्करण में पुराण-शैली से बदले। और सूची-भेद भी इसी इतिहास का साक्षी है — जिन परंपराओं को यह आत्मसात्करण सहज नहीं लगा (विशेषतः श्रीवैष्णव-दाक्षिणात्य), उन्होंने नौवाँ स्थान बलराम (D024) को दिया; उत्तर-पूर्वी काव्य-धारा (जयदेव) ने बुद्ध को। दोनों सूचियाँ आज तक साथ-साथ छपती हैं — भारतीय परंपरा की बहु-स्वरता का जीवंत प्रमाण।
समन्वय-दृष्टि — और उसकी मर्यादा
इस प्रविष्टि का अंतिम खंड उस संतुलन का है जो आधुनिक संवाद माँगता है। हिंदू समन्वय-दृष्टि के लिए बुद्ध-अवतार श्रद्धा का विषय रहा — "भगवान ने करुणा सिखाने वह रूप भी धरा" यह भाव करोड़ों के लिए दोनों महापुरुष-धाराओं को जोड़ने वाला सेतु है; स्वयं भारत-राष्ट्र की प्रतीक-भाषा (धर्मचक्र, सिंह-स्तंभ) इसी सह-गौरव की साक्षी है। पर संवाद की मर्यादा यह माँगती है कि हम दूसरे पक्ष की आत्म-परिभाषा भी उतने ही आदर से दर्ज करें: बौद्ध परंपरा बुद्ध को किसी सूची में समाहित होने वाला अवतार नहीं मानती — उसके लिए तथागत स्वयं-प्रमाण हैं, और अवतार-रूपांकन को वह ऐतिहासिक आत्मसात्करण की प्रक्रिया के रूप में देखती है। यह ज्ञानकोश दोनों वाक्य पूरी गरिमा से पास-पास रखता है — क्योंकि श्रद्धा का अभिलेख और इतिहास की ईमानदारी, दोनों इसका धर्म हैं। पाठक के लिए सार इतना: पुराणों में बुद्ध की उपस्थिति भारतीय धर्म-इतिहास का एक वास्तविक, बहु-स्तरीय अध्याय है — जो एक साथ स्पर्धा, स्वीकार और श्रद्धा की परतें सँजोए है; उसे किसी एक परत में समेट देना ही एकमात्र भूल होगी।
आध्यात्मिक अर्थ — निंदा भी वंदना बन सकती है
दर्शन की दृष्टि से इस पाठ-यात्रा के तीन सूत्र हैं। पहला — जयदेव का "सदयहृदय": परंपरा ने अंततः बुद्ध-तत्व का सार करुणा में देखा; अवतार-सूची में उनका होना हिंदू-चेतना का यह स्वीकार है कि अहिंसा-करुणा कोई बाहरी आयात नहीं, स्वयं भगवद्-गुण है — यज्ञ की आत्मा दया है, और जब विधि दया को निगलने लगे तो भगवान विधि के विरुद्ध भी खड़े हो सकते हैं। दूसरा — मायामोह-धारा का भीतर छिपा पाठ: श्रद्धा-भ्रष्टता सबसे बड़ा शस्त्राघात है; जो कथा असुरों के "व्रत-मोह" की है, वह हर साधक की चेतावनी है कि तर्क जब श्रद्धा काटने का यंत्र बने तो कौन उसे चला रहा है, यह देखना आवश्यक है। तीसरा — समन्वय का: भारतीय मानस विरोधी को भी अंततः मंदिर में जगह देकर ही शांत होता है; यह उसकी दुर्बलता नहीं, विधि है — "जय जगदीश हरे" की एक ही टेक में मीन से बुद्ध तक सब समा जाते हैं। इस पृष्ठ का अंतिम वाक्य वही है जो जयदेव का है — निंदा से आरंभ हुआ पद वंदना पर पूर्ण होता है; परंपराओं के संवाद की इससे सुंदर मुद्रा कोई नहीं।